केएल सहगल हिंदुस्तानी पार्श्वगायन मतलब प्लेबैक सिंगिंग के पहले जाने-माने चेहरे थे. 1931 में सवाक फिल्मों के आगमन के बाद वे पहले ऐसे गायक बने जिन्होंने इस नए माध्यम को बेहद नफासत से अपनाया और अपनी मौलिक आवाज के दम पर अभिनय के अलावा गायकी के भी पहले सुपरस्टार कहलाए. लाख कोशिशों के बावजूद उनके वक्त के दूसरे पार्श्वगायक उनकी बराबरी न कर सके और अगली पीढ़ी के मुकेश, किशोर और रफी जैसे गायक भी शुरुआत में उनकी ही नकल करके स्थापित हुए.

कुंदन लाल सहगल को यह लोकप्रियता सिर्फ उनकी अलग तरह की आवाज की वजह से नहीं हासिल हुई. वे जिन गीतों को गाते, उनमें पूरी तरह खुद को डुबा देते. गीतों के सही भावों को पकड़ने में उनका कोई सानी नहीं था और चाहे ‘नुक्ताचीन है गमे-दिल’ जैसी गजल हो या ‘देवदास’ फिल्म का ‘दुख के अब दिन बीतत नाहीं’, हिंदी फिल्म संगीत में रूह से सुर की मुलाकात करवाने वाले वे सबसे पहले पार्श्वगायक थे. एक तवायफ के यहां सीखी थोड़ी-बहुत संगीत की समझ के ऊपर जब वे मुरकियां और आलाप चढ़ाते थे, तो शास्त्रीय संगीत के कई दिग्गज हैरान रह जाया करते थे.

उनके समर्पण की एक तस्वीर ‘स्ट्रीट सिंगर’ (1938) नामक फिल्म की शूटिंग के वक्त की भी है. इस फिल्म में वे नायक थे और अपने गीतों को हमेशा की तरह अपनी आवाज दे रहे थे. तब तक हिंदुस्तानी फिल्म संगीत तकनीकी रूप से इतना सक्षम हो चुका था कि स्टूडियो में रिकॉर्ड किया जाने लगा था और सभी संगीतकार व सिंगर स्टूडियो के बंद कमरों के अंदर बैठकर ही संगीत रचा करते थे. लेकिन चूंकि ‘स्ट्रीट सिंगर’ में केएल सहगल की भूमिका सड़क पर गाने वाले एक गवइये की थी, इसलिए इस गीत को उन्होंने सड़क पर चलते हुए ‘लाइव’ गाया था!

गीत था अवध के नवाब वाजिद अली शाह की 1856 के आसपास लिखी ठुमरी ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए’, जो उन्होंने अंग्रेजों द्वारा लखनऊ निकाला दिए जाने के बाद अपने घर के बिछोह में लिखी और गाई थी. सहगल के बाद इसे भीमसेन जोशी, किशोरी अमोनकर से लेकर जगजीत सिंह और अरिजीत सिंह तक ने अपने अंदाज में गाया, लेकिन सहगल साहब ने जिस नायाब तरीके में सलीका मिलाकर गाया वैसा बाद के वर्षों में किसी सिंगर ने नहीं किया.

‘स्ट्रीट सिंगर’ के निर्देशक द्वारा शुरू में इंकार करने के बावजूद – क्योंकि लाइव गाने से गीत की गुणवत्ता प्रभावित होती – केएल सहगल ने न सिर्फ उन्हें मनाया बल्कि हाथ में हारमोनियम लेकर सड़क पर चलते हुए इस ठुमरी को राग भैरवी में ऐसा गाया कि वो मास्टरपीस बन गया. गीत को फिल्माने के दौरान ऑर्केस्ट्रा ने वहीं किनारे बैठकर लाइव म्यूजिक बजाया और पूरा गीत रिकॉर्ड करने के लिए एक सहायक माइक लेकर गाड़ी में सहगल के पीछे-पीछे चला.

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इस गीत का एक संस्करण स्टूडियो में भी रिकॉर्ड किया गया. उसमें और फिल्म में शामिल किए गए लाइव शूट हुए गीत के बीच का फर्क आप यहां सुन सकते हैं.

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