सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस पर चिंता जताई कि लाखों बेघर लोगों को सरकार द्वारा चलाई जा रही सामाजिक कल्याण योजनाओं का फायदा नहीं मिल रहा. एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत को बताया गया कि आधार बनवाने के लिए स्थायी पता जरूरी है. इस पर जस्टिस मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने सवाल किया कि जब इन लोगों के पास कोई स्थाई पता ही नहीं है तो ये आधार कार्ड कैसे बनवाएंगे. उन्होंने कहा कि जिनके पास आधार नहीं है क्या सरकार के लिए उनका कोई अस्तित्व नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय पर आई है जब केंद्र सरकार उसके सामने बार-बार यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि आधार को सामाजिक कल्याण की योजनाओं से जोड़ने का फैसला जनहित में है. शीर्ष अदालत ने कहा कि सरकार के इस रुख से लाखों लोग इन योजनाओं के फायदे से वंचित रह जाएंगे. इसके बाद अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से और समय मांगा और कहा कि वे इस बारे में आधार जारी करने वाली संस्था भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) से बात करेंगे. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कई लोग शहरों में आने के बाद ही बेघर हुए हैं और गांव में उनका स्थाई पता रहता है. तुषार मेहता ने कहा कि ये लोग उस पते पर आधार बना सकते हैं.

2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में ऐसे 17 लाख 73 हजार लोग हैं जिनके सर के ऊपर छत नहीं है. इनमें से करीब 53 फीसदी लोग शहरी इलाकों में रहते हैं जबकि बाकी गांवों में.