सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की फंसी हुई रकम (एनपीए) में 14 फीसदी भागीदारी उन डिफ़ाल्टरों की है जिनके पास लोन चुकाने के पर्याप्त संसाधन हैं, पर वे रकम लौटाना नहीं रहे. यह आंकड़ा करीब एक लाख करोड़ रुपए बैठता है. अंग्रेजी में इन्हें ‘विलफुल डिफ़ाल्टर’ कहा जाता है. भारत के कुल 21 बड़े सरकारी बैंकों का लगभग 7.33 लाख करोड़ रुपया एनपीए की श्रेणी में है. अर्थशास्त्र की भाषा में यह वह राशि है जो देश की अर्थव्यवस्था में काम नहीं आ रही. यानी, फंसी हुई रकम.

सरकारी बैंकों ने कुल मिलाकार 9025 डिफ़ाल्टरों की एक लिस्ट जारी की है. इनमें विजय माल्या भी हैं. इनमें से 8423 डिफाल्टरों पर बैंकों ने क़ानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है. इसके अलावा 1968 डिफाल्टरों के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज़ करायी गई है. इन पर लगभग 31 हज़ार करोड़ रु बकाया हैं. वहीं, लगभग 87 हज़ार करोड़ रु लेकर बैठे हुए 6937 व्यक्तियों और कंपनियों की संपत्तियां ज़ब्त करने और उन्हें बेचकर पैसा वसूलने की क़वायद शुरू हो चुकी है.

आरबीआई द्वारा संसद में पेश की गई रिपोर्ट बताती है कि विजया बैंक के कुल एनपीए में 53 फीसदी विलफुल डिफ़ाल्टरों की हिस्सेदारी है. इस लिहाज से वह सारे बैंकों में सबसे आगे खड़ा है. वहीं, 1.9 लाख करोड़ रु की रक़म के साथ स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के एनपीए का आंकड़ा सबसे बड़ा है.

सितंबर 2017 तक के आंकड़े बताते हैं कि कुल एनपीए में 77 फीसदी हिस्सेदारी बड़े कॉरपोरेट घरानों की है. इससे एक बात साफ़ होती है कि जो जितना बड़ा नाम है, वह उतना ही बड़ा डिफ़ाल्टर भी है. यानी व्यावसायिक शुचिता या कॉरपोरेट गवर्नेंस की बात को बड़े घराने धता बता रहे हैं. जानकारों के मुताबिक पिछला रिकॉर्ड देखा जाए तो बैंकों के लिए इस रकम को वास पाना काफी मुश्किल काम होगा.