इस उपन्यास का एक अंश :

‘सोनी देख, इसकी शकल, उसी पर गयी है. बिलकुल वही नहीं लगता, जो रोज़ हमारे साथ बलात्कार किया करता था?’ उसकी आंखों में अजीब एक वहशत थी. सोनी डर गयी. ‘पागल है तू...हट यहां से’ और लौकी को उठाकर बाहर ले गयी...मोनी उसके बाद बेबे के सामने नहीं गयी. लेकिन सोनी ने देखा, उसकी आंखों की वहशत बढ़ने लगी थी. वो घूर-घूर के देखती थी लौकी को. और वो मासूम बार-बार ‘मां...मां...’ कह के दौड़ता था उसी की तरफ़.

और फिर एक दिन क़हर टूट पड़ा खु़दा का. पछमी खेत वाले कुएं में लौकी की लाश मिली और मोनी का कहीं पता नहीं था...

...मोनी खूनी थी. उसे सोनी से मिलाने के लिए ऊपर से ऑर्डर लेना ज़रूरी था...सोनी सलाख़ों वाले दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गयी. अन्दर झांका. दीवार से लगी बैठी थी मोनी. उसने मुड़कर देखा उसे...उसकी आंखों की वहशत अभी तक गयी नहीं थी. सोनी ने धीरे से पूछा.

‘मोनी तुझे मालूम है तूने क्या किया है?’ वह बड़ी तुर्शी से बोली. ‘हां!..’ फिर जुमले में इज़ाफ़ा किया, ‘कैम्बलपुर में उसने इतने हिन्दू मारे थे. मैंने एक छोटा-सा मुसलमान मार दिया तो क्या हुआ?’


उपन्यास : दो लोग

लेखक : गुलज़ार

प्रकाशक : हार्पर हिन्दी

कीमत : 299 रुपये


कुछ जख्म कभी नहीं भरते, फिर वे चाहे इंसान के हों या किसी मुल्क के. विभाजन भारत और पाकिस्तान के जिस्म पर उभरा ऐसा ही जख्म है जो सालों बाद भी टीस रहा है. यह दर्द आवाम की धड़कनों में तो जब-तब दिखता ही है, लेकिन कभी-कभी साहित्य और सिनेमा में भी दर्ज होता है. भारत-पाक विभाजन पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन अभी-भी इस मुद्दे पर कुछ न कुछ नया सामने आ ही जाता है. गुलजार का यह पहला उपन्यास ‘दो लोग’ इसी विभाजन की त्रासदी से उपजे शरणार्थियों के दर्द को शिद्दत से महसूस कराता है.

इस उपन्यास में विभाजन का डर, विस्थापन का दर्द और जीवनभर के लिए शरणार्थी बन जाने की टीस को गुलजार ने बहुत ही कसक के साथ दर्ज किया है. हिन्दुस्तान के विभाजन की खबर से पैदा हुई छटपटाहाट को गुलजार ने दो दोस्तों के माध्यम से बहुत ही छुअनभरे अंदाज में दर्ज किया है. एक स्थान पर वे लिखते हैं -

‘ओये गल सुन फ़ज़लू, मुल्क कोई बस्ते की तख़्ती है, जिन्नाह तोड़ देगा? कोई सिलेट है कि अद्धी तू ले, ले अद्धी मैं ले लेता हूं. मुल्क भी कभी टूटते हैं? ओये हिन्दुस्तान तो एक मुल्क है नां? एक ही ज़मीन है, उसे कैसे तोड़ेगा?’ करम सिंह बड़ा जज़बाती आदमी था. मास्टर फ़ज़ल ने कुछ ऐसे सवाल पूछ लिये कि करम सिंह बौखला गया.

‘अच्छा बता करमे. दीनदयाल की ज़मीन थी नां. पता नहीं कितने एकड़! बट गयी नां?...हो गये नां तीन टुकड़े! दो बेटों के और एक उसका अपना!’

‘पर वो तो परीवार बटा नां फ़ज़ल. ज़मीन थोड़ी ही टूट गयी?’
‘ये भी वैसा ही है करमे. जिन्नाह मुल्क बांटने की बात कर रहा है. तोड़ने की नहीं.’

