गोलगप्पे... गोलगप्पे... गोलगप्पे... यहां पर तीन बार गोलगप्पा लिखकर हमने यह जांचने की कोशिश की है कि यह पढ़ने के बाद आपको पड़ोस वाली गोलगप्पों की दुकान तक जाने का ख्याल आता है या नहीं! अगर आता है तो आप सच्चे गोलगप्पा प्रेमी हैं. अगर नहीं आता और फिर भी आप यह आलेख पढ़ रहे हैं तो हम यह मानकर खुश हो सकते हैं कि आप सत्याग्रह के निष्ठावान पाठक हैं. फिलहाल सवाल गोलगप्पा, पानीपूरी, फुल्की, पानी-बताशे या गुपचुप के प्रेमियों का है जो इनमें से कोई भी नाम सुनकर उसे खाने के लिए मचल उठते हैं. चलिए जानते हैं, आखिर गोलगप्पों में ऐसा क्या होता है कि इन्हें देखनेभर से या इनके बारे में सोचनेभर से मुंह में पानी आ जाता है.

सबसे पहले यह जानते हैं कि मुंह में आने वाला पानी, असल में क्या है? दरअसल किसी भी खाद्य पदार्थ के मुंह में जाने से पहले ही उसे पचाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. इसकी शुरूआत मुंह में सलाइवा यानी लार के बनने से होती है. सलाइवा 99.5% पानी और 0.5% प्रोटीन, इलेक्ट्रोलाइड्स और लिपिड्स का मेल है. पाचन के दौरान इसमें मौजूद सलाइवरी एंजाइम्स भोजन के स्टार्च और बाकी घटकों को तोड़कर उन्हें ग्लूकोज में बदलने में मदद करते हैं.

जब हम गोलगप्पे या अपने किसी भी पसंदीदा खाने के बारे में सोचते हैं तो मस्तिष्क के मेड्यूला ऑब्लांगेटा हिस्से को एक संदेश जाता है. इससे न्यूरोट्रांसमीटर्स से एसिटिलकोलाइन और नॉरपाइनफ्राइन नाम के दो कैमिकल रिलीज होते हैं. इन केमिकल्स के रिलीज होने से सलाइवा ग्लैंड से जुड़ी नर्व्स को सलाइवा रिलीज करने का संदेश प्राप्त होता है और मुंह में पानी आने लगता है यानी ज्यादा मात्रा में लार बननी शुरू हो जाती है. सलाइवा रिलीज होने की इतनी लंबी-चौड़ी प्रक्रिया का जिक्र यहां पर करना इसलिए जरूरी है कि ये नर्व्स जो सलाइवा प्रोडक्शन को कंट्रोल करती हैं, असल में हमारे रिफ्लेक्स सिस्टम का हिस्सा होती हैं और यह पूरी प्रक्रिया सलाइवरी रिफ्लेरक्शन कहलाती है. दिमाग के जिस हिस्से – मेड्यूला ऑब्लांगेटा – से यह प्रक्रिया नियंत्रित होती है वही हिस्सा शरीर में हर तरह के रिफ्लेक्शन के लिए जवाबदार होता है. इसका काम छींक या उबकाई जैसी क्रियाओं को भी नियंत्रित करना होता है.

वैज्ञानिक बताते हैं कि रिफ्लेक्स सिस्टम एक्टिव होने के कारण ही कभी तो खाने को याद करने भर से मुंह में पानी आ जाता है तो कभी बिना सोचे सिर्फ उसकी महकभर आ जाने से. कई बार तो सिर्फ जबड़ा चलानेभर से ही रिफ्लेक्स सिस्टम एक्टिव हो जाता है. मुंह में पानी आने को खाने के पहले हमारे दिमागी और शारीरिक रूप से तैयार होने से जोड़कर भी देखा जाता है. इस तरह जिस डिश को खाने के लिए हम जितने तैयार रहते हैं उसे पचाने की प्रक्रिया भी उतनी ही तेजी से शुरू होती है. और गोलगप्पे खाने के लिए तो हममें से ज्यादातर लोग हमेशा ही तैयार रहते हैं इसीलिए इनका नाम सुनते ही तुरंत मुंह में पानी भी आ जाता है.