अगर आप पुरानी कार खरीदने का मन बना रहे हैं तो यह खबर आपके काम की हो सकती है. इस शनिवार राजधानी दिल्ली में हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक में 20 वस्तुओं से जुड़े कर की दरों में सुधार करने का फैसला लिया है. इनमें इस्तेमाल किए हुए वाहन भी शामिल हैं. अब से जहां इस्तेमाल की गई कारों पर लगने वाले कर को घटनाए जाने की खबर है वहीं कुछ श्रेणी के वाहनों से सेस हटाए जाने का भी फैसला लिया गया है. काउसिंल की इस पच्चीसवीं बैठक की अध्यक्षता वित्त मंत्री अरूण जेटली ने की थी.

आपको बता दें कि देश में जीएसटी लागू होने के बाद इस्तेमाल की गई बड़े आकार की कारों और एसयूवी पर लगने वाले टैक्स की दर 28 फीसदी थी जिसे घटाकर अब 18 प्रतिशत कर दिया जाएगा. वहीं छोटे आकार की कारों और मोटर वाहनों पर लगने वाले 28 फीसदी टैक्स को घटाकर अब 12 प्रतिशत किए जाने का फैसला लिया गया है. इसके अलावा इन दोनों ही श्रेणियों में लगने वाले सेस को भी सरकार ने वापिस ले लिया है. खबरों के मुताबिक इस बैठक में जीएसटी काउंसिल ने एंबुलेंस पर लगने वाले 15 प्रतिशत सेस को हटाने का भी फैसला लिया है.

कर की घटी दरों को लेकर जानकारों का कहना है कि सरकार के इस कदम से उन लाखों ग्राहकों को सीधा फायदा होगा जिन्हें कार की जरूरत तो है, लेकिन नई कार खरीदने का उनका सामर्थ्य नहीं. विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि नई जीएसटी की दरों से बाजार में मौजूद लगभग सभी ऑटोमोबाइल कंपनियों पर प्रभाव पड़ेगा. बाजार में ऐसी कई कंपनियां मौजूद हैं जिनके कारोबार का एक बड़ा हिस्सा इस्तेमाल की गई कारों पर निर्भर है. इनमें मारुति (ट्रू वेल्यू) और महिंद्रा (फर्स्ट चॉइस) से लेकर मर्सिडीज़ बेंज, ऑडी, निसान और रेनो जैसी कंपनिया शामिल हैं.

बसों और टैक्सियों में जीपीएस और अलर्ट बटन लगाना जरूरी

सार्वजनिक परिवहन सेवाएं देने वाली टैक्सियों और बसों को आगामी एक अप्रैल से ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) उपकरण और ‘अलर्ट बटन’ (जिसे दबाकर यात्री पुलिस की मदद ले सकते हैं) लगाना अनिवार्य होगा. हालांकि रिक्शा और इलेक्ट्रिक रिक्शा को इससे मुक्त रखा गया है. इस संबंध में मंत्रालय की तरफ से बुधवार को ट्वीट किया गया था. सड़क परिवहन मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा है कि यात्रियों की सुरक्षा को देखते हुए अब यह समय सीमा और नहीं बढ़ाई जाएगी.

सार्वजनिक वाहन ऐसे उपकरणों को, बनाने वालों या फिर उनके डीलरों से लगवा सकते हैं. वैसे पहले सुरक्षा के मद्देनजर मंत्रालय ने 29 सीटों से ज्यादा वाली बसों में सीसीटीवी लगाने का प्रस्ताव भी दिया था. लेकिन इसे बाद में यात्रियों की निजता यानी प्राइवेसी को ध्यान में रखते हुए वापिस ले लिया गया.

सूत्रों के हवाले से ‘द टाइम्स आॅफ इंडिया’ ने लिखा है कि सार्वजनिक यातायात के वाहनों में लोकेशन बताने वाले उपकरण लगें, इसकी जिम्मेदारी राज्य परिवहन विभागों की होगी. साथ ही उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी यात्री के उन वाहनों में लगे ‘अलर्ट बटन’ को दबाते ही विभाग और पुलिस की तरफ से उसे फौरन सहायता मुहैया कराई जाए.

