अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाने वाली डुकाती और हार्ले डेविडसन की मोटरसाइकिलें अगले महीने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के ग्रेटर नोएडा में आयोजित होने वाले आॅटो एक्सपो में नहीं दिखेंगी. बजाज आॅटो और रॉयल एनफील्ड तो पिछली बार भी इसमें शामिल नहीं हुई थीं और इस बार भी यहां उनकी हिस्सेदारी नहीं होनी है. लग्जरी कार बनाने वाली आॅडी ने तो पिछले साल ही इससे दूर रहने का ऐलान कर दिया था. बताया जा रहा है कि इस बार स्कोडा, फोर्ड इंडिया, और निसान जैसी प्रतिष्ठित कार कंपनियां भी आॅटो एक्सपो में शामिल नहीं हो रहीं. ट्रक बनाने वाली डैमलर और वॉल्वो भी यहां से अनुपस्थित रहेंगीं. बीते सालों के दौरान भारत में आॅटो इंडस्ट्री तेजी से बढ़ी है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि भारत के इस सबसे बड़े ऑटो शो से वाहन निर्माता कंपनियां दूरी क्यों बना रही हैं?

आॅटो सेक्टर के जानकार इसकी दो खास वजहें बताते हैं. पहली यह कि एक्सपो में शामिल होने के लिए कंपनियों को करीब 30 से 50 करोड़ रुपये की रकम चुकानी पड़ती है. बताया जा रहा है कि इस आयोजन को दिल्ली से ग्रेटर नोएडा स्थानांतरित किए जाने से कंपनियों के संभावित ग्राहकों में कमी आई है और उन्हें अपनी लागत के बराबर कमाई नहीं मिल पा रही.

निसान इंडिया के एक अधिकारी के मुताबिक, ‘हमने आॅटो एक्सपो की संभावनाओं पर विचार किया था, लेकिन फैसला किया कि संभावित ग्राहकों तक पहुंचने के लिए हम दूसरे माध्यमों और मंचों का इस्तेमाल करेंगे.’ दूसरी तरफ महिंद्रा एंड महिंद्रा के मैनेजिंग डायरेक्टर कहते हैं, ‘निवेश और उससे हासिल होने वाला मुनाफा हमेशा से ही बहस का मुद्दा रहा है. वाहन निर्माताओं का देश के सबसे बड़े आॅटो शो में हिस्सा न लेना निराशाजनक है, लेकिन जहां तक महिंद्रा का सवाल है तो हम इसमें हिस्सा लेंगे और दर्शकों को कुछ नया भी दिखाएंगे.’

जानकारों का एक तबका यह भी मानता है कि इंटरनेट के विस्तार को कंपनियां अपने लिए काफी फायदेमंद मानती हैं. उनके मुताबिक आज सूचनाओं का विस्तार बेहद तेजी से हो रहा है और कंपनी के किसी भी ब्रांड-प्रोडक्ट की जानकारी के लिए लोग किसी इवेंट के बजाय उस पर ही निर्भर हैं. ऐसे में कई कंपनियां ऑटो एक्सपो पर करोड़ों रुपये खर्च करने को समझदारी भरा निवेश नहीं मान रहीं.