विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया अचानक गुजरात से लेकर दिल्ली तक के मीडिया में छाए हुए हैं. पिछले करीब पांच साल से मीडिया ने उन्हें भुला ही दिया था. उनके न्योते पर भी पत्रकार उनसे मिलने से कतराते थे और अफसर उनसे दूर भागने लगे थे. भाजपा के नेता भी प्रवीन तोगड़िया के करीब आने से बचते थे. आखिर ऐसा क्या हुआ कि वे हाशिए पर चले गये थे और गुजरात पुलिस की मानें तो उन्हें खबरों में आने के लिए एक जबरदस्त ‘स्टंट’ करना पड़ा!

प्रवीन तोगड़िया ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में रो-रोकर बताया कि कैसे उनका ‘एनकाउंटर’ भी हो सकता था. चूंकि उन्हें ज़ेड सुरक्षा मिली हुई थी इसलिए तमाम जानकारों का मानना है कि वे जब ‘एनकाउंटर’ की बात कर रहे थे तो उनका असली मतलब था पॉलिटिकल एनकाउंटर. गुजरात भाजपा के नेताओं से बात करने पर पता चलता है कि विधानसभा चुनाव के बाद सच में प्रवीण तोगड़िया के सियासी एनकाउंटर की तैयारी हो चुकी थी.

भाजपा और संघ में यह खबर आम है कि गुजरात में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को हराने के लिए प्रवीण तोगड़िया ने इस बार भी पूरा जोर लगा दिया था. इस बात का सबूत भी तब मिला जब उनसे मिलने भाजपा का तो एक भी बड़ा नेता नहीं पहुंचा लेकिन भाजपा विरोधी कई लोगों ने उनसे मुलाकात की. बेहोश तोगड़िया जब होश में आए तो उनसे तीन नामचीन लोगों की मुलाकात हुई. इनमें से पहले हैं हार्दिक पटेल, जिन्होंने गुजरात में मोदी अमित शाह की जोड़ी को हराने की कसम खा रखी है. हार्दिक ऐसे नेता हैं जो अब सिर्फ पटेल जाति की नहीं पूरे हिंदू धर्म की सियासत करना चाहते हैं इसलिए वे राम मंदिर बनाने की वकालत भी करते दिखते हैं और राहुल गांधी के समर्थक होने के बावजूद प्रवीण तोगड़िया के शिष्य भी हैं.

प्रवीण तोगड़िया से मिलने वाले दूसरे शख्स थे पूर्व आईपीएस अफसर डीजी वंजारा. वंजारा वही अफसर हैं जो इशरत जहां एनकाउंटर केस में जेल गए. वे एक वक्त में अमित शाह के बेहद करीबी माने जाते थे लेकिन बाद में उन्होंने जेल से ही एक सार्वजनिक पत्र लिखकर उनपर कई आरोप लगाए. इस बार वे भाजपा से टिकट लेकर चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन उन्हें टिकट नहीं दिया गया. अब वंजारा पूरी तरह भाजपा के खिलाफ हैं.

प्रवीण तोगड़िया और डीजी वंजारा का रिश्ता कैसा है इसे जानने-समझने के लिए हमें 2002 से पहले के गुजरात की सियासत को जानना पड़ेगा. उस वक्त अमित शाह प्रदेश स्तर के नेता भी नहीं थे. उस वक्त कैंसर स्पेशलिस्ट रहे प्रवीण तोगड़िया तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल के अमित शाह हुआ करते थे. गुजरात के पत्रकारों से बात करें तो दिलचस्प जानकारी मिलती है. जब गुजरात में केशुभाई शीर्ष पर थे तो हिंदू राजनीति के प्रतीक तोगड़िया ही थे. नरेंद्र मोदी और तोगड़िया अच्छे मित्र थे और गुजरात के पुलिस अफसर तोगड़िया के इशारे पर चलते थे.

धीरे-धीरे प्रवीन तोगड़िया का कद बढ़ता गया और उनकी जुबान तीखी होती गई. एक वक्त ऐसा आया जब वे भाजपा के साथ-साथ संघ के भी कंट्रोल से बाहर हो गए. उस वक्त भाजपा में अटल-आडवाणी का राज था और तोगड़िया को रास्ते पर लाने के लिए उनके मित्र नरेंद्र मोदी की गुजरात में वापसी हुई. हालांकि शुरू में मोदी के राज में भी तोगड़िया की ही तूती बोलती थी. उस समय तोगड़िया के ‘राइट हैंड’ माने जाने वाले गोरधन जडाफिया राज्य के गृह राज्यमंत्री हुआ करते थे. कहा जाता है कि 2002 में गुजरात में हुए दंगे भी इसीलिए काबू से बाहर हो गए थे. डीजी वंजारा को तभी से प्रवीण तोगड़िया का बेहद करीबी माना जाता है. 2002 के बाद मोदी गुजरात और देश से बाहर हिंदुत्व के प्रतीक बनते चले गए और तोगड़िया कहीं पीछे छूट गए.

प्रवीण तोगड़िया से मिलने वाले तीसरे शख्स थे कांग्रेस नेता अर्जुन मोढवाडिया. गुजरात के भाजपा नेता बताते हैं कि पिछले तीन चुनावों से तोगड़िया हर बार मोदी को हराने की कोशिश करते हैं, लेकिन खुद हार जाते हैं. इस बार भी उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. लेकिन वे फिर हार गए. पिछले दो दिनों में अहमदाबाद की सड़कों और अस्पताल में जो हुआ वह उसी हारे हुए नेता की एक और कोशिश थी.

विश्व हिंदू परिषद से जुड़े एक नेता की मानें तो शुरू में सच में चिंता हुई कि प्रवीणभाई अचानक कहां गायब हो गए. आजकल उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता इसलिए फिक्र होना लाजिमी था. लेकिन अब जो खबरें आ रही है इससे लगता है कि तोगड़िया गायब नहीं हुए थे. वे अपनी शक्ति को आजमाना चाहते थे. उन्होंने दिल्ली से लेकर गुजरात के जिले-जिले में अपने शुभचिंतकों तक संदेश भिजवाया, लेकिन दिल्ली में सुब्रहमण्यम स्वामी को छोड़कर किसी ने उनका हाल नहीं पूछा. गुजरात में भी लोग सड़कों पर निकले, पर संख्या इतनी नहीं थी कि भाजपा सरकार संभाल ना सके. आखिरकार तोगड़िया को सामने आना पड़ा और प्रेस कांफ्रेंस के जरिए भावनात्मक बातें कहनी पड़ी. इसका भी ज्यादा कुछ असर नहीं हुआ क्योंकि उनके समर्थन में न तो नागपुर से कोई प्रतिक्रिया आई और न ही दिल्ली से.

तोगड़िया ने ठीक ही कहा, उनका एनकाउंटर हो सकता है लेकिन वह पुलिसिया नहीं बल्कि उनका बचा-खुचा सियासी एनकाउंटर होगा. इसके तहत उनके बरसों पुराने मुकदमे खुल सकते हैं और सरकार से मिली ज़ेड सिक्योरिटी खतरे में पड़ सकती है.