सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाए जाने की अनिवार्यता खत्म करने का सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला हर लिहाज से स्वागतयोग्य है. एक दिसंबर, 2016 को जस्टिस दीपक मिश्रा और अमितवा रॉय की बेंच ने सभी सिनेमाघरों में फिल्म की शुरुआत से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य कर दिया था. इस फैसले के पीछे इन जजों का तर्क था कि यह कदम नागरिकों में राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना मजबूत करने का काम करेगा. अब सुप्रीमकोर्ट के ही ताजा फैसले ने इस तारीख के पहले की स्थिति बहाल कर दी है.

शुरुआत में सरकार ने अदालत के इस आदेश का समर्थन किया था, लेकिन अब समझदारी दिखाते हुए उसने अपने रुख में भी बदलाव कर लिया है. सीधी बात यही है कि नागरिकों में देशभक्ति और राष्ट्रवाद का जज्बा किसी कानून या निर्देश से नहीं भरा जा सकता. ये भावनाएं तो लोगों में तब पैदा होती हैं जब वे अपने लक्ष्यों और उपलब्धियों के प्रति एक साझापन महसूस करते हैं.

तिरंगा, अशोक चिह्न और संविधान की तरह ही राष्ट्रगान नागरिकों के एक साझेपन का प्रतीक हैं. इसीलिए शीर्ष अदालत का यह कहना सही है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का कहीं भी अपमान नहीं होना चाहिए. सरकार ने इस मामले पर अंतिम फैसले के लिए एक समिति का गठन किया है, हालांकि इस समिति को भी यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावना थोपी नहीं जा सकती बल्कि इसे सरकारों-नागरिकों के व्यवहार से पैदा किया जाता है.

राष्ट्रगान से जुड़ा विवाद अदालत के लिए भी मार्गदर्शक साबित होना चाहिए ताकि वह अपनी न्यायिक सीमाओं को लांघने या निजी मान्यताओं में दखल देने से बचे. सुप्रीम कोर्ट को कानूनी मामलों पर ही ध्यान देना चाहिए. उसे अपने फैसलों से उन सिद्धांतों और भावनाओं को आवाज देना चाहिए जो संविधान में दर्ज हैं.

भारत जैसे एक स्वतंत्र और खुले लोकतांत्रिक समाज में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका एक सर्वोच्च मध्यस्थ की होनी चाहिए जहां वह संवैधानिक भावना के अनुरूप सामाजिक बदलाव लाने में मदद कर सके. कुल मिलाकर कार्यपालिका, विधायिका या फिर आम लोगों के साझा मुद्दों में दखल न देकर अदालत को अपने अधिकार क्षेत्र का सम्मान करना चाहिए. (स्रोत)