देश में आज मकर संक्रांति की धूम है. कई राज्यों में इस त्योहार को अलग-अलग तरीक़े से मनाया जाता है. हरियाणा और पंजाब में इसे एक दिन पहले लोहड़ी के रूप में मनाते हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, बंगाल आदि राज्यों में यह मुख्य रूप से दान का पर्व है. हर राज्य के लोग अपने रीति-रिवाजों के मुताबिक़ दान करते हैं. वहीं, दक्षिण भारत में इसे पोंगल और केवल संक्रांति के नाम से मनाया जाता है.

मकर संक्रांति पर पतंगबाज़ी भी एक परंपरा बन गई है. और जब पतंगबाज़ी की बात हो तो गुजरात का नाम सबसे पहले याद आता है. यहां पतंगबाज़ी का शौक़ बड़ी चीज़ है. इस साल 14 जनवरी के अलावा कई इलाक़ों में 15 जनवरी को भी मकर संक्रांति मनाई जाएगी, क्योंकि कई स्थानों पर उदया तिथि (जब सूर्योदय होता है) इसी दिन पड़ रही है. गुजरात के पतंगबाज़ों के लिए पेच लड़ाने का यह सुनहरा मौक़ा है.

संयोग से मकर संक्रांति से कुछ दिन पहले गुजरात के सूरत शहर जाना हुआ. काफ़ी साफ़-सुथरी जगह है. देखकर लगता है कि प्रशासन और आम लोग साफ़-सफ़ाई को लेकर काफ़ी संवेदनशील हैं. लेकिन यह संवेदनशीलता ट्रैफ़िक नियमों को लेकर नहीं दिखती. यहां के ज़्यादातर बाइक चालक हेलमेट नहीं पहनते. सूरत में चार दिन बिताने के दौरान मुझे बहुत कम दुपहिया चालक हेलमेट पहने गाड़ी चलाते दिखाई दिए. उत्तर भारत में भी ट्रैफ़िक नियमों की अनदेखी सामान्य बात है इसलिए चालकों के हेलमेट नहीं पहनने से मुझे कोई हैरानी नहीं हुई. लेकिन एक चीज़ ने जरूर ध्यान खींचा.

सूरत की सड़कों पर हर तीसरी-चौथी बाइक के हैंडल पर आप सलिया लगा देख सकते हैं. यहां लोग किसी सड़क दुर्घटना में अपना सिर बचाने के लिए हेलमेट नहीं पहनते, लेकिन पतंग के मांझे से आंख, नाक, कान, होठ और गला न कट जाए इसलिए सलिया ज़रूर लगाते हैं. यह अजीब है, लेकिन दिलचस्प है.

विनोद सूरत के भटार इलाक़े की एक सड़क के नज़दीक हेलमेट बेचते हैं. उन्हें हेलमेट बेचता देख मुझे थोड़ी हैरानी हुई. क्योंकि जैसा कि ऊपर बताया, सूरत में ज़्यादातर दुपहिया चालक हेलमेट नहीं पहनते हैं. लेकिन इन दिनों विनोद हेलमेट बेचे बिना ही रोज़ 150 से 250 रुपये कमा लेते हैं. उनके पास एक दिन में तीन से पांच लोग अपने दुपहिया वाहन पर सलिया (या तार) लगवाने आते हैं. भटार से गुज़रते वक़्त मैंने उन्हें एक व्यक्ति की बाइक पर सलिया लगाते देखा. उस समय तक मुझे इस ‘जीवन रक्षक’ तार का नाम नहीं पता था. हर तीसरी गाड़ी में इसे लगा देखकर मैं पहले से उत्सुक था. इसलिए अपने साथी को बाइक किनारे लगाने को कहा और ख़ुद विनोद के पास चला गया.

विनोद (बाएं) से बाइक पर सलिया लगवाते ललित (दाएं)
विनोद (बाएं) से बाइक पर सलिया लगवाते ललित (दाएं)

मैंने विनोद से उस चीज़ का नाम पूछा. उन्होंने बताया कि इसे सलिया कहते हैं. कुछ लोग तार भी बताते हैं. धातु से बना यह सलिया बाइक के हैंडल पर लगा होता है. इसकी ऊंचाई बाइक पर बैठे औसत लंबाई वाले व्यक्ति से ज़्यादा होती है. अगर बाइक चलाते वक़्त कोई तेज़ धार वाला मांझा चालक के सामने आ जाए तो यह सलिया उसे गले तक पहुंचने से रोक देगा. इससे काफ़ी हद तक सुरक्षा मिल जाती है. एक सलिये की क़ीमत 50 से 70 रुपये है. विनोद ने बताया कि एक दिन में चार से पांच सलिये लगा देते हैं. यह भी कि मकर संक्रांति से कुछ दिन पहले इनकी बिक्री बढ़ जाती है.

