संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ थोड़ी-बहुत काटछांट और नाम में बदलाव के साथ 28 दिसंबर को ही सेंसर बोर्ड से पास हो गई थी. मीडिया में आई खबरों के मुताबिक यह फिल्म नए नाम ‘पद्मावत’ से 25 जनवरी को रिलीज भी होने जा रही है. इस बीच सोमवार को राजस्थान सरकार ने घोषणा कर दी है कि फिल्म राज्य में नहीं दिखाई जाएगी. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा है, ‘रानी पद्मिनी का त्याग और बलिदान सबके लिए गौरव का विषय है. पद्मिनी का दर्ज़ा सिर्फ़ इतिहास तक सीमित नहीं है. यह इससे आगे की बात है. चाहे कुछ भी हो जाए हम उनके सम्मान को ठेस नहीं लगने देंगे.’ एक चुना हुआ मुख्यमंत्री जो संविधान की रक्षा और कानून-प्रशासन लागू करने की शपथ लेता है, का ऐसा बयान दुर्भाग्यपूर्ण की कहा जाएगा.

यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि 16वीं सदी के एक सूफी संत ने अपनी रचना में रानी पद्मिनी का किरदार गढ़ा था. और पिछले कुछ समय से बाकायदा एक अभियान चलाकर इस साहित्यिक किरदार को ऐतिहासिक किरदार बनाने की कोशिश हुई है. मुख्यमंत्री के ताजा बयान से इस अभियान और इसके लक्ष्य को एक तरह की वैधता मिल गई है.

यह भी सोचने वाली बात है कि सेंसर बोर्ड के कहने से फिल्म का नाम ‘पद्मावती’ से बदलकर ‘पद्मावत’ किया गया जिससे यह साफ हो जाए कि यह फिल्म मलिक मोहम्मद जायसी की रचना पद्मावत पर आधारित है. यानी इसका किसी ऐतिहासिक घटना या किरदार से कोई लेना-देना नहीं है.

इस फिल्म की रिलीज का विरोध कर रहे संगठनों ने सिनेमाघर मालिकों के साथ-साथ फिल्म के निर्देशक और कलाकारों को भी धमकाया था. इन्हीं की तर्ज पर वसुंधरा राजे ने अपने बयान में रानी पद्मिनी के ‘बलिदान’ को राज्य की ‘प्रतिष्ठा और गौरव’ से जोड़ते हुए रिलीज के पहले ही यह बात मान ली है फिल्म में इनके साथ छेड़छाड़ की गई है. अपने इस फैसले से राजस्थान सरकार ने सेंसर बोर्ड के प्रति असम्मान भी जता दिया है जबकि यह संवैधानिक संस्था है, जिसका गठन सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन किया गया है.

सिनेमेटोग्राफ एक्ट, 1952 केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) यानी सेंसर बोर्ड को फिल्मों के नियमन और उनके लिए प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार देता है. न्यायालय से इतर सेंसर बोर्ड वह सर्वोच्च संस्था है जो यह तय करती है कि कौन सी फिल्म रिलीज होनी चाहिए, कौन सी नहीं. पिछले साल जब इस फिल्म पर पाबंदी लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी तब अदालत का भी यही कहना था. लेकिन यहां राजस्थान सरकार ने सेंसर बोर्ड के फैसले को पलट दिया और यह भी कहा जा सकता है कि उसे चुनौती दी है.

यह राजस्थान सरकार की जिम्मेदारी थी कि वह शांति व्यवस्था कायम रखते हुए राज्य में पद्मावत की रिलीज सुनिश्चित करती. हालांकि हुआ यह है कि राज्य सरकार ने पूरे विवाद के दौरान अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों की उपेक्षा की, और यहां तक कि जानते-बूझते हुए उन्हें हाशिये पर भी धकेल दिया. यह सब इसलिए भी दुर्भाग्यपूर्ण कहा जाना चाहिए क्योंकि एक समय वसुंधरा राजे भाजपा में आधुनिक मूल्यों की हिमायती नेता समझी जाती थीं, लेकिन आज वे खुद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मूल्य को दबाते हुए पुरातनपंथी एजेंडे पर चल रही हैं. (स्रोत)