इस बार विश्व पुस्तक मेले की थीम ‘पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन’ है. छह तारीख को शुरू हुए इस मेले का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना था कि इंसान ने धरती का जरूरत से ज्यादा दोहन कर लिया है. उन्होंने अपील की थी कि पर्यावरण बचा रहे, इसके लिए लोगों को ईंधनचालित वाहनों की जगह साइकिल से और पैदल चलना चाहिए.

लेकिन आप पुस्तक मेले में घुसिए और आपको हॉल्स तक ले जाने के लिए मेले के संयोजक एनबीटी की गाड़ियां लगी नज़र आ जाएंगी. शायद आपको किसी कंडक्टर की आवाज़ भी सुनाई दे जाए कि ‘फ्री का फायदा उठाएं और पैरों को थकने से बचाएं.’ वह भी तब मेला इतना बड़ा नहीं है कि पैदल न घूमा जा सके. हालांकि ऐसी जगहों पर कई बुजुर्ग और शारीरिक रूप से अक्षम लोग भी होते हैं जिन्हें इस तरह की सहूलियत की ज़रूरत रहती ही है. लेकिन फिर यह बात भी है कि कम से कम थीम का खयाल रखने के लिए ही उनके लिए ई रिक्शा जैसा कुछ रखा जा सकता था.

थीम का खयाल रखने के लिए लगता है कि सिर्फ थीम पवेलियन है. यहां गोबर लिपी दीवारों से सजे हॉल मे चिड़ियों के गीत और पतंगों की कहानियों वाली किताबें हैं. साथ ही, पर्यावरण की चिंता को ढोते वॉल्यूम्स भी. लगता है कि इन सबके जरिये पृथ्वी को बचाने की औपचारिकता निपटा दी गई है .

मेरे पुस्तक मेले पहुंचने तक भीड़ आना शुरू हो चुकी है. हॉल्स तक पहुंचने के रास्ते में खड़े तमाम प्रकाशकों के नुमाइंदे अपने-अपने बुकलेट्स और पैंफ्लेट्स आने वालों को थमा रहे हैं. कोई ‘उम्मीद और विश्वास’ की किताब थमा रहा है तो कोई बाइबिल की शरण में जाने का संदेश तो कोई क्रांतिकारी साहित्य खरीदने की जगह का पता दे रहा है. और ये सारे कागज़ के पुर्जे हर आते जाते शख्स को लगभग जबरन थमाए जा रहे हैं. शायद यह जानते हुए भी कि 95 फीसदी लोग इन्हें या तो कुछ दूर जाकर सड़क पर ही फेंक देंगे या घर जाकर कूड़ेदान में. और ऐसे कुछ 100 किलो कागज़ बरबाद हो भी जाए तो क्या? उससे कौन सा पर्यावरण का नुकसान होना है. खैर.

पुस्तक मेले के बाहर बिखरे पैंफ्लेट और बुकलेट्स.
पुस्तक मेले के बाहर बिखरे पैंफ्लेट और बुकलेट्स.

पुस्तक मेला सुबह से ही गुलज़ार है. गुलज़ार से याद आया, इस मेले में गुलज़ार का पहला उपन्यास ‘टू’ काफी खरीदा जा रहा है जिसे हार्पर कॉलिन्स ने पिछले साल छापा था. लेकिन जब हम हार्पर कॉलिन्स से उनके सबसे ज़्यादा बिकने वाले तीन शीर्षकों के बारे में पूछते हैं तो तीन बड़े ही दिलचस्प नाम सामने आते हैं. पहली किताब है पाउलो कोएल्हो की हरदिल अजीज़ ‘द एल्केमिस्ट’, दूसरी जो आज कल वाकई काफी लोगों के हाथ में दिखने लगी है- ‘द सटल आर्ट ऑफ नॉट गिविंग अ फ*’ और तीसरी है रघुराम राजन की ‘आइ डू व्हाट आइ डू.’ यानी लोग अब भी किताबों में ज़िंदगी को देखने का नया नज़रिया तलाशना चाहते हैं. कम से कम पुस्तक मेलों में जाकर तो ऐसा ही लगता है.

मेले में आने वाले लोगों को देखकर उन्हें मोटा-मोटी तीन किस्मों में बांटा जा सकता है. पहली किस्म के लोग वे हैं जो कुछ घंटों में चार-पांच थैले किताबें भरकर कुछ छाती चौड़ी कर और कुछ शहीदाना अंदाज़ में मेले से बाहर निकलते हैं. इन्हें किताबें इतनी अच्छी लगती हैं कि ये लगभग हर पसंदीदा लेखक की हर किताब खरीद लेना चाहते हैं. पर क्योंकि किताब खरीदना और सारी किताबें पढ़ लेना दो अलग-अलग बातें हैं तो ज़्यादातर किताबें उनकी बुकशेल्फ पढ़ती है और वे अगले मेले में कई बार वे किताबें भी उठा लाते हैं जो उन्होंने पिछली बार भी खरीदी थीं.

दूसरी किस्म उन खरीदने वालों की है जो कम से कम तीन दिन मेले में गुज़ारते हैं. उनके लिए मेला साल की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है. ये लगभग हर स्टॉल पर जाकर उन्हें तसल्ली से समय देते हैं और फिर खूब सोच-विचार कर चुन-चुन कर दो चार किताबें उठाएंगे और उनमें से एक को तो वे मेट्रो में पहुंचते ही पढ़ने भी लगते हैं. ये सच्चे किताबी कीड़े, किताबों पर मोल भाव भी कर लेते हैं और तब भी कीमत ज़्यादा लगने पर बाकी किताबें साल भर एमेज़ॉन से खरीदते हैं.

