नौवीं सदी में दक्षिण भारत में एक प्रसिद्ध संत हुए माणिक्कवाचकर. पहले वे पांड्य राजवंश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे. लेकिन जब उनमें आध्यात्मिकता जागी, तो सबसे पहले उन्होंने प्रधानमंत्री पद का त्याग कर दिया. माणिक्कवाचकर ने तमिल में लिखा - कटारैयान वेंडेन करपडम इनियुम’. यानी इससे आगे मैं नहीं चाहता कि मुझे चतुर या राजनीतिज्ञ लोगों की संगति मिले. वास्तव में, राजसत्ता और राजनीति के लिए जिस प्रकार की चतुराई की जरूरत होती है, वह आध्यात्मिकता की दुश्मन होती है. सत्ता से जुड़ा ऐश्वर्य और अहंकार किसी भी आध्यात्मिक साधक की सेवा-भावना को नष्ट करने के लिए पर्याप्त होता है. इसलिए सच्चे संतों और समाज-सेवियों ने स्वयं को सत्ता से दूर ही रखा.

ऐसी ही एक कथा संत तुकाराम के बारे में भी है. संत तुकाराम के कीर्तन की प्रसिद्धि सुनकर शिवाजी महाराज एक दिन उनका कीर्तन सुनने आए. कीर्तन सुनकर वे इतने मुग्ध हो गए कि उन्होंने वापस जाकर तुकाराम का सत्कार करने की सोची. उन्होंने तुकाराम के सत्कार के लिए घोड़े, पालकी वगैरह उनके घर भिजवाई. तुकाराम ने जब यह देखा तो उन्हें इतनी पीड़ा हुई कि लगा जैसे बिच्छु ने डंक मारा हो! उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि ‘हे ईश्वर! यह कैसी विपत्ति ला रहे हो? मैंने कौन सा पाप किया है?’ इस प्रसंग पर विनोबा ने लिखा है ‘तुकाराम ने पहचान लिया था कि सत्ता से जनता पर दबाव आता है और अच्छाई के बदले बुराइयां पैदा होती हैं.’

पूछने वाले पूछ सकते हैं कि योगी हुए तो क्या? क्या हम संसार छोड़कर पूरी तरह अकर्मण्य हो जाएं? वे कह सकते हैं कि गीता में तो कहा गया है कि योग: कर्मसु कौशलम्’ यानी शुभ कर्मों में कुशलता ही योग है. और यह भी कि ‘छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः’ यानी योगी को तो प्राणीमात्र के हित में तल्लीन रहना चाहिए. सच भी है. गीता का निष्काम कर्मयोग गृहस्थ और संन्यासी सबके लिए है. और उसकी असली परीक्षा गृहस्थ जीवन और सांसारिक जीवन में ही होती है. ब्रह्मचर्य से सीधे संन्यास में छलांग लगा देनेवालों के साथ खतरा होता है कि यदि उनमें संतों और बुद्धों के दर्जे की करुणा नहीं आ पाई, तो वे गृहस्थ-बहुल संसार की बहुत सी व्यावहारिक समस्याओं को समानुभूतिपूर्वक समझ पाने की संवेदना और दक्षता से वंचित रह जाते हैं. आजकल के नामधारी योगियों और साध्वियों के साथ वैसा ही है. इसे बहुत बारीकी से समझने की जरूरत होगी.

अभी राजनीति में यह नुस्खा बड़ा काम करता है कि फलां का तो परिवार या संतान ही नहीं है, इसलिए उसके भ्रष्ट होने की संभावना बहुत कम है. लोग सोचते हैं कि वह भला किसके लिए धन अर्जेगा! फलां तो योगी नामधारी है, इसलिए वह योगियों की तरह समत्व और समदर्शिता वाला होगा. फलां तो साध्वी हैं, इसलिए वे राजनीति में आकर राजनीति का आध्यात्मीकरण कर देंगी. फलां तो खुद को फकीर कहता है, इसलिए राजनीति में रहकर भी वह सत्ता को मिट्टी ही समझता होगा, इत्यादि इत्यादि. जबकि गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि इन सबके राजनीति में आने से राजनीति का आध्यात्मीकरण न होकर, आध्यात्म का राजनीतिकरण ही ज्यादा हुआ है. और चूंकि आज के नामधारी योगी और साधु-साध्वी प्रायः सांप्रदायिक संकीर्णताओं से ऊपर नहीं उठ पाते, इसलिए इनके प्रवेश से राजनीति का घनघोर सांप्रदायीकरण भी हो रहा है.

