यह बात साल 1962 की है जब चीन ने भारत पर हमला कर दिया था. भारत की करारी हार हुई. आंकड़ों के मुताबिक़ 1383 सैनिक मारे गए और 3968 चीन के हाथों बंदी बना लिए गए. 1696 का कुछ पता नहीं चला. भारतीय सेना की प्रतिरक्षा क्षमता में कमियां ज़ाहिर हुईं और सबसे बड़ी बात, राजनैतिक तंत्र की नाकाबिलियत उजागर हो गयी. इसके लिए देश ने कभी जवाहरलाल नेहरू को माफ़ नहीं किया.

दुनिया को नैवेल मैक्सवेल ने अपनी किताब ‘इंडियास वॉर विद इंडिया’ के ज़रिये यही समझा दिया कि जवाहरलाल नेहरू की फॉरवर्ड पालिसी की वजह से चीन आहत हुआ और उसने जंग छेड़ी. दरअसल, 1963 में नेवेल मैक्सवेल के हाथ दो फौजी कमांडरों की रिपोर्ट लग गई थी. भारतीय कमांडरों की इस रिपोर्ट में इस हार के कारणों का जिक्र था. नेवेल मैक्सवेल ने इसी के आधार पर अपनी किताब लिख डाली. इसे एक बड़ा वर्ग भारत-चीन युद्ध का सबसे प्रामाणिक विश्लेषण मानता है.

चीन में भारतीय राजदूत सोते रहे और अक्साई चिन तक सड़क खिंच गई

अक्टूबर 1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया था. उधर, भारत खतरे से बेखबर था. इसका अंदाजा इससे लगता है कि चीन में रहते हुए भी यह खबर भारतीय राजदूत कावलम माधव पणिक्कर को रेडियो से मिली थी.

अक्टूबर 1957 में चीनी अखबार कुंग मिन-जिह-पाओ ने ख़बर छापी कि ‘दुनिया का सबसे ऊंचा राजमार्ग सिनकियांग –तिब्बत हाईवे’ बनकर तैयार हो गया है. इसमें लिखा था कि 20 भारी ट्रक साज़ो-सामान के साथ इसके परीक्षण के लिए तिब्बत की तरफ दौड़े चले जा रहे हैं.

अक्साई चिन को 1842 में ब्रिटेन ने जम्मू-कश्मीर का हिस्सा घोषित किया था. यहां बनी सड़क का मतलब था कि चीन अब हिंदुस्तान के इलाके में से होकर तिब्बत तक जा सकता था. जब तक भारत सरकार जागती, देर हो चुकी थी. चीनी सेना ने किलेबंदी कर ली थी. खैर, बाद में दोनों मुल्कों के बीच ख़तों और नक्शों का लेन देन हुआ पर बात बनी नहीं. बाद में चीन ने दोनों मुल्कों के बीच मैकमोहन सीमा रेखा को साम्राज्यवाद की निशानी बताकर मानने से इंकार कर दिया.

सरदार पटेल की अनदेखी

सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को आगाह किया था कि चीन पर भरोसा नहीं किया सकता और न ही हिंदुस्तान को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के तौर पर चीन की दावेदारी को बढ़ावा देना चाहिए. पटेल के इस ख्याल को नेहरू ने तरजीह नहीं दी. उनका मानना था कि चीनी साम्यवाद का मतलब यह नहीं हो सकता कि वह भारत की तरफ कोई दुस्साहस करेगा. उन्होंने, तिब्बत हादसे के बावजूद चीन से गहरे रिश्ते बनाने पर जोर ही दिया.

दिसम्बर 1950 में सरदार पटेल चल बसे. चीन पर नेहरू को घेरने वाला अब नहीं रहा था. उधर, चीन ने हिंदुस्तान और उसके बीच मैकमहोन रेखा को विवादास्पद करार दे दिया था. उसे यह बात समझ में आ रही थी कि जम्मू कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक जाती सीमा रेखा पर भारत की पकड़ नहीं है. उसने ‘भाईचारे’ की रणनीति अपनाकर पैर पसारने शुरू कर दिए.