हालांकि जानकारों के मुताबिक सिर्फ जीपीएस और अलर्ट बटन लगाना काफी नहीं है. समाज और विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था ‘सेफ्टीपिन’ की सहसंस्थापक कल्पना विश्वनाथ कहती हैं, ‘जीपीएस और अलर्ट बटन लगाना ही समस्या का समाधान नहीं, इसकी कड़ी निगरानी भी जरूरी है. सुरक्षा संबंधी दूसरे इंतजामों पर भी लगातार सोचना होगा.’

ऑटो एक्सपो-2018 से कई बड़े वाहन निर्माताओं ने दूरी बनाई

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाने वाली डुकाती और हार्ले डेविडसन की मोटरसाइकिलें अगले महीने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के ग्रेटर नोएडा में आयोजित होने वाले आॅटो एक्सपो में नहीं दिखेंगी. बजाज आॅटो और रॉयल एनफील्ड तो पिछली बार भी इसमें शामिल नहीं हुई थीं और इस बार भी यहां उनकी हिस्सेदारी नहीं होनी है. लग्जरी कार बनाने वाली आॅडी ने तो पिछले साल ही इससे दूर रहने का ऐलान कर दिया था. बताया जा रहा है कि इस बार स्कोडा, फोर्ड इंडिया, और निसान जैसी प्रतिष्ठित कार कंपनियां भी आॅटो एक्सपो में शामिल नहीं हो रहीं. ट्रक बनाने वाली दाइमलर और वॉल्वो भी यहां से अनुपस्थित रहेंगीं. बीते सालों के दौरान भारत में आॅटो इंडस्ट्री तेजी से बढ़ी है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि भारत के इस सबसे बड़े ऑटो शो से वाहन निर्माता कंपनियां दूरी क्यों बना रही हैं?

आॅटो सेक्टर के जानकार इसकी दो खास वजहें बताते हैं. पहली यह कि एक्सपो में शामिल होने के लिए कंपनियों को करीब 30 से 50 करोड़ रुपये की रकम चुकानी पड़ती है. बताया जा रहा है कि इस आयोजन को दिल्ली से ग्रेटर नोएडा स्थानांतरित किए जाने से कंपनियों के संभावित ग्राहकों में कमी आई है और उन्हें अपनी लागत के बराबर कमाई नहीं मिल पा रही.

निसान इंडिया के एक अधिकारी के मुताबिक, ‘हमने आॅटो एक्सपो की संभावनाओं पर विचार किया था, लेकिन फैसला किया कि संभावित ग्राहकों तक पहुंचने के लिए हम दूसरे माध्यमों और मंचों का इस्तेमाल करेंगे.’ दूसरी तरफ महिंद्रा एंड महिंद्रा के मैनेजिंग डायरेक्टर कहते हैं, ‘निवेश और उससे हासिल होने वाला मुनाफा हमेशा से ही बहस का मुद्दा रहा है. वाहन निर्माताओं का देश के सबसे बड़े आॅटो शो में हिस्सा न लेना निराशाजनक है, लेकिन जहां तक महिंद्रा का सवाल है तो हम इसमें हिस्सा लेंगे और दर्शकों को कुछ नया भी दिखाएंगे.’

जानकारों का एक तबका यह भी मानता है कि इंटरनेट के विस्तार को कंपनियां अपने लिए काफी फायदेमंद मानती हैं. उनके मुताबिक आज सूचनाओं का विस्तार बेहद तेजी से हो रहा है और कंपनी के किसी भी ब्रांड-प्रोडक्ट की जानकारी के लिए लोग किसी इवेंट के बजाय उस पर ही निर्भर हैं. ऐसे में कई कंपनियां ऑटो एक्सपो पर करोड़ों रुपये खर्च करने को समझदारी भरा निवेश नहीं मान रहीं.