लखनऊ के नवाबों का ज़िक्र हो तो ‘इमामबाड़ा’, ‘भूल-भुलैया’, ‘रूमी दरवाज़ा’, ‘हज़रतगंज’, ‘गलौटी कवाब’, चाशनी भरी ज़ुबान, लगभग खंडहर हो चुकी ‘छतर मंजिल’ और जाने क्या-क्या ज़ेहन से गुज़रता है. नवाबों के वे लच्छेदार क़िस्से जो दुनिया भर में मशहूर हैं, वो ‘पहले आप-पहले आप’ या ‘नवाबी ठाठ’ और ‘नवाबी शौक’ जैसे जुमले जैसी बातें तो आप जानते ही हैं. पर क्या आप जानते हैं कि इन नवाबों ने तहज़ीब की वह मिसाल भी पेश की है जिसकी बदौलत अवध के इलाके में बंटवारे के वक़्त भी कौमी फ़साद नहीं हुए थे? आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह को कृष्ण बनकर होली खेलने का शौक़ था. वह ठुमरी जो अब पक्के रागों से ज़्यादा प्रचलित है, उसे लोकप्रिय करने में भी वाजिद अली शाह का योगदान है.

ये नवाब कभी अच्छे लड़ाके तो नहीं कहलाये, लेकिन वे शौकीन मिज़ाज और कला प्रेमी जरूर रहे. वास्तुकला यानी आर्किटेक्चर के मामले में भी उनका अपना ही ढंग था. उनके दौर में बने हर महल, कोठी, इमामबाड़े या मक़बरे पर मछली की नक्काशी ज़रूर मिलती है. जो शऊर और तहज़ीब लखनऊ वालों में कूट-कूट कर अब तक भरी हुई है, उसका बहुत कुछ श्रेय इन नवाबों को जाता है. इस सबकी शुरुआत करने वाला था शुजाउद्दौला जो अपनी पीढ़ी का तीसरा नवाब था.

नवाबों का उदय

सही मायनों में मुग़ल महज़ 200 साल ही हिंदुस्तान पर राज कर पाए थे. औरंगज़ेब की मौत के बाद मुग़लिया सल्तनत का आफ़ताब डूबने लगा था. छोटे-मोटे रियासतदार अपने-अपने इलाकों के खैरख्वाह बन गए थे. अवध के नवाबों के उत्थान के पीछे भी यही कारण है. लखनऊ के नवाब शिया थे जो ईरान के ख़ुरासान से हिंदुस्तान आए थे. औरंगजेब ने उनको ‘नवाबी’ दी थी. ‘नवाब’ लफ्ज़ ‘नायब’ से बना है जिसका हिंदी तर्जुमा है ‘सहायक’.

नवाबों की सल्तनत कुल जमा 135 साल ही थी. इसकी शुरुआत सितंबर नौ, 1722 में हुई थी जब मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह ने सादत अली खान को आगरा से अवध भेज दिया था. कारण था कि वह भरतपुर और आसपास के इलाकों में जाटों की बढ़ती ताक़त को रोकने में नाकामयाब रहा था. सादत अली खान ने फैज़ाबाद को अवध की राजधानी बनाया.

दिल्ली में सफ़दरजंग का मकबरा है. 1754 में सफ़दरजंग की मौत के बाद ही शुजाउद्दौला को फ़ैज़ाबाद की नवाबी मिली थी. वह पीढ़ी का तीसरा नवाब था जो फैज़ाबाद रहा. इसके बाद नवाबों ने लखनऊ को अपनी राजधानी बनाया. शुजाउद्दौला सही मायनों में पहला नवाब था जिसने ‘नवाबी’ तहज़ीब को साकार किया.

नवाबों की रईसी और रियाया की बदहाली

लखनऊ प्रेसीडेंसी के बारे में ऐसा कहा जाता है कि वह बंगाल, मद्रास और बम्बई प्रेसीडेंसी के ज़्यादा अमीर थी. फैज़ाबाद और लखनऊ के नवाबों के फलने-फूलने के दो कारण थे. पहला, गंगा का पानी, माक़ूल आबोहवा और उपजाऊ ज़मीन थी जहां लगान ख़ूब वसूला जा रहा था. दूसरा बक्सर की लड़ाई में - जिसका ज़िक्र आगे है- अंग्रेजों से हारकर शुजाउद्दौला ने संधि कर ली थी. इसके तहत लखनऊ अंग्रेजों की ज़िम्मेदारी बन गया था. नवाबों को सालाना 50 लाख रुपये मिलते थे. सो उनकी ख़ूब ऐश कट रही थी. ऐसे ही माहौल में रंगीनियां पनपती हैं. महलों में घुंघरू बजते हैं, जाम खनकते हैं और शेर-ओ-सुखन के दौर चलते हैं. उधर, रियाया का हाल बेहद बुरा था. लगानों ने उसकी कमर तोड़ कर रख दी थी.