बंटवारे के दौरान हुई हिंसा का खौफ कुछ ऐसा था कि उससे बचने के लिए कभी-कभी अपनों की मौत भी सुकून देने लगती थी. विभाजन की हिंसा के बीच करम सिंह नाम के एक पात्र को अपनी पत्नी की हत्या कुछ ऐसा ही चैन-सा देती है. गुलज़ार लिखते हैं -

‘कमरे में दाखि़ल हुए तो यकदम सांस रुक गयी. बिस्तर पर बीवी आंखें खोले मरी पड़ी थी...मुंह से नीले थूथे की झाग बहते-बहते तकिये पर सूख गयी थी. दिल मसोस कर वहीं बैठ गये. न पास गये. न छुआ उसे. न उसकी आंखें बन्द कीं. अजीब-सा एक चैन आ गया. दास्तान पूरी हो गयी!
...अन्दर जाकर पत्नी की देह को चद्दर से ढांपा. उसकी मिट्टी-कंकर से फटे पांव बता रहे थे वो कितना भागी होगी. लहू की लकीरें जमी हुई थीं. लाकर उसे चिता पर डाला. चिता जलाई और उसी से सर लगा के बैठ गये.’

हिन्दुस्तानी समाज में महिलाओं के लिए बिनब्याही मां बनना हर दौर में सिर्फ अपमानजनक ही रहा है. अविवाहित मां के गर्भ को हमेशा पाप की तरह ही देखा गया है. यह सोच मानस में इतनी गहरी है कि बंटवारे, विस्थापन और दंगे जैसी खौफनाक और तनावयुक्त सामाजिक स्थिति में भी कोई लड़की अपने गर्भ के बारे में सच बोलने की हिम्मत नहीं जुटा सकती थी. उपन्यास में सोनी और मोनी ऐसी ही दो बहनें हैं जो दंगों के दौरान बलात्कार की शिकार होती हैं. इसके परिणामस्वरूप मोनी गर्भवती हो जाती है. लेकिन दोनों बहनें यह सच किसी के सामने स्वीकार नहीं करतीं, बल्कि वे कहती हैं कि इस बच्चे का पिता दंगों में मारा गया था. ऐसे ही मौके की बातचीत का एक टुकड़ा -

‘मोनी का पेट सहलाते हुए उन्होंने पूछ लिया, ‘बाप कहां से है इसका?’

मोनी का गला रुंध गया. बोल न सकी. पर सोनी ने झूठ बोल दिया. ‘खोरदा में क़तल हो गये. सब मारे गये. हमें बचा लिया एक...एक ट्रक वाले ने जो...जो रिफ़्यूजियों को लेकर जा रहा था.’

सोनी का गला भी भर गया. सूटी टेकती हुई बेबे, बुर्जी उतर के क़िले में गुम हो गई. दोपहर बाद एक बार फिर लौट कर आयीं. मोनी से कहा. ‘देख ध्यये, कोख में औलाद हो ख़स्म की तो उसके बाद भी औरत सुहागन ही रहती है. ये काला धागा पहन ले गले में. धागे में एक सोना चढ़ी कूड़ी है. इसी को मंगल समझ के पहन ले. तू सुहागन है. विध्वा नहीं!’ और एक कुंवारी को सुहागन बना कर चली गई.’

यूं तो पूरा उपन्यास पहले बंटवारे और फिर आजीवन शरणार्थी बने रहने की गहरी टीस में ही खत्म हो जाता है. लेकिन इस विभाजन की तकलीफ से गुजरने में भी गुलज़ार के शब्दों की जादूगरी पाठकों का ध्यान खींचने में सफल होती है. एक बानगी - ‘आसमान में बादल गीले पोतड़ों की तरह लटके हुए थे.’ या फिर ‘इंगलिस्तान की हुकूमत दुनिया से कुछ ऐसे ही सिमट रही थी जैसे धूप उतरने लगी हो.’

यह उपन्यास न सिर्फ लाखों परिवारों के, बल्कि दो मुल्कों के विभाजन की त्रासदी को काफी बारीकी से उकेरता है. खासतौर से विभाजन के दौरान बने ‘शरणार्थियों’ के ‘आजीवन के लिए रिफ्यूजी’ बनने की टीस को गुलजार ने बहुत ही गहराई से महसूस और दर्ज किया है.

दो मुल्कों को, दो इंसानों की तरह महसूस करना और दर्ज करना, यह सिर्फ गुलज़ार ही कर सकते हैं. पाकिस्तान से आकर भारत में बसा एक रिफ्यूजी, भारत और पाकिस्तान की सीमा पर आए दिन होती गोलाबारी को उपन्यास की अंतिम पंक्ति में कुछ यूं बयां करता - ‘पचास साल हुए...बल्के ज़्यादा ही होंगे. पता नहीं कब बड़े होंगे ये दोनों लोग?’ विभाजन की तकलीफ, दर्द और टीस को समझने-महसूस करने वालों के लिए यह एक अच्छा उपन्यास है.