रक्षा मंत्री और सेनाध्यक्ष का टकराव

अपने सबसे विश्वस्त सलाहकार वेंगालिल कृष्णन कृष्णा मेनन (वीके कृष्ण मेनन) को नेहरू ने 1957 में रक्षा मंत्री नियुक्त किया. मेनन की सेनाध्यक्ष केएस थिमैय्या से नहीं बनी. जनरल का मानना था कि देश की चीन से लगती सीमा मज़बूत होनी चाहिए क्योंकि असली ख़तरा वहीं से है. वहीं, मेनन की सोच थी कि देश को असली ख़तरा पाकिस्तान से है. थिमैय्या सेना के आधुनिकीकरण की बात सोच रहे थे. वे .303 बोर एनफील्ड राइफल को हटाकर बेल्जियन एफ़एन4 ऑटोमेटिक राइफल लाना चाहते थे. जानकारों के मुताबिक मेनन इस पर राजी नहीं थे.उनका कहना था वे देश में नाटो के हथियार देश में नहीं आने देंगे.

अगस्त 1959 में जब मेनन ने मेजर जनरल बृज मोहन कौल को अन्य अफ़सरों के ऊपर तरजीह देकर उनकी पदोन्नति कर दी तो सेनाध्यक्ष थिमैय्या नाराज़ हो गए और उन्होंने नेहरू को अपना इस्तीफ़ा भेज दिया. उनका मानना था कि कौल को युद्ध का तजुर्बा नहीं है लिहाज़ा यह नियुक्ति उचित नहीं है. उनका इस्तीफ़ा एक राष्ट्रीय ख़बर बन गया. नेहरू ने मामले को देख लेने का वादा कर उन्हें मना लिया.

उधर, बृज मोहन कौल जो खुद को नेहरू का क़रीबी मानते थे अपने पद पर बने रहे और जब चीन ने हमला बोला तो वे उत्तर पूर्व कमांड में 4 कोर्प्स के कमांडर नियुक्त किये गए. जिसने कभी युद्ध नहीं लड़ा वह युद्ध की कमान संभाल रहा था!

मेनन और थिमैय्या का विवाद संसद में उछल गया. मेनन के इस्तीफे की मांग होने लगी. सरकार का तरफदार माने वाला अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स तक मेनन को लेकर सरकार के ख़िलाफ़ हो गया. नेहरू ने आंखें बंद कर लीं. इसी दौरान चीनी घुसपैठ सारी हदें पार कर चुकी थी. चीनी सैनिक बेख़ौफ़ सीमा में धंसे चले आ रहे थे और हिंदी में लाउडस्पीकर से भारतीय गांवों को चीन का इलाक़ा बता रहे थे.

संसद में कमज़ोर बयान

उन दिनों संसद में आये दिन चीनी घुसपैठ पर नोंकझोंक होती. एक बार नेहरू बिफ़र पड़े और बेख्याली में कह बैठे कि अक्साई चिन एक बंज़र इलाक़ा है जहां घास भी नहीं होती. इस पर बिफरे एक सांसद ने कहा कि उनके सिर पर बाल नहीं उगते तो क्या वह भी चीन को दे दिया जाए. नेहरू ने बात आगे नहीं बढ़ाई.

नेहरू की फॉरवर्ड पालिसी

रामचंद्र गुहा ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि 1959 के बाद लद्दा और नेफ़ा यानी उत्तर पूर्व के इलाके में चीनी और भारतीय सेना ‘नो मैन्स लैंड’ में सैनिक भेजकर लड़ती रही. जिसे जहां जगह मिलती वह वहीं अपनी चौकी बना लेता. लेफ्टिनेंट जनरल बीएम कौल ने कमान हाथ में लेते ही उन अफ़सरों को हटा दिया जो ऐसे विवादित इलाकों में गश्त नहीं लगवाते थे. दोनों तरफ़ नयी नयी चौकियां बनती गईं. मुश्किलें बढ़ती गईं.

19 और 20 अक्टूबर की वह दरमियानी रात

तीन साल से चली रही छुटपुट वारदातें उस रात बड़ी हो गई. चीन ने पूर्वी और पश्चिमी सेक्टर पर हमला बोल दिया. नेहरू और सेना इसके लिए कतई तैयार नहीं थे. लगातार पांच दिनों तक चीनी हमलों ने भारतीय प्रतिरक्षा पंक्ति उधेड़ कर रख दी. 24 अक्टूबर को चीनी नेता चाऊ-एन-लाई ने युद्ध विराम कर बातचीत के रास्ते खोले. फिर नक्शों का आदान-प्रदान हुआ, फिर दावे और कई दावे हुए. कोई नतीजा नहीं निकला. इसी बीच जवाहरलाल नेहरू ने मेनन को हटा दिया. बीएम कौल दिल्ली चले आये और वहीं से बैठकर युद्ध संचालन करने लगे.

