स्वच्छ भारत अभियान नरेंद्र मोदी सरकार के सबसे बड़े और चर्चित कार्यक्रमों में से एक है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मिशन के अगुआ हैं और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी प्रेरणा. प्रधानमंत्री की आधिकारिक वेबसाइट इस मिशन के बारे में कहती है कि लोग इसमें बढ़-चढ़कर शामिल हो रहे हैं और यह एक राष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है. वेबसाइट के मुताबिक़ आम लोगों के सहयोग से महात्मा गांधी का ‘स्वच्छ भारत’ का सपना अब साकार होने लगा है.

लेकिन क्या सच में ऐसा है? जानकार कहते हैं कि नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार दावे चाहे जितने बड़े कर ले, लेकिन यह बात गले नहीं उतरती कि स्वच्छ भारत अभियान अब राष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है. वे कहते हैं कि अगर ऐसा होता तो इसके साथ देशभर में सीवरों की सफ़ाई के दौरान मारे जा रहे सफ़ाईकर्मियों की सुरक्षा के लिए भी कोई न कोई आंदोलन अब तक छिड़ गया होता.

बीते चार सालों में सरकार देश को स्वच्छ बनाने का दावा करती रही और दूसरी तरफ़ सीवरों में सफ़ाईकर्मियों की मौतें होती रहीं. इस दौरान ऐसी एक घटना याद नहीं आती जब यह काम करने वालों के लिए सरकार या समाज के स्तर पर कोई निर्णायक क़दम उठाया गया हो. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ‘स्वच्छ भारत’ की तस्वीर में इन सफ़ाईकर्मियों की जगह कहां है?

रॉयटर्स
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पांच सालों में 1896 मौतें

सामाजिक कार्यकर्ता बेजवाड़ा विल्सन के मुताबिक़ बीते पांच से छह सालों के बीच देश में 1896 सफ़ाईकर्मियों की मौत सीवर साफ़ करने के दौरान हुई है. अकेले दिल्ली में यह संख्या 96 है. सरकारें इस मुद्दे पर कितनी लापरवाह हैं इसका अंदाज़ा बीते रविवार को दिल्ली में हुए एक और हादसे से लग जाता है. यहां नौ सितंबर को मोती नगर में सीवर की सफ़ाई के दौरान दम घुटने से पांच सफ़ाईकर्मियों को जान गंवानी पड़ी है.

वहीं, हाल के महीनों में यहां 12 सफ़ाईकर्मियों की मौत हुई है. यह हाल तब है जब केंद्र सरकार के दावों के अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ख़ुद जल बोर्ड का कार्यभार संभाला हुआ है. पिछले साल उनकी सरकार ने आधुनिक तकनीक से सीवरों की सफ़ाई करवाने की बात कही थी ताकि सफ़ाईकर्मियों की मौतों को रोका जा सके. लेकिन रविवार को हुआ हादसा केंद्र और दिल्ली की सरकार के दावों और इरादों पर सीधे-सीधे सवाल खड़े करता है.

दिल्ली में सीवरों की सफ़ाई के लिए आम आदमी पार्टी की सरकार ने पिछले साल 200 मशीनों का ऑर्डर दिया था, लेकिन ये मशीनें अब तक जल बोर्ड को नहीं मिल पाई हैं. वहीं, ऐसे हादसों के मामले में मोदी सरकार का रवैया देखकर लगता है कि सफ़ाईकर्मियों की मौत उसके लिए कोई मुद्दा ही नहीं है.

बीते चार सालों में स्वच्छ भारत अभियान के अगुआ प्रधानमंत्री मोदी ने कई मशहूर हस्तियों को अपने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का हिस्सा बनाया जिनका संबंध न तो साफ़-सफ़ाई के काम से है और न सफ़ाईकर्मियों की समस्याओं से. इस दौरान ऐसा एक वाक़या याद नहीं आता जब प्रधानमंत्री ने देश की सफ़ाई करते हुए मारे गए लोगों के लिए दुख जताया हो. रविवार को हुए हादसे पर मोदी सरकार में सामाजिक न्याय मंत्री थावरचंद गहलोत ने भी चुप्पी साधी हुई है. और वहीं दूसरी तरफ यह जग-ज़ाहिर तथ्य है कि तकरीबन सभी सफ़ाईकर्मी दलित समुदाय से आते हैं, लेकिन उनके लिए किसी बड़े दलित नेता या केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और रामदास अठावले ने भी आवाज़ नहीं उठाई है.

स्वच्छ भारत के असली सिपाही ‘नंगे’ और ‘निहत्थे’ हैं

देश को पूरी तरह साफ़-सुथरा बनाने के नाम पर सरकार अरबों रुपये ख़र्च कर रही है. लेकिन जिन लोगों के बिना यह सपना पूरा होना मुमकिन ही नहीं, उनकी सुरक्षा के लिए उसके और उसकी सहयोगी सरकारों के पास कोई मास्टर प्लान नहीं है. ये लोग बिना कपड़ों के सीवरों में उतरने और अपने हाथ से गंदगी साफ़ करने को मजबूर हैं. वहीं कई मीडिया रिपोर्टें बताती हैं कि सीवर में उतरने से पहले ये लोग जो तेल अपने शरीर पर लगाते हैं, वह भी कई बार इन्हें अपने ही पैसों से ख़रीदना पड़ता है. वहीं, सरकारी सफ़ाई और कार्रवाई की बातों में इस सवाल का तो कोई महत्व ही नहीं है कि गटर में उतरने से पहले और उसके बाद भी ये सफ़ाईकर्मी किस भावना से गुज़रते हैं. इस दौरान अगर ये मारे जाएं तो फिर इनका शव देखना तक परिजनों के लिए कितना मुश्किल होगा इसकी कल्पना करना भी हमारे लिए मुमकिन नहीं है.

