2014 लोकसभा चुनाव के वक्त जनता से वोट मांगते हुए नरेंद्र मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर कई वादे और दावे किए थे. अपना तीन चौथाई कार्यकाल पूरा होने के बाद सरकार इनमें से कई वादे पूरे कर चुकी है. लेकिन कइयों के साथ ऐसा नहीं है. इनमें विदेशों से कालाधन वापस लाने और विकास दर बढ़ाकर 10 फीसदी कर देने जैसे वादे शामिल हैं. इसे देखते हुए सवाल उठना लाजिमी है कि आम लोगों के लिहाज से मोदी सरकार का शासन कैसा माना जाए.
वादे जो वादे ही रह गए
1. विदेशों में जमा कालेधन की वापसी पर सरकार की गंभीरता समझने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का तीन साल पहले दिया गया बयान याद करना चाहिए. दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त एक चैनल से उन्होंने कहा था कि बाहर से कालाधन लाकर हर परिवार के खाते में 15 लाख रुपये जमा करने वाला वादा एक ‘जुमला’ था. इसका मतलब यह हुआ कि इस वादे के आधार पर नरेंद्र मोदी का समर्थन करने वाले इस सरकार से निराश हुए हैं. अमित शाह ने तब कहा था कि सब जानते हैं कि कोई सरकार इन पैसों को लोगों को देने के बजाय देश के विकास में खर्च करना पसंद करेगी. हालांकि मोदी सरकार ने कभी नहीं बताया कि उसके प्रयासों से देश में कितना कालाधन वापस लौट चुका है.
2. नरेंद्र मोदी का दूसरा बड़ा वादा दो करोड़ रोजगार देने का था. रोजगार पर किसी विस्तृृत सर्वेक्षण के अभाव में इस वादे का मूल्यांकन करना काफी कठिन है. लेकिन लेबर ब्यूरो के विभिन्न सर्वेक्षणों का औसत लेने पर पता चलता है कि आठ फीसदी की हिस्सेदारी वाले संगठित क्षेत्र में मोदी सरकार हर साल औसतन 3.4 लाख रोजगार ही पैदा कर सकी है. एक अन्य आकलन के अनुसार असंगठित क्षेत्र में यदि इसी दर से रोजगार पैदा हुआ मान लें तो भी कुल आंकड़ा दावों से बहुत पीछे है. ऊपर नोटबंदी के बाद के हालात और खराब हए हैं.
बेरोजगारी की समस्या से सरकार को आगाह करते हुए ‘करियर्स 360’ नामक मैगजीन के प्रकाशक महेश्वर पेरी ने पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला खत लिखा था. इस पत्र में उन्होंने कहा था कि देश को यदि युवा शक्ति का लाभ उठाना है तो अगले एक दशक में 34 करोड़ रोजगारों का इंतजाम करना होगा. इसका मतलब देश में हर साल अभी का लगभग आठ गुना (तीन करोड़ से ज्यादा) रोजगार पैदा करने होंगे. जानकार इस लक्ष्य को मौजूदा हालात में नामुमकिन-सा मानते हैं.
3. अर्थव्यवस्था की विकास दर के बारे में नरेंद्र मोदी ने पिछले चुनाव में दावा किया था कि यह दर बढ़ाकर 10 फीसदी कर दी जाएगी. उन्होंने इसे बहुत जरूरी बताते हुए कहा था कि ऐसा होने से लोगों की समृद्धि बढ़ेगी और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे. लेकिन हाल के एक सर्वेक्षण के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 में देश की विकास दर मुश्किल से 7.5 फीसदी तक जा सकती है. यह आंकड़ा मनमोहन सिंह के आखिरी वर्ष की विकास दर 6.9 फीसदी (संशोधित) से थोड़ा ही ज्यादा होगा. यानी जी-तोड़ कोशिश के बाद भी सरकार विकास दर बढ़ाने का अपना वादा पूरा करने में नाकामयाब रही है.
4. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रयासों की बात करें तो यह मानना पड़ेगा कि मौजूदा सरकार के राज में अब तक कोई बड़ा घोटाला सामने नहीं आया है. हालांकि जानकारों के मुताबिक यह जरूर है कि सरकार लोकपाल, सीबीआई जैसी भ्रष्टाचार निरोधी संस्थाओं को मजबूत करने में अब तक नाकाम रही है.