तीसरी क़िस्म उन लोगों की है जिन्हें किताबें अच्छी तो लगती हैं मगर दूर से. ये कई बार अपने किताब प्रेमी दोस्तों के बहकावे में आकर या फिर कई बार यूं ही वक्त बिताने की गरज़ से मेले में आते हैं, दोस्तों से गप लगाते हुए चारों कोने घूमते हैं, छोले भटूरे खाकर कॉफी पीते हैं, किताबों के साथ या कई बार किताबों के बगैर भी सेल्फी खिंचाते हैं और फिर भी समय बचता है तो किसी स्टॉल के भीतर जाकर किसी मशहूर सी किताब का नाम पढ़कर खुश हो जाते हैं कि अरे, इस किताब के बारे में तो मुझे भी पता है.

वैसे पाठकों के बारे में प्रकाशक बताते हैं कि लोग अब सिर्फ उपन्यास और कविताएं ही नहीं कथेतर भी खरीद रहे हैं. राजकमल प्रकाशन के संपादक सत्यानंद निरुपम कहते हैं, ‘हिंदी प्रकाशन जगत का मिजाज़ पिछले तीन चार सालों में तेजी से बदलता दिख रहा है. इसे आप तमाम प्रकाशकों द्वारा मेले में हाइलाइट और सेलिब्रेट की जा रही किताबों से समझ सकते हैं. अब हिंदी प्रकाशक कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना से अलग विधाओं को भी प्रमुखता से सामने लाने लगा है. इससे एक बड़ा शून्य भरने की दिशा में काम होता दिख रहा है. और ऐसा होने से एक बड़ा पाठक वर्ग हमसे जुड़ रहा है, और आगे भी जुड़ेगा.’

मसलन हम राजपाल एंड संस से प्रकाशित ‘कश्मीरनामा’ की बात कर सकते हैं. इसी मेले में लॉन्च हुई यह किताब दो वजहों से अपने आप में एक विशेष किताब है. अव्वल तो कश्मीर के इतिहास और समकाल पर इस तरह की शोध-आधारित किताब हिंदी में मौजूद ही नहीं है. दूसरे हिंदी में शोध-आधारित किताबें भी बहुत कम ही देखने को मिलती रही हैं. खासकर अगर वे 500 से ज़्यादा पन्नों की हों. इसे मिल रही तवज्जो की हकदार यह किताब मेले में वाकई काफी चर्चित दिख रही है.

चर्चा तो मेले में ‘बुकचोर’ की भी हो रही है. बुकचोर एक ऐसा स्टॉल है जहां आप पुरानी और इस्तेमाल की गई किताबें कम दामों में खरीद सकते हैं. जिस थीम का जिक्र हमने शुरुआत में किया उसे असल में यह स्टॉल सार्थक कर रहा है.

मैं बिलिंग काउंटर के सामने ‘ब्लाइंड डेट विद बुक्स’ देख रही हूं कि पीछे से एक लड़की चिल्लाती है, ‘मुझे गॉन गर्ल मिल गई है.’ इससे एक इशारा यह भी मिलता है कि युवा वर्ग को वे किताबें काफी भाती हैं जिन पर फिल्में बन चुकी हैं. ब्लाइंड डेट विद बुक्स भी काफी फिल्मी कॉन्सेप्ट है. दो शेल्फ में किताबों को गुलाबी और भूरे कागज़ों में लपेट कर, उन पर दिल की चिप्पी लगाकर रखा गया है. कागज़ पर उन किताबों के कीवर्ड्स हैं, जिनके हिसाब से आप किताब पसंद कर सकते हैं. लेकिन किताब खरीदने के बाद जबतक आप उनके ऊपर का कागज़ नहीं हटाएंगे आपको पता नहीं चलेगा कि आपने कौन सी किताब खरीदी है. यहां युवाओं की खूब भीड़ दिखती है.

भीड़ की बात करें तो हम ‘नई वाली हिंदी’ फेम हिंद युग्म के प्रकाशक शैलेश भारतवासी को सुन लेना चाहिए. उनका कहना है, ‘इस बार हिंदी के स्टॉल्स पर अंग्रेज़ी से कम भीड़ नहीं है. हिंदी की हलचल बढ़ी है.’ नए लेखकों पर भरोसा दिखाने वाले, और हिंद युग्म को नए लेखकों के लिए सबसे अच्छी जगह बताने वाले शैलेश का कहना है कि नए तरह का कॉन्टेंट, फ्लेवर और पैकेजिंग नए पाठकों को हिंदी की तरफ आकर्षित कर रहा है.

दिल्ली की सर्दी और बाहर से आने वालों की ट्रेनें लेट होने के बावजूद मेले में लोग खूब पहुंच रहे हैं, जो कि प्रकाशकों के लिए खुशी की बात है. लेकिन मेले में स्टॉल्स के बढ़े हुए किराए ने उन्हें उतना भी खुश नहीं होने दिया है. इस बार स्टॉल्स के किराए में लगभग 22 फीसदी बढ़ोतरी हुई है. तीन बाइ तीन मीटर के स्टॉल का किराया पिछली बार जहां 36 हज़ार रुपए था, वहीं इस बार उतनी ही जगह के लिए उन्हें 44 हज़ार रुपए चुकाने पड़े हैं.

खैर, इसके बावजूद प्रकाशक और संस्थान अपने चेहरे पर मुस्कान बनाए रखते हुए पाठकों का स्वागत कर रहे हैं. क्योंकि मुस्कुराने से पर्यावरण संरक्षण हो न हो, लेकिन ग्राहक संतुष्टिकरण की संभावना ज़रूर बढ़ जाती है.