आज़ाद हिंदुस्तान के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार जज मीडिया के सामने आए और उन्होंने चीफ जस्टिस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. शुक्रवार की दोपहर दिल्ली में जो हुआ उसकी भूमिका कब लिखी गई, सरकार से लेकर न्यायपालिका तक, राष्ट्रपति भवन से लेकर साउथ ब्लॉक तक शुक्रवार देर शाम तक यही चर्चा चलती रही. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मसले पर कम से कम दो बार कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से बात की. देर रात में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री अरुण जेटली के बीच भी लंबी बातचीत हुई. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी लगातार मोदी सरकार के मंत्रियों के संपर्क में थे.

उधर सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से बात कर रहे थे. देर रात को प्रेस कांफ्रेंस करने वाले चार जज और चीफ जस्टिस मिश्रा के बीच मध्यस्थता की कोशिश भी हुई. कहा जा रहा है कि शुरू में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा भी मीडिया से बात करने वाले थे. पहले खबर आई कि मुख्य न्यायाधीश भी कैमरे के सामने आकर बात करेंगे. इसके बाद पता चला कि मीडिया से उनकी अनौपचारिक बातचीत होगी. लेकिन सुनी-सुनाई है कि अटॉर्नी जनरल और अपने अन्य साथी जजों से सलाह-मशविरे के बाद जस्टिस मिश्रा ने मीडिया से बात न करने का फैसला किया.

सबसे पहले यह सवाल कि आगे क्या होगा? सरकार के शीर्ष नेतृत्व को उम्मीद है कि अब बात आगे नहीं बढ़ेगी. सुनी-सुनाई और सूत्रों के आधार पर मिली खबरों के मुताबिक चीफ जस्टिस की तरफ से इस मसले पर फिलहाल कुछ नहीं किया जाएगा. चारों जज - जस्टिस मदन बी लोकुर, कुरियन जोसेफ, रंजन गोगोई और जे चेलामेश्वर - भी दोबारा मीडिया से बात नहीं करेंगे. सुप्रीम कोर्ट में कामकाज पहले जैसा ही चल रहा है ऐसा दिखाने की कोशिश होगी. अगले कुछ दिनों में दोनों पक्ष मिल-बैठकर कोई समाधान निकालने की कोशिश कर सकते हैं.

अब दूसरा सवाल, अगर मतभेद सुलझ सकता था तो बात इतनी बढ़ी ही क्यों? सुनी-सुनाई है कि विवाद एक दो दिन में यहां तक नहीं पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ वकीलों की मानें तो चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट में नंबर दो मानॆ जाने वाले जस्टिस चेलमेश्वरम के बीच मतभेद लगातार बढ़ता जा रहा था. पहले बात सिर्फ दो जजों के बीच थी, लेकिन धीरे-धीरे दो गुटों के बीच की बात बन गई. गुरुवार को जब नये जजों की नियुक्ति का आदेश आया तो वह इस विवाद का ट्रिगर बन गया.

यह भी सुनी-सुनाई ही है कि प्रेस कांफ्रेंस करने वाले जज भी शुरू में मीडिया के सामने आने को लेकर पशोपेश में थे. बाद में उन्होंने इस मामले में एक बड़े अखबार के संपादक रह चुके और अब एक न्यूज़ वेबसाइट चलाने वाले वरिष्ठ पत्रकार मदद ली. प्रेस कांफ्रेंस के दौरान भी वे भी वहां पर मौजूद थे. सरकार को भी शुक्रवार सुबह ही इस प्रेस कांफ्रेंस की खबर मिल गई थी, लेकिन इससे उसका कोई सीधा लेना-देना नहीं था इसलिए उसने इस मामले में पड़ने की कोशिश नहीं की.

आज़ाद हिंदुस्तान के इतिहास में ये शायद पहली प्रेस कांफ्रेंस हुई होगी जिसे देश के प्रधानमंत्री से लेकर विपक्ष के बड़े बड़े नेताओं ने ध्यान से देखा, एक-एक शब्द को ध्यान से सुना. क्योंकि किसी को अंदाज़ा नहीं था कि जज क्या कहेंगे और क्या करेंगे. सरकार के एक मंत्री ने मीडिया के कुछ संपादकों से बात की. सरकार का अपना आकलन है कि इस पूरे घटनाक्रम में न्यायपालिका की छवि पर सबसे ज्यादा असर पड़ा. लेकिन जितना डर था उससे कहीं कम नुकसान हुआ है. इसलिए दोनों पक्षों के बीच बातचीत भी 24 घंटे के भीतर शुरू हो चुकी है.

हालांकि जिस तरीके से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस दफ्तर पहुंचकर प्रेस कांफ्रेंस की, उससे इस मसले पर राजनीति का मैदान भी खुल सकता है. कांग्रेस की नज़र लगातार इस पूरे घटनाक्रम पर थी. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि खुद राहुल गांधी कांग्रेस के दो बड़े नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील के संपर्क में थे. शुक्रवार की शाम राहुल के घर पर कांग्रेस के उन नेताओं की बैठक हुई जो सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं. इसके बाद ये सभी नेता 24 अकबर रोड पहुंचे और पत्रकारों के बीच जाकर बैठ गए. इसके बाद वहां राहुल गांधी की एंट्री हुई और उन्होंने दो मिनट में अपनी बात खत्म कर दी.

अब सरकार दिन में हुई चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस को तो भूलना चाहती है और राहुल की दो मिनट की प्रेस कांफ्रेंस को मुद्दा बनाना चाहती है. अगले कुछ दिन कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका और जनता सभी के लिए बड़े अहम होने वाले हैं.