मई, 1925 में किसी ने महात्मा गांधी को चिट्ठी में लिखा- ‘मैं आपके भाषण ध्यान से पढ़ता हूं. मुझे उनमें भारी विसंगति दिखाई देती है. एक ओर आप मनुष्य के सामने संन्यासी का आदर्श रखते हैं और दूसरी ओर स्वयं स्वराज्य के लिए प्रयत्नशील हैं. एक संन्यासी को इसकी क्या जरूरत? आप इन दोनों विचारों में संगति कैसे बिठाते हैं?’ आज भी आप विश्वविद्यालयी प्रोफेसरों से इस विषय पर चर्चा करें, तो पाएंगे कि उनमें से ज्यादातर अकादमिक लोग दिन-रात इसी चक्कर-घिन्नी में गोल-गोल घूमते रहते हैं कि गांधी राजनीतिक थे या आध्यात्मिक? या कि कितने अंश राजनीतिक थे और कितने आध्यात्मिक? या कि इन दोनों को एक साथ साधने का उनका प्रयास कहीं दिखावा मात्र तो नहीं था?

गांधी ने इस पत्र के जवाब में 21 मई, 1925 को ‘यंग इंडिया’ में लिखा था- ‘मुझे पता नहीं कि मैंने जनता के सामने संन्यासी का आदर्श रखा है. मैंने तो भारत के सामने लगातार स्वराज्य का आदर्श रखा है. हां, ऐसा करते हुए मैंने सादगी का उपदेश जरूर दिया है. मैंने सदाचार का भी उपदेश किया है. लेकिन सदाचार और सादगी और ऐसे गुण अकेले संन्यासियों की संपत्ति या विशेषाधिकार तो नहीं है. साथ ही, मैं यह भी नहीं मानता कि संन्यासी एकांतवासी हो और दुनिया की कुछ भी फिक्र न करे. बल्कि संन्यासी तो वह है जो अपनी चिंता न कर चौबीसो घंटे औरों की फिक्र करे. वह पूर्णतया स्वार्थ भाव से मुक्त होकर भी निःस्वार्थ कामों में लगा रहे.’

उन्होंने आगे लिखा- ‘एक सच्चा संन्यासी तभी त्यागी कहा जाएगा जब वह स्वराज्य (केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं) अपने लिए नहीं, बल्कि औरों के लिए प्राप्त करने की चिंता करे. क्योंकि (‘स्व पर शासन’ के आध्यात्मिक अर्थों वाला) स्वराज्य उसे तो प्राप्त ही है. उसे अपने लिए दुनिया में किसी भी चीज की आकांक्षा नहीं रहती. पर इसके यह मानी नहीं है कि वह औरों को दुनिया में अपना स्वत्व पहचानने और प्राप्त करने में मदद न दे. यदि प्राचीन काल के संन्यासी समाज के राजनीतिक जीवन की चिंता नहीं करते थे, तो उसका कारण यह है कि उस काल की समाज रचना भिन्न प्रकार की थी. पर आज तो राजनीति जीवन के प्रत्येक अंग को प्रभावित करती है. हम चाहें या न चाहें, सैकड़ों बातों में हमारा संबंध राज्य से पड़ता है. हमारे नैतिक जीवन पर राज्य का असर पड़ता है. इसलिए समाज का सबसे बड़ा हितैषी और सेवक होने के कारण संन्यासी का ताल्लुक राजा-प्रजा के बीच के संबंधों में आए बिना नहीं रह सकता.’

इसके अगले ही साल गीता के छठे अध्याय का भाष्य करते हुए गांधी ने संन्यासियों द्वारा निष्काम कर्म की एक सुंदर व्याख्या की थी- ‘करोड़ों लोग निष्काम कर्म से ही संन्यास का फल प्राप्त करते हैं. यदि वे (अतिरिक्त प्रयास और बाह्याचार के आधार पर) संन्यासी होने जाएं, तो इधर या उधर कहीं के न रहेंगे. इस तरह संन्यासी होने गए तो मिथ्याचारी हो जाने की पूरी संभावना है, और कर्म से तो गए ही; मतलब सब खोया. पर जो मनुष्य अनासक्ति के साथ कर्म करता हुआ शुद्धता प्राप्त करता है, जिसने अपने मन को जीता है, जिसने अपनी इंद्रियों को वश में रखा है, जिसने सब जीवों के साथ अपनी एकता साधी है और सबको अपने समान ही मानता है, वह कर्म करते हुए भी उससे अलग रहता है अर्थात् बंधन में नहीं पड़ता.’

