निर्देशक : अनुराग कश्यप

लेखक : अनुराग कश्यप, विनीत सिंह

कलाकार : विनीत सिंह, जोया हुसैन, जिमी शेरगिल, रवि किशन

रेटिंग : 2.5/5

मुक्काबाज की शुरुआत एक ऐसे दृश्य से होती है जिसे हम और आप पिछले कुछ वक्त से अखबारी सुर्खियों के जरिए कई बार अपने आस-पास घटते देख चुके हैं. इस दृश्य में गायों से भरे एक ट्रक को कुछ लोग रोकते हैं और उसमें बैठे लोगों को मार-पीटकर उनसे जबरन यह कहलवाने की कोशिश करते हैं कि इन गायों को काटने के लिए ढोया जा रहा था. अगले कुछ दृश्यों से अंदाजा लग जाता है कि ट्रक को रोकने वाले झुंड का संबंध एक प्रभावशाली नेता से है. इस सीक्वेंस से कई कथित गोप्रेमी जनप्रतिनिधियों को जोर की मिर्ची लग सकती है. यानी कि इस दौर के एक राजनीतिक किरदार का इससे ईमानदार और वास्तविक परिचय कुछ और नहीं हो सकता था.

मुक्काबाज अपने शुरुआती दृश्यों में नायक-नायिका के प्यार और नायक-खलनायक के पंगे को एक साथ परवान चढ़ते दिखाती है. यहां नायक मुक्काबाज है, मुक्केबाज नहीं और यह अंतर फिल्म में भली तरह से समझाया भी गया है. तो किस्सा यूं है कि मुक्काबाज नायक श्रवण सिंह, अपनी प्रेमिका के चाचा और अपने कोच भगवान दास मिश्रा से सिर्फ इसलिए भिड़ जाता है कि वे मुक्केबाजी छोड़कर खिलाड़ियों से सबकुछ करवाना चाहते हैं. इस सबकुछ में लहसुन छीलने से लेकर उस तरह की राजनीतिक घटना को अंजाम देना तक शामिल है जिसका जिक्र ऊपर किया गया है. घोर जातिवादी कोच मिश्रा इसे चेलों द्वारा की गई ‘ब्राह्मण’ गुरू की सेवा कहते हैं.

गुरू-चेले की इस भिड़ंत को देखते हुए आपको अलग-अलग जॉनर की फिल्मों का मजा मिलता है. इसमें रोमांस को कुचलती राजनीति दिखती है तो खेलभावना पर भारी पड़ता जातिवाद भी दिखता है और इस सब से एक्शन की गुंजाइश भी पैदा होती है. यानी फिल्म एक्शन, स्पोर्ट्स, रोमांस, पॉलिटिक्स और सोशल ड्रामा सबका मजा एक साथ देने की कोशिश करती है. पर अफसोस कि इस खिचड़ी में फिल्म की मूल आत्मा खो जाती है, जिसे राजनीति, खेल और जरूरतों का मेल दिखाना था.

फिल्म से निराशा की असली वजह इसका अनुराग कश्यप जॉनर का न होना है. मुक्काबाज देखते हुए आपको एहसास होता है कि इस बार अनुराग उतने क्रूर नहीं हो पाए जितना होने का फिल्म उन्हें मौका देती है. अंधेरे-सर्द थिएटर में बैठे आप लगातार भगवान दास से एक ऐसे कारनामे की उम्मीद करते हैं जो आपको सिहरा देगा या श्रवण सिंह का कोई दृश्य सर्दी में गर्माहट बढ़ाने का काम करेगा, लेकिन ये दोनों ही बातें आखिर तक नहीं होतीं.

भगवान दास और श्रवण सिंह की टॉम एंड जैरी सी इस भागमभाग के बीच फिल्म बोरियत के बैरोमीटर पर ऊपर की तरफ ही बढ़ती रहती है. खासतौर पर जब नायक नौकरी, प्रैक्टिस और बीवी के बीच तालमेल बिठाने की लंबी कोशिश करता है या गुमशुदा नायिका को ढूंढते हुए बीच-बीच में जाकर अपनी प्रैक्टिस करता दिखता है, और बार-बार दिखता है. इनके अलावा भी इस तरह के कई सीक्वेंस आते हैं जब आप सोचते हैं कि पहले से पता होता तो इतने टाइम में पॉपकॉर्न खरीदकर आ जाते.

