सुप्रीम कोर्ट ने 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े 186 मामलों की दोबारा जांच कराने का निर्देश दिया है. शीर्ष अदालत का यह निर्देश एक बार फिर याद दिलाता है कि इन अपराधों की जांच में जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और इस तरह सरकार पीड़ियों को न्याय दिलाने में असफल साबित हुई.

केंद्र सरकार द्वारा 2015 में गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने सिख विरोधी दंगों से जुड़े 250 मामलों को बंद कर दिया था. इनकी समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अगस्त में अपने दो रिटायर्ड जजों की एक समिति बनाई थी. इस समिति ने ही सिफारिश की है कि इनमें 186 मामलों की दोबारा जांच की जाए. सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश स्वागतयोग्य है, लेकिन काफी देर से आया है.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद देश की राजधानी में उन्मादी भीड़ द्वारा सिख समुदाय को निशाना बनाने की घटना को आज करीब 34 साल बीत चुके हैं. तब चार दिनों तक इस भीड़ ने बेरोकटोक दिल्ली की सड़कों पर हिंसा का तांडव मचाया था और इस दौरान करीब 3000 लोग मारे गए थे.

उसी समय तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कुछ नेताओं पर भीड़ को उकसाने के आरोप लगे थे. वहीं जस्टिस रंगनाथ मिश्रा और जीटी नानावटी की अध्यक्षता में गठित जांच आयोगों ने पाया था कि इन दंगों में पुलिस की मिलीभगत थी. पीवी नरसिम्हा राव तब गृहमंत्री हुआ करते यानी दिल्ली पुलिस तब उन्हीं के अधीन थी. इस घटना के सात साल बाद ही राव देश के प्रधानमंत्री बने. इस बीच कांग्रेस के जिन नेताओं पर दंगे भड़काने का आरोप था, वे भी पार्टी की तरफ से राजनीति करते रहे और यहां तक कि उन्हें मंत्री पद भी मिल गया. हालांकि बाद में भारी आलोचना और जनता की तरफ से विरोध देखते हुए कांग्रेस को इन्हें मंत्री बनाने का अपना फैसला पलटना पड़ा.

इन दंगों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगने में भी कांग्रेस को 20 साल लगे. 21 अगस्त, 2005 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस बारे में संसद में वक्तव्य दिया था. इसमें उनका कहना था – ‘सिर्फ सिख समुदाय से ही नहीं, मैं पूरे देश से माफी मांगता हूं क्योंकि 1984 में जो हुआ वो हमारे संविधान द्वारा स्थापित राष्ट्रीयता को खारिज करने वाली घटना थी.’

ये मामले अब तभी बंद हो सकते हैं जब दंगा करने-करवाने वाले लोगों की पहचान निश्चित हो और उनको तय प्रक्रिया के तहत कानून के कटघरे में खड़ा किया जाए. हालांकि आज इनमें से कई लोगों की मौत हो चुकी है या फिर वे इतने उम्रदराज हो चुके हैं कि उनके लिए सजा का कोई खास मतलब नहीं है. वहीं इन मामलों में सबूत जुटाना भी काफी मुश्किल होगा. लेकिन इन सब परिस्थितियों के बावजूद जांच प्रक्रिया अधूरी नहीं छूटनी चाहिए. इस दौरान यह भी साफ करने की जरूरत है कि सरकार पीड़ितों को न्याय दिलाने में क्यों असफल हुई और उन लोगों को भी चिह्नित करने की जरूरत है जिन्होंने कानून के मुताबिक अपनी जिम्मेदारी निभाने में कोताही बरती. (स्रोत)