इसलिए आज के योगी या साध्वी नामधारी राजनेता यदि कर्मयोग के नाम पर अपनी राजनीति का औचित्य साबित करने का प्रयास करें, तो उन्हें वास्तविक कर्मयोग की उपरोक्त कसौटी पर कसना चाहिए. ऐसे राजनीतिक योगी अपने मन और इंद्रिय को क्या जीतेंगे, जो मुंह खोलते ही समाज में विभाजन पैदा करनेवाली बातें बोलें! ऐसे कथित योगी और संन्यासी सभी जीवों के साथ एकता क्या साधेंगे, जो अभी भी जाति और संप्रदाय के संकीर्ण नजरिए से ही समाज और राजनीति को देख रहे हैं! ऐसे योगी बंधन से क्या मुक्त होंगे, जो येन-केन-प्रकारेण किसी दलविशेष की सत्ता स्थापित करने के लिए ही दिन-रात चिंतित रहते हों! इसलिए केवल योगी और साध्वी का गेरुआ चोगा धारण करनेवाले दलबंदियों के लिए संत कबीर की हिदायत ध्यान में रखनी चाहिए-भेष देख मत भूलिये, बूझि लीजिये ज्ञान। बिना कसौटी होत नहिं, कंचन की पहचान।।’

यदि हम मध्यकालीन भारत के संतों को देखें तो उन्होंने स्वयं श्रम करते हुए अपना गुजारा किया. इनमें से कई तो गृहस्थ ही थे. लगभग इन सभी संतों ने अपना पेशा आजीवन जारी रखा. कबीर कपड़ा बुनते रहे, संत सैन ने नाई का पेशा बरकरार रखा, नामदेव ने कपड़े पर छपाई जारी रखी, दादू दयाल ने रुई धुनने का काम नहीं छोड़ा और गुरु नानक ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष खेती करते हुए ही बिताए. और इन सबमें रैदास का पेशा तो एकदम जुदा था. वे मोची थे. जूते बनाते थे और उसकी मरम्मत भी करते थे. तभी तो कबीर कहते हैं- धारा तो दोनों भली, गिरही कै बैराग। गिरही दासातन करे, बैरागी अनुराग।।’ लेकिन जब वे योगी नामधारियों को बंधन में पड़ते देखते हैं, तो कारुणिक स्वर में कह उठते हैं- बैरागी बंधन करै, ताका बड़ा अभाग।’

योगी या साध्वी होना राजनीति में प्रवेश के लिए कोई अयोग्यता नहीं है. लेकिन क्या राजनीति का अर्थ केवल सत्ता की राजनीति या दलबंदी की राजनीति है? सत्ता, पद और दलबंदी की राजनीति तो संत कबीर के शब्दों में कबहुंक दाग लगावै कारी हांड़ी हाथ’ जैसी है. उसमें पग-पग पर राग-द्वेष, छल-झूठ, संकीर्णता, अहंकार और टकराव के अवसर रखे-रखाए हैं. इसलिए जिस साधक ने जीवन में योग और संन्यास के माध्यम से मुक्ति का मार्ग सचमुच चुना है, वह सत्ता, पद औऱ दल की राजनीति में जाएगा ही नहीं. वह तटस्थ रूप से लोकसंग्रह और जन-जागरण के जरिए राजनीति पर सर्वहितकारी अंकुश रखने का कार्य करेगा. एक निष्पक्ष और सर्वस्वीकार्य आचार्य की भांति वह समाज और राजनीति का मार्गदर्शन करेगा. उसकी ताकत राजनीतिक और दलवादी सत्ता से नहीं, बल्कि अपने नैतिक और आध्यात्मिक बल की सत्ता से आएगी. तभी उसमें सच्ची निर्भयता, निर्वैरता और निष्पक्षता आ पाएगी.

अभी तो हालत ऐसी है कि गोरखनाथ की परंपरा से आनेवाले योगी भी राज-पाट के मोह में पड़े हैं. वही गोरखनाथ जिनके गुरु मछेन्द्रनाथ जब जीवन की उत्तरावस्था में इसी राज-पाट और भोग-विलास के जाल में फंस गए, तो उस फंदे से छुड़ाने के लिए गोरखनाथ ने कहा था- गुरु खोजो गुरुदेव, गुरु खोजो बदन्त गोरख ऐसा।मुक्ते होई तुम्हें बंधनि पड़िया ये जोग है कैसा।।’ और यह भी कि बूढ़े होइ तुम्हें राज कमायाना तजी मोह माया।’ आज तो वैसे शिष्य भी न रहे, जो राज-पाट के मोह में पड़े अपने गुरु और महंत से कह सके कि चेत मछेन्दर गोरख आया, गोरख आया।’ आज तो हर जगह हालात ऐसे हैं कि ‘बोला सो मारा गया’.

वह समय कुछ और था जब कबीर जैसे संत पूरी करुणा और निर्भयता से यह भी कहने का साहस रखते थे -

ऐसो योगिया बदकर्मी, जाके गमन अकाश न धरणी।
कर्म न वाके, धर्म न वाके, योग न वाके युक्ती।
सींगी पात्र किछउ नहिं वाके, काहेक मांगे भुक्ति।।
नटवट बाजा पेखनी पेखे, बाजीगर की बाजी।
कहहिं कबीर सुनो हो सन्तो, भई सो राज बिराजी।।’