शायरी दिल्ली से रूख़सत हुई तो नवाबों की ड्योढ़ी पर जाकर बैठी

यूं तो ग़ालिब का शेर है

‘है अब इस मा’मूरे के केहत-ए-ग़म-उल्फ़त, असद,

हम ने यह माना दिल्ली में रहें, खायेंगे क्या’

‘केहत-ए-ग़म-उल्फ़त’ की जगह ‘ग़म-ए-रोज़गार’ कर दीजिये तो उस वक़्त की दिल्ली के हाल से वाबस्ता हो जायेंगे. हालांकि, यह दास्तां ग़ालिब से कोई 100 साल पहले की है, पर हालात तब भी कोई बेहतर नहीं थे. बाद के मुग़लों के हालात इस फारसी कहावत से समझिये, ‘सल्तनत-ए-शाह-ए-आलम, अज़ दिल्ली ता पालम.’

ज़ाहिर है कि फ़नकारों के बुरे दिन आ गए थे. चुनांचे जनाब मीर सिराजुद्दीन ख़ान आरज़ू पहले शायर हुए जो दिल्ली के यकसां (समान) माहौल की तलाश में फैज़ाबाद कूच कर गए. बाद में मिर्ज़ा मोहम्मद रफ़ी ‘सौदा’ भी फ़ैज़ाबाद जा टिके. नवाबों ने भी उन्हें ख़ूब इज़्ज़त बख्शी, क़सीदों और तंज़ के सबसे अच्छे शायरों में गिने जाने वाले सौदा को सालाना 6000 रूपये दिए जाते. बाद में तानसेन के वारिस भी शुजा के दरबार में हाज़िरी लगाने लगे.

जब मीर तक़ी मीर ने लखनऊ वालों को बेशऊर कह दिया

नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली की लूटपाट की मारी हुई दिल्ली से तंग आकर शायर मीर तक़ी मीर भी आसफुद्दौला के दरबार में लखनऊ जा बसे थे. पर उनका जी दिल्ली से ही जुड़ा हुआ था. बात बात में ‘दिल्ली में ये..’ ‘दिल्ली में वो...’ उनकी जुबां पर रहता. एक बार किसी बात पर ख़फ़ा हो गए तो लखनऊ वालों को कह दिया

‘हनोज़ (अब तक) लौंडे हो, कद्र हमारी क्या जानो?

शऊर चाहिए इम्तियाज़ (भेद) करने को’

शुजाउद्दौलाना गांठ का पक्का, न लंगोट का सच्चा

खैर, ये अमूमन सभी नवाबों का हाल था. पर शुजा मियां तो हद दर्जे के ऐयाश थे. किस्सा है कि एक बार एक खत्री लड़की पर उनका जी आ गया. उठा लाये एक रात के लिए! बस फिर क्या था. शहर में कोहराम मच गया. हिंदू रियाया ने लड़की को छोड़ने की मांग की. शुजाउद्दौला नहीं माना. बग़ावत के सुर उठने लग गए. बात दिल्ली दरबार तक जा पहुंची. नवाब को फैज़ाबाद की नवाबी से बेदख़ल करने की बात चलने लगी. रियासत के दीवान, राजा राम नारायण तक बाग़ी तेवर दिखाने लग गए. शुजा की वालिदा सद्र-ए-जहान बेगम ने लोगों की मानमनौव्वल की. महंगे तोहफ़े देकर ऊंचे ओहदे पर बैठे लोगों को ख़रीदा और जैसे तैसे मामले को दबाया.

