बीते शनिवार को जारी हुई एक प्रेस विज्ञप्ति ने कांग्रेस के एक खेमे को राहत दी तो पार्टी के एक बड़े हिस्से को निराश भी कर दिया. ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की ओर से जारी इस विज्ञप्ति में कहा गया था, ‘कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने निर्णय लिया है कि सभी प्रदेश कांग्रेस कमेटियों, क्षेत्रीय कांग्रेस कमेटियों और टेरिटोरियल कांग्रेस कमेटियों के अध्यक्ष, संगठनात्मक चुनाव के बाद भी तब तक अपने-अपने पदों पर बने रहेंगे जब तक कि उन्हें बदलने का फैसला नहीं होता’.

यह प्रेस विज्ञप्ति एक लिहाज से अप्रत्याशित कदम है. पार्टी सूत्र भी मानते हैं कि कांग्रेस में विज्ञप्ति के ज़रिये पार्टी पदाधिकारियों तक अपनी बातें पहुंचाने की परंपरा नहीं रही है. हालांकि उनका मानना है कि ऐसा कार्यकर्ताओं के बीच अनिश्चितता ख़त्म करने के लिए किया गया है. कई पदाधिकारी पार्टी संगठन में आमूलचूल परिवर्तन तय मान रहे थे. यही कारण है कि उन्होंने काम करना बंद कर दिया था. राज्य इकाइयों में काम पूरी तरह से ठप पड़ गया था क्योंकि कई पदाधिकारियों को लग रहा था कि अब उनकी कुर्सी जाने ही वाली है.

इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि सोनिया गांधी के नज़दीक माने जाने वाले पार्टी के पुराने दिग्गजों और राहुल गांधी की पीढ़ी के, उनके साथ रहने वाले नौजवान नेताओं के बीच सत्ता संघर्ष चल रहा था. जिन राज्यों के पदाधिकारियों को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का संरक्षण हासिल था, वे इस बात से परेशान थे कि उन्हें नई व्यवस्था में किनारे कर दिया जाएगा.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ‘इस घोषणा ने कम से कम राज्य इकाइयों में एक बार फिर से जान फूंक दी है क्योंकि इससे पदाधिकारी काम पर वापस लौट आने के लिए प्रोत्साहित होंगे.’ हालांकि राहुल के बयान को ठीक से देखें तो उन्होंने संगठन में बदलाव को पूरी तरह से खारिज भी नहीं किया है.

पार्टी के अनुसूचित जनजाति विभाग के अध्यक्ष किशोर चंद्र देव कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि यह एक सही फ़ैसला है. कई राज्यों में संगठन चुनाव होने अभी तक बाक़ी हैं. किसी भी तरह के बदलाव यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होने चाहिए. फिर भी बदलाव से इनकार नहीं किया गया है...ज़रूरत पड़ी, तो लोगों को बदला जाएगा.’

इंतज़ार अभी बाक़ी है

शनिवार को जारी हुए प्रेस वक्तव्य से कांग्रेस के एक बड़े हिस्से की उम्मीदों पर पानी भी फिर गया है. यह वह हिस्सा है जिसे उम्मीद थी कि अध्यक्ष बनते ही राहुल गांधी पार्टी में जान फूंकने के लिए बड़ा फेरबदल करेंगे.

2014 के लोकसभा चुनावों में हुई कांग्रेस की भारी हार के बाद से पार्टी के ढांचे में बड़े बदलाव की बात की जाती रही है. आम चुनाव के बाद भी पार्टी को एक के बाद कई विधानसभा चुनावों में मात खानी पड़ी. ऐसे में कई लोगों को लग रहा था कि कमान थामते ही राहुल गांधी पार्टी की डूबती नैया को पार लगाने के लिए कुछ निर्णायक फैसले लेंगे.

लेकिन पार्टी ने राहुल गांधी को अपनी लगाम देने में बहुत देरी कर दी और ऊहापोह की स्थिति बनी रही. आख़िरकार पिछले साल 11 दिसंबर को उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाल लिया. इसके बाद पार्टी कार्यकर्ताओं को लगा कि अब जल्द ही बड़ा फेरबदल होगा. यह उम्मीद इसलिए भी बढ़ गई थी कि इस साल कई अहम राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. इनमें कर्नाटक भी शामिल है जो कांग्रेस की सत्ता वाला एकमात्र बड़ा राज्य है. इसके अलावा 2019 में लोकसभा चुनाव भी होने हैं.