पटकथा में हिचकोलों के बावजूद, बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी के चलते फिल्म देखने और खासतौर पर सुनने लायक बनी रहती है. साथ ही यहां कुछ दृश्य कमाल के दिलचस्प और मजेदार होने के साथ असलियत के काफी करीब लगते हैं. जैसे - दोस्त के घर पर नायक-नायिका के पकड़े जाने पर नायक का पिछले और नायिका का आगे के दरवाजे से जाना या नायक के जिला स्तरीय प्रतियोगिता जीतने पर मिले कप को देखकर उसके पिता का झल्लाते हुए यह कहना कि ‘न इसमें चाय पी सकते हैं और न इससे कील ठोक सकते हैं.’ यहां संवाद देसी और चुटीले होने के साथ-साथ कई बार थोड़े ऑफेंसिव जरूर हो जाते हैं, लेकिन परिस्थितियों और किरदारों के हिसाब से फिट होने के चलते उतने ही मारक बने रहते हैं.

अभिनय की बात करें तो जिमी शेरगिल का किरदार उन्हें कुछ नया करने का मौका नहीं देता इसलिए वे वही करते दिखते हैं जो हम उन्हें पिछली कई फिल्मों में करते देख चुके हैं. ऐसा ही कुछ रवि किशन के पात्र के साथ भी हो जाता अगर जाति वाला एंगल देकर उनके कुछ दृश्य न रखे गए होते. मुख्य किरदार निभाते हुए विनीत सिंह एक बार फिर अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं. इस बार उनके साथ अच्छा यह हुआ है कि लोग किरदार के साथ-साथ उनका नाम भी जानेंगे. फिल्म में लड़की ताड़ने से लेकर मुक्केबाजी करने तक के दौरान उनके चेहरे पर दिखने वाली ईमानदारी और भदेसपन खासतौर पर प्रभावित करता है. इसके अलावा मुक्केबाजी सीखने के लिए की गई उनकी दो साल की मेहनत स्क्रीन पर नजर आती है. इसके चलते उनके डोलों पर मरने वालियों की गिनती यानी फीमेल फॉलोइंग बढ़ने वाली है, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता.

फिल्म का शो-स्टीलर किरदार सुनयना यानी जोया हुसैन का है. वे इस फिल्म की सबसे बेहतरीन देन हैं. जोया हुसैन एक न बोल सकने वाली लड़की को इतनी ईमानदारी और नैचुरल तरीके से दिखाती हैं कि आप सुनयना को भली तरह से समझने लगते हैं. वन लाइनर्स की भरमार वाली इस फिल्म में सबसे वजनदार उनके अनबोले संवाद हैं. सिर्फ जोया हुसैन के लिए हमने इस फिल्म की रेटिंग में आधा स्टार बढ़ा दिया है.

अनुराग कश्यप की बाकी फिल्मों की तरह इस बार भी संगीत एकदम स्टेजतोड़ परफॉर्म करने का बुलावा देने वाला है. डॉ सुनील जोगी की कविता का नया संस्करण ‘मुश्किल है अपना मेल प्रिये’ तो पहले ही लोकप्रिय हो चुका है. इसके साथ-साथ ‘पैंतरा’, ‘बहुत हुआ सम्मान’ और ‘छिपकली’ खासतौर सुनने लायक हैं जो फिल्म में आत्मा की आवाज से सुनाई देते हैं. कुल मिलाकर शानदार प्लॉट, बढ़िया अभिनय, दर्शनीय सिनेमैटोग्राफी और थिरका देने वाले संगीत के बावजूद फिल्म वह कमाल तो नहीं दिखा पाती जिसकी उम्मीद हम लेखक-निर्देशक अनुराग कश्यप से कर रहे थे. फिर भी यह मजेदार संवादों के लिए देखी जा सकने वाली एक औसत फिल्म जरूर साबित होती है. इस तरह कहा जा सकता है कि मुक्काबाज ने पंच बहुत मारे हैं, फिर भी वह नॉकआउट हो गया!