5. लोगों को मजबूत बनाने वाली शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के मामले में भी केंद्र सरकार का प्रदर्शन निराशाजनक कहा जा सकता है. कई लोग मानते हैं कि पिछले दो-तीन साल में छात्रों के बढ़े असंतोष का मुख्य कारण शिक्षा पर होने वाली खर्च में की गई कटौती है. स्वास्थ्य क्षेत्र में भी पर्याप्त राशि के अभाव में सरकार ने अपने हाथ बांध रखे हैं. गरीबी उन्मूलन के साथ समाज के वंचित तबकों की मजबूती के लिए खर्च होने वाली राशि में भी कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो पायी है. जानकारों के अनुसार केंद्र सरकार अपनी राजकोषीय सेहत दुरुस्त करने के लिए हर साल अपना खर्च लगातार घटा रही है. इसके चलते पिछले चार साल में केंद्र का बजट खर्च जीडीपी के 13.9 फीसदी से घटकर 12.7 फीसदी हो गया है. अब सरकार की आमदनी बढ़े बिना खर्च में बढ़ोतरी हो पाना संभव नहीं लग रहा है.
6. मोदी सरकार किसानों से जुड़े कई वादे भी अब तक पूरा करने में नाकाम रही है. 2014 के चुनाव के समय नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यदि उनकी सरकार बनी तो किसानों को फसल की लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाया जाएगा. हालांकि अभी तक सरकार इस वादे पर कभी गंभीर नहीं दिखी है. नोटबंदी ने उल्टा किसानों की हालत पहले से खराब कर दी है. जानकारों के अनुसार किसानों के आंदोलन और कर्ज माफी की मांग का मुख्य कारण यही रहा है. हर खेत को सिंचाई देने का वादा भी अभी काफी दूर है. फसल बिक्री के लिए बाजार को विविध और विकसित करने के मामले में भी सरकार को कुछ खास सफलता नहीं मिली है.
7. बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में सरकार का प्रदर्शन हालांकि मिला-जुला माना जा सकता है. सड़क, विमानन परिवहन, बिजली, गैस आदि के क्षेत्र में उसका काम बढ़िया माना जा रहा है. लेकिन रेलवे और दूरसंचार के क्षेत्र में सरकार की कोशिश अभी तक अपना असर नहीं दिखा पाई है. ये क्षेत्र करोड़ों नागरिकों की जिंदगी को काफी प्रभावित करते हैं. जानकारों के अनुसार अर्थव्यवस्था और बैंकों की दशा खराब रहने से देश के बुनियादी ढांचे में उम्मीद के मुताबिक निवेश नहीं हो सका है.
सरकार को गांवों, किसानों और युवाओं की चिंता करनी चाहिए
वैसे जानकारों का मानना है कि इन कुछ नाकामयाबियों को छोड़ दें तो आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार का काम बढ़िया रहा है. हालांकि दिक्कत यह है कि इनके ज्यादातर फैसले दीर्घकालिक हैं यानी वे लंबे समय में अपना असर दिखाएंगे. ऐसे लोग यह भी मानते हैं कि जो फैसले अपना असर दिखा भी रहे हैं उनका गांव, किसान और युवा से ताल्लुक क ही है. ऐसे में कई विश्लेषकों को आशंका है कि कहीं सरकार को अगले आम चुनाव में इसका खामियाजा न उठाना पड़े.
आलोचकों के अनुसार केंद्र सरकार मंत्रियों के कम अनुभव के चलते अभी भी नीतियों में उलझी हुई है जिसके चलते उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहा है. दूसरी ओर खर्च में कटौती की मजबूरी के चलते सरकार के पास खर्च के लिए जरूरी धन नहीं है. इससे वह गांव, किसान और युवाओं का ख्याल नहीं रख पा रही है. गुजरात चुनाव में ग्रामीण इलाकों में भाजपा को मिले झटके को आलोचक केंद्र सरकार के लिए एक सबक मानते हैं. इनके अनुसार अगले लोकसभा चुनाव में केंद्र में दोबारा सत्तारुढ़ होने की सरकार की ख्वाहिश को ये वर्ग पूरा होने से रोक सकते हैं. जानकारों के अनुसार सरकार के पास अभी भी एक साल का वक्त है जिसमें वह अपने फैसलों से इन लोगों की नाराजगी दूर कर सकती है. ऐसे में केंद्र का अगला बजट लोकलुभावन होने के आसार हैं.
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