वैसे इस फेरबदल को राहुल गांधी काफी लंबे समय तक टालेंगे ऐसा भी नहीं लगता. कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि फ़रवरी में संभावित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पूर्ण अधिवेशन में जब राहुल गांधी के अध्यक्ष पद की औपचारिक पुष्टि कर दी जायेगी उसके बाद शायद पार्टी संगठन में फेरबदल किया जा सकता है.

लेकिन मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में इसकी जल्द ही जरूरत है जहां चुनाव होने हैं और जहां कई महीनों से नेतृत्व को लेकर गतिरोध चल रहा है. छह महीने से वहां कांग्रेस प्रमुख अरुण यादव को बदले जाने की बात चल रही है. इसके बावजूद नेतृत्व इस पद के लिए कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया में से किसी एक पर फ़ैसला नहीं ले पाया है.

मां के नक्श-ए-कदम पर

देखा जाए तो इस मामले में राहुल गांधी अपनी मां और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए ही दिखायी दे रहे हैं. वे इस तरह के फैसले झटपट करने में विश्वास नहीं करती थीं. शायद उन्हें लगता था कि ऐसा करने पर पार्टी के असंतुष्ट नेता उनका काम मुश्किल बना सकते हैं.

जानकारों के मुताबिक राहुल गांधी भी पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने से पहले कोई बड़ा टकराव मोल नहीं लेना चाहते, इसलिए वे अभी व्यापक फेरबदल से बच रहे हैं. उन्होंने समय-समय पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को इस बात का भरोसा दिलाया है कि उन्हें रिटायरमेंट पर भेजने का उनका कोई इरादा नहीं है. सार्वजनिक रूप से भी राहुल गांधी कई बार कह चुके हैं कि वे अनुभव को बहुत अहमियत देते हैं.

लेकिन सोनिया गांधी की अत्यधिक सावधानी वाली शैली ने उनकी यथास्थितिवादी की छवि भी बनाई थी. यानी एक ऐसा शख्स जो चीजें जैसी हैं उन्हें वैसे ही चलते देना चाहता है. यहां राहुल गांधी कुछ अलग नजर आते हैं. पार्टी में क़द बढ़ने से पहले ही वे संगठन में कई बदलाव कर चुके हैं. यह जरूर है कि ये बदलाव एक झटके में नहीं बल्कि धीरे-धीरे किये गये.

उदाहरण के लिए, अप्रैल में, वरिष्ठ पार्टी नेता दिग्विजय सिंह के हाथों से कर्नाटक चुनाव की ज़िम्मेदारी लेकर इसे राहुल गांधी के विश्वासपात्र केसी वेणुगोपाल को दे दिया गया. मई में उन्होंने अपेक्षाकृत जूनियर माने जाने वाले अविनाश पांडे को पार्टी महासचिव बनाकर उन्हें राजस्थान की ज़िम्मेदारी सौंप दी थी जहां इस साल चुनाव होने हैं. सितंबर में राहुल गांधी के वफ़ादार दीपक बाबरिया को मध्य प्रदेश का चुनाव प्रभारी और कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया गया था. इसके अलावा 30 दिसंबर को उन्होंने मेघालय कांग्रेस की कमान डीडी लपांग की जगह सेलेस्टाइन लिंगदोह के हाथों में दे दी.

इसके साथ-साथ राहुल गांधी ने अशोक गहलोत जैसे दिग्गज नेताओं को महत्वपूर्ण कार्य सौंपते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी खुश रखने का ख़्याल बख़ूबी रखा है. राहुल गांधी ने पिछले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले ही अशोक गहलोत को गुजरात का प्रभारी बना दिया था जबकि सुशील कुमार शिंदे को उन्होंने हिमाचल प्रदेश की ज़िम्मेदारी सौंप दी थी.

साफ है कि राहुल गांधी कांग्रेस के ढांचे में झटके से बदलाव नहीं चाहते. वे फूंक-फूंककर और नपे-तुले कदम रखना चाहते हैं जिससे कांग्रेस बिना किसी अंदरुनी टकराहट के अपने मौजूदा संकट से बाहर निकले.