उधर, सोवियत संघ ने ख़ामोश रहकर अपने राजनैतिक भाई का साथ दिया. आठ नवंबर को नेहरू ने संसद में प्रस्ताव रखा. इसमें उन्होंने चीन के धोखे की बात कही. उन्हें दुनिया समझ में आ गयी थी. जवाहरलाल नेहरू ने कहा, ‘हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए थे. हमने अपने लिए एक बनावटी माहौल तैयार किया और हम उसी में रहते रहे.’ 28 अक्टूबर को अमेरिकी राजदूत जॉन केनेथ गेलब्रेथ नेहरू से मिले. या कहें कि नेहरू उनसे मिले और सहायता की गुहार लगायी. अमेरिका तैयार हो गया.

भारतीय राजनीति में यह एक अहम मोड़ था. जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत त्यागकर पश्चिम की तरफ़ रुख कर लिया था. हालांकि यह भी सच है कि जब युद्ध हो रहा होता है तो आप तटस्थ नहीं रह सकते. किसी न किसी की तरफ़ आपको झुकना होता है. महाभारत की लड़ाई में भारत के छोटे-बड़े सारे राज्य या तो पांडवों की तरफ़ की तरफ़ थे या कौरवों की. उन्हें मालूम था कि अगर बीच में रहे तो जीतने वाला कभी न कभी तो हमला कर ही देगा. नेहरू ने महाभारत का ज़िक्र अपनी क़िताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में किया तो है पर यह बात शायद वे भूल गए थे.

उधर, चीन ने 15 नवंबर को फिर हमला बोल दिया और नेफ़ा की सीमा को तहस-नहस कर डाला. हालांकि सात दिन बाद, यानी 22 नवंबर को उसने एकतरफ़ा युद्धविराम की घोषणा भी कर दी थी. इसके पीछे यह तर्क भी दिया जाता है कि तब अमेरिकी रसद और पश्चिमी जगत का भारत को सहयोग बस मिलने ही वाला था.

युद्ध के नए कारणों का ख़ुलासा

हाल ही में स्वीडन के पत्रकार बेर्टिल लिंटर ने नैवेल मैक्सवेल की किताब के जवाब में एक नई किताब लिखी है ‘चाइनास वार विद इंडिया’. इसमें उन्होंने समझाया है कि भारत नहीं बल्कि चीन इस युद्ध के लिए जिम्मेदार था. उनके मुताबिक माओ त्से तुंग की उस वक़्त हालत खराब थी. चीनी सरकार की नीतियों की वजह से वहां अकाल पड़ गया था. इससे तकरीबन तीन से चार करोड़ लोगों की मौत हो गई थी. बेर्टिल लिंटर के मुताबिक हालात से चीनियों का ध्यान भटकाने के लिए माओ त्से तुंग ने एक बाहरी दुश्मन खोजा और उस पर चढ़ाई कर दी. दूसरा कारण जो लिंटर लिखते हैं वह था दलाई लामा को भारत में शरण मिलना. इस वजह से भी चीन भारत को सबक सिखाना चाहता था.

नेहरू महान बनते-बनते रह गए

जवाहरलाल नेहरू का आज़ादी की लड़ाई में अहम योगदान है. फिर भी अगर देखा जाये तो वे महात्मा गांधी की छत्रछाया में रहे. कभी प्रणेता नहीं बन पाए. बहुत से लोग मानते हैं कि क़िस्मत उन पर दोबारा मेहरबान हुई जब वे देश के प्रधानमंत्री बने क्योंकि अब न गांधी थे और न ही पटेल, जो उनसे यश छीन लेते. 1948 से लेकर 1962 तक नेहरू ने देश के लिए काफ़ी कुछ किया, विश्वभर में अपने विचारों से ख्याति पायी, धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को नई ऊंचाइयों पर ले गए. पर जो राजा अपने देश की सीमाओं की रखवाली न कर पाए तो उसका सारा यश छिन जाता है क्योंकि यही तो उसका प्रथम कर्तव्य है. भारत-चीन युद्ध के नतीजे ने जवाहरलाल नेहरू की महानता पर अमिट दाग लगा दिया.

युद्ध ने नेहरू को मानसिक तौर पर तोड़कर रख दिया था. इसका असर उनके शरीर पर भी पड़ा. उड़ीसा में चुनाव के दौरान एक रैली में उन्हें दिल का दौरा पड़ा. राज्यों के चुनावों में कांग्रेस को हार मिलने की शुरुआत हो गयी. कांग्रेस में नेहरू की अब कम सुनी जाने लगी थी और उनके विकल्प की भी चर्चा होने लगी थी. कई नाम सामने आये जैसे कामराज, इंदिरा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री. बहरहाल, यह चर्चा अगली बार...