नवाब की बेग़म उम्मत-उल-ज़ोहरा उर्फ़ बहू बेग़म

बेहद ज़हीन औरत थीं ये. शुजाउद्दौला की सारी कारगुजारियां छुपकर सहतीं और बेबस रहतीं. शुजा की कई रखैलें और बांदियां थीं. वह बहू-बेग़म के लिहाज़ के मारे उनसे छुप-छुप कर मिलता. बहू बेग़म को यह बात मालूम थी, इसीलिए जिन हवेलियों में नवाब रंगीनियों में डूबा रहता, वे उन्हें ‘चोर मंज़िल’ कहतीं.

रवि भट्ट ने नवाबों के जीवन पर एक क़िताब लिखी है, ‘द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ़ नवाब्स ऑफ़ लखनऊ’. रवि भट्ट लिखते हैं कि बहू बेग़म नवाब के प्रति इतनी निष्ठावान थीं कि बक्सर की लड़ाई में हारने के बाद जब शुजाउद्दौला काफ़ी तंगहाल हो गया था, तो उन्होंने अपनी नथ तक बेच डाली.

पानीपत और बक्सर की लड़ाइयां

शुजाउद्दौला वह नवाब है जिसने अफ़गानी सरदार अहमद शाह अब्दाली के साथ मिलकर मराठों की फौज को पानीपत की तीसरी लड़ाई में हराया था. कहने को तो मराठों का साथ भरतपुर के राजा सूरजमल जाट ने दिया था पर जब लड़ने का वक़्त आया तो मराठा पेशवा अब्दाली और शुजाउद्दौला के सामने अकेला ही खड़ा था. भरतपुर से ताल्लुक रखने वाले भूतपूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी किताब ‘महाराजा सूरजमल’ में कुछ तथाकथित मजबूरियों का जिक्र किया है जिनकी वजह से सूरजमल जाट ने शुजाउद्दौला और अहमद शाह अब्दाली से संधि कर ली और पेशवाओं को छोड़ दिया. लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि हर राजा मौकापरस्त होता है.

खैर, अपनी बात पर आते हैं. यूं तो शुजाउद्दौला शिया था, पर माना जाता है कि उसने सुन्नी अब्दाली का साथ इसलिए दिया क्योंकि इस लडाई को मज़हबी रंग दे दिया गया था. मराठों की करारी हार हुई थी.

वहीं, दूसरी तरफ, शुजाउद्दौला का ससुर और पहला नवाब सादत अली खान शिया संप्रदाय के नादिर शाह के ख़िलाफ़ लड़ा था. बताते हैं कि जब नादिर शाह ने उससे पूछा कि वह एक शिया होने के बाद भी दूसरे शिया का साथ क्यों नहीं दे रहा? तो सादत अली खान ने कहा ‘इसलिए कि इतिहास मुझ पर तोहमत न लागए कि मैंने अपने बादशाह से ग़द्दारी कर ली.’ बादशाह यानी मुग़ल सुन्नी थे.

1764 में हुई बक्सर की लड़ाई में अंग्रेजों के हाथों शुजाउद्दौला की करारी हार हुई. यह जंग उसने दिल्ली के मुग़ल शाह आलम और बंगाल के मीर कासिम के साथ मिलकर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ी थी.

ये दोनों लड़ाइयां इतिहास में इसलिए अहम हैं. एक ने मराठा ताक़त को कुछ साल के लिए हिंदुस्तान पर कब्ज़ा करने से रोक लिया. दूसरी लड़ाई इसलिए अहम है कि बक्सर में जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था. यानी यह लड़ाई वह निर्णायक मोड़ थी जहां से माना जाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी का राज शुरू हुआ..

नवाब का मकबरा और अशोक स्तम्भ

26 जनवरी, 1775 को शुजाउद्दौला की मौत हो गई थी. फ़ैज़ाबाद में ही नवाब का मक़बरा है जो ‘गुलाब बाड़ी’ के नाम से मशहूर है. यह शायद देश का अकेला मकबरा होगा जहां पर सरकार ने अशोक स्तंभ गड़वा रखा है.

शुजाउद्दौला के बाद आसफुद्दौला ने राजधानी को फैज़ाबाद से लखनऊ पहुंचा दिया. फिर नवाब वहीं जमकर रह गए. वाजिद अली शाह पीढ़ी के आख़िरी नवाब थे. 1857 के गदर के बाद नवाबियत ख़त्म हो जाती है. हालांकि किस्सों में यह आज भी जारी है.