कोई कह सकता है कि 77 के होते हुए भी, जोकि आप इस 16 जनवरी 2018 को लामुहाला (स्पष्टतः) हो जाएंगे, आप अशोक हैं. शायद यही आपकी व्याधि है: बूढ़े होकर भी प्रसन्न और सक्रिय बने रहना. दुखी होने के कारण कम नहीं है. दुनिया ऐसा मोड़ लेगी और उदार दृष्टि इस क़दर दबा दी जाएगी, धर्मान्धता-साम्प्रदायिकता-जातीय विद्वेष इतने उग्र और हत्यारे रूप ग्रहण कर लेंगे, यह कम से कम मेरे जैसे नीचट (दृढ़) आशावादी के ख़याल में कभी नहीं आया था.

लगता यह है कि भारत में व्यक्ति की जीवनावधि भले बढ़ गई हो, उसके जीवन का मोल हर दिन लगातार घट रहा है. स्त्रियों-दलितों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों के साथ हर दिन वहशियाना सुलूक बढ़ रहा है और राज्य इन शक्तियों के आगे न सिर्फ़ असहाय है बल्कि अपनी चुप्पी और क़ानूनी निष्क्रियता से उसे चुपचाप बढ़ावा दे रहा है. परम्परा, इतिहास और स्मृति के साथ हर दिन अनाचार हो रहा है और उन्हें ऐसे अज्ञानपूर्वक बदला जा रहा है जैसे वे मैले पड़ गए कपड़े हैं जिनसे दूर रहने के लिए दिन में तीन बार कपड़े बदलने पड़ते हैं. इनको दर्ज कर रहा हूं तो, ज़ाहिर है, कि इनके कारण दुखी, क्षुब्ध और किसी हद तक हताश हूं. पथहारा हूं पर स्वप्नहारा नहीं होना चाहता.

इस वर्षगांठ पर प्रसन्नता का एक स्वार्थी कारण है. पोलिश विदुषी रेनाता चेकाल्स्का ने बरसों परिश्रम और अध्यवसाय कर मेरी कविता पर एक बड़ी पुस्तक पोलिश में लिखी. पिछले वर्ष का उसका एक अंग्रेज़ी अनुवाद ‘ए मंडल ऑव वर्ड्स’ बर्लिन से प्रकाशित हुआ. अब आलोचक मदन सोनी ने उसका हिन्दी अनुवाद ‘शब्दों के मंडल’ नाम से किया है जो राजकमल प्रकाशन द्वारा 16 जनवरी को प्रकाशित हो जाएगा. अपनी अनुवादकीय भूमिका में उन्होंने लिखा है: ‘प्राचीनतम भारतीय पाठ परम्पराओं से लेकर पश्चिम की आधुनिक कविता, उसके साहित्य-चिन्तन और आलोचना, भाषाविज्ञान, सांकेतिकी और दर्शन तक को अपनी व्याप्ति में समेटता इस पुस्तक का सन्दर्भ-लोक भी अत्यन्त विस्तीर्ण है: वेद, उपनिषद्, भगवद्गीता, महानिर्वाणतंत्र, नाट्यशास्त्र, अष्टाध्यायी, कामसूत्र आदि से लेकर माग़ी मेग्लोपोंती, हेनरी बर्गसां, मार्टिन हाइडेग्गर, इमेन्युएल लेविनास, मिशेल फूको, लुडविग विटगिस्टाइन, पाल रिका, सिमोन वेल, एज़रा पाउंड, ईलियट, आक्तावियो पाज़, नोम चाम्स्की आदि तक इस सन्दर्भ-लोक में शामिल हैं. और ये निरे हवाले नहीं हैं बल्कि रेनाता ने बहुत दिलचस्प ढंग से इनमें से ज़्यादातर सन्दर्भों के साथ अशोक वाजपेयी की कविता को जोड़ा है, इनके साथ इस कविता की संगति को रेखांकित करने का प्रयत्न किया है.’

यों तो बड़ों और मूर्धन्यों को अपने समय में समझे न जाने की शिकायत बार-बार रही है. इसे आप आत्मरति (स्वयं से प्रेम करना) भी मानें तो कोई हर्ज़ नहीं. पर यह पुस्तक मेरी कविता पर एक श्रेष्ठ पुस्तक है और हिन्दी कवि को कैसे गहराई से पढ़ना-सुनना चाहिए इसका मार्ग भी दिखाती है. अब तो 77 पर अशोक (शोकरहित) अनुभव करने को आप क्षम्य मानेंगे?