विनोद का कहना था कि सूरत में पतंगों का जितना जुनून है उतना ही मांझे का ख़ौफ़ भी है. उन्होंने बताया कि कुछ ही दिन पहले उनके सामने सड़क पर जा रही एक बच्ची की गर्दन पर मांझे से गहरा घाव हो गया था. विनोद से अपनी बाइक पर सलिया लगवाने वाले ललित राजस्थान से आए हैं. वे सूरत में किराने की दुकान चलाते हैं. वे भी ऐसी ही घटना का ज़िक्र करते हैं. ललित ने बताया कि कुछ दिन पहले उनके सामने ही स्कूटी पर बैठी एक लड़की की गर्दन मांझे से बुरी तरह ज़ख़्मी हो गई थी. ललित ने कहा कि उस हादसे के बाद ही उन्होंने बाइक पर सलिया लगवाने का फ़ैसला किया.

सूरत के अड़ाजन इलाक़े की एक सड़क
सूरत के अड़ाजन इलाक़े की एक सड़क

मांझे से बच्चों के घायल होने की घटनाएं इसलिए भी होती हैं कि वे बड़ों की तरह सतर्क नहीं रहते. मुझे सूरत घुमा रहे मेरे साथी नील ने भी ऐसी एक एक घटना का ज़िक्र किया था. उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले एक इलाक़े में एक छोटी बच्ची की गर्दन मांझे के लपेटे में आई थी. मांझा इतना तेज़ था कि उसने बच्ची के गले को बुरी तरह ज़ख़्मी कर दिया. चार दिन बाद बच्ची की मौत हो गई. यह खबर काफी सुर्खियों में रही थी.

गूगल करने पर ऐसी कई घटनाओं का पता चलता है. बीते कुछ सालों में गुजरात में मांझे से किसी के घायल होने या मारे जाने के कई मामले सामने आए हैं. सूरत में सबसे ज़्यादा घटनाएं देखने को मिलती हैं. हालांकि अहमदाबाद भी पीछे नहीं है. यहां भी मांझे से आम लोगों और पक्षियों के ज़ख़्मी होने की कई ख़बरें आती रही हैं. हालात ऐसे हो गए कि एक बार तो पतंग उड़ाने पर ही रोक लगा दी गई. दिसंबर 2015 की बात है. अहमदाबाद प्रशासन ने आदेश दिया कि 25 दिसंबर 2015 से लेकर 16 जनवरी 2016 तक सुबह छह बजे से आठ बजे तक और शाम पांच बजे से सात बजे तक कोई भी व्यक्ति पतंग नहीं उड़ाएगा. इस आदेश के बावजूद 200 पक्षी मांझे से कटकर मारे गए और 1200 पक्षी घायल हुए. राज्य के वन विभाग ने यह जानकारी दी थी.

ऐसा नहीं हैं कि ये घटनाएं केवल मकर संक्रांति के कुछ दिन पहले होती हैं. गुजरात में पतंगबाज़ी एक जुनून है. यहां यूं ही पतंगोत्सव (काइट फ़ेस्टिवल) होते रहते हैं. बड़े कार्यक्रमों के अलावा मोहल्लों और रेज़िडेन्शियल सोसायटियों में जब मन करे लोग पतंगोत्सव का आयोजन कर लेते हैं. पैसे वालों का शहर है, लिहाज़ा पुरस्कार के रूप में आकर्षक रक़म की घोषणा हो जाती है. अब पैसे की बात हो तो चाहे पतंगबाज़ की उंगली कटे या अनजाने में किसी अनजान आदमी का गला, कुछ याद नहीं रहता.

मंकर संक्राति आते-आते सूरत के रिहायशी इलाक़ों की हर तीसरी गली में मांझा बन रहा होता है. पुलिस ने कांच वाले चाइनीज़ मांझे पर बैन लगा रखा है. लेकिन अब उसकी तर्ज़ पर देसी मांझे में कांच मिलाया जा रहा है. यह भी चाइनीज़ मांझे की तरह ख़तरनाक है और धड़ल्ले से बिक रहा है. मांझा बनाने वाले और स्थानीय लोग बताते हैं कि मकर संक्रांति आने तक सारा माल (पतंग-मांझा) बिक जाता है. पिछले पांच सालों में मांझे की चपेट में आने से आठ लोगों की मौत हो चुकी है और कई वाहन चालक ज़ख़्मी हुए हैं. लोगों की जान पर पतंगबाज़ी का शौक़ हावी है. यह अब एक परंपरा सी बन गई है जो गंभीर दुष्प्रभावों के बावजूद धड़ल्ले से चल रही है.