प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को इशारों-इशारों में चीन पर निशाना साधा. दुनिया के 23 देशों से आए भारतीय मूल के क़रीब 134 सांसदों और राजनेताओं के अपनी तरह के पहले सम्मेलन में उन्होंने कहा, ‘हम किसी को उसके विकास कार्यों में लेन-देन के सिद्धांत के आधार पर मदद नहीं करते. बल्कि हमारी मदद संबंधित देश की ज़रूरतों-प्राथमिकताओं पर आधारित होती है. हम उन देशों के सीमा क्षेत्र पर अतिक्रमण और संसाधनों के अनुचित दोहन का भी इरादा नहीं रखते. बल्कि उनकी क्षमताओं और उनके संसाधनों को बढ़ाने की कोशिश करते हैं.’ और द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ प्रधानमंत्री ने अगर यह आरोप लगाया है तो आंकड़े इसे पुख़्ता भी कर रहे हैं.

अख़बार के मुताबिक़ भारत के साथ लगती वास्वविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन के अतिक्रमण की घटनाओं में बीते साल क़रीब 48 फ़ीसदी की बढ़त हुई है. साल 2016 में जहां एलएसी पर चीनी सैनिकों की घुसपैठ के 271 मामले सामने आए थे वहीं 2017 में यह आंकड़ा बढ़कर 415 तक पहुंच गया है. भूटान के अधिकार क्षेत्र वाले डोकलाम पठार पर तो लगभग 73 दिन तक चीन और भारत के सैनिक आमने-सामने रहे. सूत्राें के अनुसार भारत ने एलएसी पर क़रीब 23 ऐसी बड़ी जगहों की पहचान की है जहां अक्सर चीनी सैनिकों की घुसपैठ होती रहती है. और चीन इन इलाकों पर अपने अधिकार का दावा करता रहा है. इनमें लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड ओर अरुणाचल प्रदेश के सीमाई इलाके शामिल हैं.

लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर तैनात एक शीर्ष सैन्य अधिकारी के मुताबिक, ‘एलएसी विवादित है. यह पूरी तरह मानी हुई सीमा रेखा है. इसीलिए जिन इलाकों में हम अपना समझते हैं उन पर चीन के सैनिकों की थोड़ी सी भी आवाजाही अतिक्रमण माना जाता है. उदाहरण के लिए पैंगोंग सो झील के बीच से भी एलएसी से गुजरती है. ऐसे में चीन के सैनिकों की नाव झील के पानी में थोड़ा ही इस तरफ़ आई तो वह अतिक्रमण या घुसपैठ माना जाता है. ऐसे ही चुमार और दिबांग घाटियों में ज़मीनी सीमा का भी हाल है. हालांकि इसके बावज़ूद यह सच है कि सीमा पर चीन की आक्रामकता बढ़ी है.’