बीते मंगलवार को ग्रामीण भारत के लिए एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर)-2017 जारी की गई. यह रिपोर्ट देश के 24 राज्यों के 28 जिलों के 30 हजार बच्चों के बीच किए गए सर्वे के आधार पर तैयार की गई है. इसमें देश में पहली बार आठवीं से लेकर 12वीं कक्षा तक के छात्र-छात्राओं के सामान्य और बौद्धिक ज्ञान से संबंधित कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं. उदाहरण के लिए, सर्वे में शामिल 36 फीसदी किशोर अपने देश की राजधानी का नाम नहीं जानते. साथ ही, आधे से अधिक बच्चे साधारण गुणा-भाग के सवाल हल नहीं कर सकते. इससे पहले बीते एक दशक से देश में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति पर ‘असर’ रिपोर्ट जारी की जाती थी.

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने इस रिपोर्ट के जारी होने के बाद देश में शिक्षा की स्थिति को लेकर चिंता जाहिर की. उनके मुताबिक यह गंभीरता से सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हो रहा है और क्या होना चाहिए.

उधर, इस रिपोर्ट को लेकर देश के प्रमुख अखबारों ने भी शिक्षा व्यवस्था को लेकर अपनी-अपनी चिंता जाहिर की है. इस रिपोर्ट में सामने आईं बातों के आधार पर अधिकांश अखबारों का मानना है कि अगर शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं लाया गया तो देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. साथ ही, अखबारों ने स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के नए तरीकों को लागू करने के साथ बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता और शिक्षा की गुणवत्ता पर भी जोर दिया है.

अमर उजाला के मुताबिक यह रिपोर्ट माध्यमिक शिक्षा की बदतर स्थिति को सामने रखती है. उसने इसे शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवालों को पैदा करने वाला भी बताया है. अखबार आगे कहता है कि इस रिपोर्ट में दर्ज आंकड़े शहरों और गांवों में दी जानी वाली शिक्षा में भारी असंतुलन को दिखाते हैं. दूसरी ओर, इस रिपोर्ट से यह बात भी सामने आई है कि शिक्षा के अधिकार संबंधी कानून का फायदा हुआ है और अब करीब पांच फीसदी ही किशोर हैं जो स्कूल नहीं जाते. साथ ही, अमर उजाला ने मोबाइल फोन आधारित इंटरनेट के विस्तार के युग में स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी का जिक्र किया है. इसके अलावा उसने शिक्षा व्यवस्था में वैज्ञानिक सोच के साथ बड़े बदलाव पर भी जोर दिया है.

‘असर’ की रिपोर्ट पर बात करते हुए द टाइम्स ऑफ इंडिया का मानना है कि देश के स्कूली शिक्षा तंत्र में भारी खामियां हैं जिन्हें सिर्फ कानून बनाकर दूर नहीं किया जा सकता. अखबार का आगे मानना है कि स्कूलों में छात्र-छात्राओं की संख्या बढ़ने के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ है. इसकी वजह से ये छात्र अपने स्तर के मुताबिक योग्यता हासिल करने के मामले में काफी पीछे हैं. अंग्रेजी के इस प्रमुख अखबार ने आगे आशंका जताई है कि आने वाले वक्त में इसका समाज और अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है. उसके मुताबिक इस स्थिति में देश को जिस युवा आबादी का फायदा (जनसांख्यिकी लाभांश) मिलना चाहिए, वह अब टाइम बम में तब्दील हो रही है. इसके साथ ही अखबार ने शिक्षा व्यवस्था के चुनावी मुद्दा न बनने को बदकिस्मती और इसमें सुधार को वांछित राष्ट्रीय प्राथमिकता बताया है.

प्रमुख कारोबारी अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड के हिंदी संस्करण का कहना है कि प्रत्येक साल ‘असर’ की रिपोर्ट एक निराशाजनक तस्वीर पेश करती आ रही है. अखबार के मुताबिक शिक्षा के अधिकार कानून-2009 का भी सीमित प्रभाव ही देखने को मिला है. इसे अप्रैल, 2010 में लागू किया गया था. अखबार का आगे मानना है कि इस रिपोर्ट से यह साबित होता है कि भले ही स्कूलों में बने रहने वाले बच्चे पढ़ाई छोड़ने वालों से बेहतर हैं लेकिन, इनका शैक्षणिक कौशल इतना अच्छा नहीं है कि वे आगे चलकर कोई बेहतर रोजगार हासिल कर सकें. बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपने संपादकीय के आखिर में कहा है कि ‘असर’ की रिपोर्ट से निकली सबसे अहम बात है कि शिक्षण के नए तरीकों की तलाश कर बच्चों को बेहतर शिक्षा दी जाए.

उधर, हिन्दुस्तान टाइम्स का इस बारे में कहना है कि इस सर्वे में छात्र-छात्राओं के जिस आयुवर्ग को शामिल किया है वे आर्थिक मुख्यधारा में शामिल होने से कुछ ही दूरी पर खड़े हैं. ऐसे में उनमें सीखने की क्षमता में कमी देश में कुशल मानव संसाधनों के अभाव में बदल सकती है. साथ ही, इसकी वजह से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंच सकता है. अखबार ने रिपोर्ट में छात्र-छात्राओं की शैक्षणिक स्थिति की तस्वीर की वजह बुनियादी ढांचे के अभाव, शिक्षकों की संख्या और गुणवत्ता में कमी और उचित शिक्षण-पद्धति के अभाव को माना है.