युवाओं का चयन

रज़ा फ़ाउंडेशन ने कृष्णा सोबती शिवनाथ निधि के सहयोग से हिन्दी युवा लेखकों के दो बड़े आयोजन ‘युवा-2016’ और ‘युवा-2017’ किए. दो-दो दिनों के इन आयोजनों में युवा लेखकों को आमंत्रित किया गया था. लेखक का चयन पहले वर्ष तीन वरिष्ठ लेखकों के एक पैनल ने अन्य वरिष्ठ लेखकों के द्वारा प्रस्तावित लगभग दो सौ नामों में से किया था. दूसरे वर्ष युवाओं का चयन स्वयं युवा लेखकों की चार सदस्यों के एक पैनल ने किया. इतनी बड़ी संख्या में युवाओं की शिरकत यह आश्वस्त करने के लिए काफ़ी है कि चयन कुल मिलाकर प्रतिनिधि रहा है. फिर भी यह शंका बनी रहती है कि कहीं सचमुच के महत्वपूर्ण लेखक छूट न गए हों. प्रतिनिधि चयन करने की हम पर कोई बाध्यता नहीं है पर हम पारदर्शी रहें इसकी कोशिश ज़रूर करते हैं. अब चूंकि यह आयोजन हमने वार्षिक बना दिया है और युवाओं पर एकाग्र यह हिन्दी में सबसे बड़ा नियमित आयोजन है, इसको और प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने की कोशिश जारी है.

इस सिलसिले में संयोगवश एक युवा लेखक से मुलाक़ात हुई जो इस आयोजन की महत्ता और प्रतिष्ठा को सहज ढंग से स्वीकार करते हैं, पर उनका ख़याल है कि कई महत्वपूर्ण लेखक अब तक छूटे हुए हैं जबकि कई अपात्र होते हुए भी या कम से कम उनके मुक़ाबले कम पात्र होते हुए भी ‘युवा’ में जगह और अवसर पा गए हैं. हो सकता है कि ऐसा कुछ और युवा बन्धुओं को भी लगता हो. चूंकि चयन मैं व्यक्तिगत रूप से नहीं करता और विशेषज्ञ-पैनल द्वारा की गई सिफ़ारिश में कोई हस्तक्षेप या फेरबदल नहीं करता, मैं अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ सकता हूं.

लेकिन इस आयोजन की गुणवत्ता के लिए आवश्यक है कि हमें सभी क़िस्म के सुझाव मिलें ताकि हम बेहतर और पूर्णतर आयोजन कर सकें. हमारे युवा मित्र इस सिलसिले में सुझाव दे सकें तो उनका स्वागत होगा. कई बार आग्रह के बावजूद युवा लेखक, जो शिरकत करने आए हैं, कोई सुझाव देने से आलस्य या अरुचि के कारण कन्नी सी काट जाते हैं. वरिष्ठ लेखकों की आत्मरति की चर्चा नहीं होती जबकि इस आयोजन के सिलसिले में मैंने पाया है कि उनमें से अधिकांश की न तो युवा लेखन में, उसके संवर्द्धन में कोई रुचि होती है और न ही इतना समय और फ़ुरसत वे निकाल पाते हैं कि युवाओं को सुनने आ सकें.

एक सुझाव यह है कि हर बार हिन्दीतर भाषाओं के बारी-बारी से दस-पन्द्रह युवा लेखक भी आमंत्रित किए जाएं. शुरुआत मराठी-गुजराती-पंजाबी-उर्दू से की जा सकती है जिनके युवा लेखकों को हिन्दी समझने में बहुत कठिनाई नहीं होती होगी. अपने पड़ोस को भी अपने परिसर में शामिल करते हुए इस आयोजन को मुख्यतः हिन्‍दी का ही रहना चाहिए. दूसरी भाषाओं के लेखकों की प्रस्तुतियां भी हिन्दी अनुवाद में हों यह प्रबन्ध आसानी से किया जा सकता है. इस बहाने अंग्रेज़ी के व्यर्थ प्रवेश को टालना चाहिए. चूंकि अंग्रेज़ी युवा लेखकों को कई मंच मिले हुए हैं, उसके युवा लेखकों को इस आयोजन से बाहर रखा जाना चाहिए. इसका एक दुष्परिणाम शायद यह होगा कि कई प्रतिभाशाली युवा, जो आजकल अंग्रेज़ी में लिखने लगे हैं, हमारे आयोजन से बाहर हो जाएंगे. क्या हमें इसकी चिन्ता करनी चाहिए?

कविकुल

कवियों का कोई पारिवारिक कुल अक्सर नहीं होता. पर कभी-कभी यह संयोगवश हो जाता है. कुछ महीनों पहले मैंने इस स्तम्भ में ही एक टिप्पणी में अपने भाई-भतीजों के कवि होने का ज़िक्र किया था. ग्वालियर के हमारे मित्र रमाशंकर सिंह ने पिछले दिनों एक आयोजन वहां किया ‘कविकुल’ नाम से जिसमें मेरे अलावा मेरे भाई उदयन, उसके दो जुड़वां बेटों आस्तीक और हुताशन ने लगभग डेढ़ घंटे एक छोटे पर भरे सभागार में कवितापाठ किया. उदयन ने कुछ प्रेम और कुछ अवसाद और विच्छिन्नता की कविताएं सुनाईं. आस्तीक का आग्रह अपने समय और समाज की विडम्बनाओं पर था. हुताशन की अंग्रेज़ी कविता में रूमान (प्रेम) और उदासी मिले-जुले हैं.

मैंने सिर्फ़ वे कविताएं पढ़ीं जो मेरी मां, पिता, बेटे-बहू, बेटी, पोते और नातिन पर हैं. कुल मिलाकर सुनाकर तृप्ति मिली और श्रोताओं को आनन्द आया. उनमें महेश कटारे, पवन करण जैसे मित्र भी थे. चारों कवियों का रंग अलग-अलग दिखाई-सुनाई पड़ा: राग-अनुराग-विराग के बीच स्पन्दित और सन्तुलित. आयोजन रमाशंकर जी के आग्रह पर हुआ जो अपने ग्वालियर और बड़ौदा स्थित टेक्नॉलजी विश्वविद्यालयों में संस्कृति और कलाओं के लगातार आयोजन करते रहते हैं. आयोजन का नाम भी उनकी सूझ था. पारिवारिक पृष्ठभूमि एक होने के बावजूद चारों कवियों की शिक्षा और व्यवसाय की दिशा अलग रही है. मैं प्रशासन में, उदयन मेडिकल शिक्षा में रहे हैं, आस्तीक एम टेक और हुताशन भी एम टेक कर चुके हैं.

ग्वालियर में ही एक बन्धु ने बताया कि फ़ेसबुक पर इस आयोजन को लेकर कुछ टीका-टिप्पणी हुई है. मैं फ़ेसबुक ज़्यादा देख नहीं पाता. उस पर हूं पर सक्रिय नहीं हूं. इसलिए मुझे पता नहीं चलता. जो बन्धु अनुकूल और प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं करते हैं उन्हें पूरा हक़ है. उसी तरह मुझे भी हक़ है कि मैं उस पर अक्सर कुछ न कहूं. बात आई-गई हो जाए यही अच्छा है.

यह याद आया कि कम से कम एक कविकुल और है: स्वर्गीय पंकज सिंह, उनकी पत्नी सविता सिंह और उनकी बेटा मेघा सिंह का. मेधा हुताशन की ही तरह अंग्रेज़ी में लिखती हैं. कवियुगल भी कई हुए हैं. पिछले वर्ष अजित कुमार और उनकी पत्नी स्नेहमयी चौधरी का दुखद देहावसान हुआ जो दोनों ही प्रतिष्ठित कवि थे. बल्कि अजित जी की बहिन कीर्ति चौधरी ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल कवयित्री थीं और उनके पति ओंकारनाथ श्रीवास्तव कवि थे. गिरिजाकुमार माथुर ‘तार सप्तक’ में और उनकी पत्नी शकुन्त माथुर ‘दूसरा सप्तक’ में शामिल कवयित्री थीं.

दूसरी ओर यह भी सच है कि कविकुल का होने मात्र से कोई कवि सार्थक या महत्वपूर्ण नहीं हो सकता. वैसा होने से कविता लिखने का उत्साह और परिवेश भले मिल जाता हो, पर कविता लिखना और उस विधा में कुछ सार्थक कर पाना हमेशा ही एक टेढ़ा काम है और रहेगा. वह रास्ता किसी कविकुल का होने से कम टेढ़ा या कम अप्रत्याशित नहीं हो जाता.