ज़्यादा पीछे न जाकर 2018 की ही बात करें तो ‘गटर की मौतों’ का यह सिलसिला साल के पहले दिन से ही जारी है. एक जनवरी को मुंबई में एक सीवर लाइन की सफ़ाई करते हुए पांच सफ़ाईकर्मी दुर्घटना का शिकार हो गए थे. उन्हें एक क्रेन के ज़रिए खींचकर बाहर निकाला जा रहा था तभी क्रेन का तार टूट गया. इस हादसे में तीन कर्मियों की मौत मौक़े पर ही हो गई. वहीं एक ने अस्पताल में दम तोड़ दिया था और इस घटना के पांचवें पीड़ित के दोनों पैर टूट गए. फिर सात जनवरी को बेंगलुरु के एक अपार्टमेंट के मैनहोल की सफ़ाई करते हुए तीन सफ़ाईकर्मियों की मौत की खबर आई.

इसके बाद 14 जनवरी को आंध्र प्रदेश के चित्तूर में एक सीवर की सफ़ाई के दौरान दम घुटने से सात सफ़ाई मज़दूरों की मौत हो गई. इस घटना के बारे में जो जानकारी सामने आई उसके मुताबिक सीवर की सफ़ाई के लिए उतरा एक सफ़ाई कर्मचारी दम घुटने से बेहोश हो गया था. फिर उसके साथ काम कर रहे आठ अन्य लोग भी उसे बचाने की कोशिश में सीवर में उतरे और वे भी बेहोश हो गए. इस घटना में चार सफाईकर्मियों की मौक़े पर ही मौत हो गई थी, जबकि तीन ने उपचार के दौरान दम तोड़ दिया. बीती जुलाई में दिल्ली-एनसीआर के तहत आने वाले ग़ाज़ियाबाद में भी ऐसा ही हादसा हुआ और इसमें एक के बाद एक तीन लोगों को जान गंवानी पड़ी थी. इसके बाद बीते रविवार को मोती नगर में चार और सफ़ाईकर्मी अपनी जान से हाथ धो बैठे.

क़ानून का मज़ाक़

मैनहोल सफ़ाईकर्मियों की लगातार होती मौतें क़ानून व्यवस्था पर भी एक धब्बा हैं. यह केवल दोहराने वाली बात बनकर रह गई है फिर भी, ‘प्रॉहिबिशन ऑफ एंप्लॉयमेंट एज़ मैन्युअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहेबिलिटेशन (पीईएमएसआर) एक्ट’ के मुताबिक़ देश में हाथ से मैला ढोने, बिना सुरक्षा उपकरण के सीवर व सेप्टिक टैंक साफ़ करने और बिना पानी की व्यवस्था वाले (सूखे) शौचालय बनाने की मनाही है. लेकिन हक़ीक़त हम सब जानते हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि जो लोग मजबूरी में यह काम कर रहे हैं उनकी जान का मान नहीं रखा जाता, तभी तो बिना सुरक्षा उपकरणों के उन्हें सीवरों में ज़बरदस्ती उतारा जाता है. रविवार को हुआ हादसा इसका उदाहरण है. रिपोर्टों में ज़िंदा बचे पीड़ितों के हवाले से बताया गया है कि जो सफ़ाईकर्मी सीवर की ज़हरीली गैस से मारे गए, उन्हें नौकरी से निकालने की धमकी देकर गटर में भेजा गया था. वहीं, इन लोगों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जब इलाक़े का दौरा किया तो पता चला कि यहां भी मौत की वजह सुरक्षा के लिए दिए जाने वाले उपकरणों का न होना था.

पीईएमएसआर एक्ट मैन्युअल स्कैवेंजरों के पुनर्वास और उन्हें वैकल्पिक व्यवसाय प्रदान करने की भी बात करता है. लेकिन यहां भी क़ानून का पालन किया नहीं जाता या हो नहीं पाता. इन लोगों का जीवन स्तर सुधारने के लिए साल 2014-15 में 448 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया गया था. 2015-16 में यह रक़म बढ़ाकर 470 करोड़ रुपये कर दी गई. लेकिन 2017-18 तक आते-आते यह राशि धड़ाम से गिरी और केवल पांच करोड़ रुपये रह गई. इसका कारण यह था कि बीते चार सालों में केवल 56 करोड़ रुपये ही मैन्युअल स्कैवेंजरों के पुनर्वास और उन्हें दूसरे रोज़गारों में लगाने के लिए ख़र्च हो पाए.

इस मामले में संबंधित सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय बताता है कि अशिक्षा, ख़ुद का रोज़गार चलाने के लिए आत्मविश्वास की कमी और रिकवरी न होने की संभावना के चलते बैंकों की तरफ़ से क़र्ज़ नहीं मिलना सफाईकर्मियों के धीमे पुनर्वास की मुख्य वजहें हैं. मंत्रालय के मुताबिक़ कम आत्मविश्वास की वजह से ये लोग आय के अन्य विकल्प नहीं खोजते और आख़िरकार सफ़ाई का काम ही मांगते हैं. वहीं, चूंकि इस काम में लगे ज़्यादातर लोग दलित समुदाय से आते हैं इसलिए उनकी समस्याओं के समाधान और अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने की ज़िम्मेदारी भी शायद बहुसंख्यक समाज ने उन्हीं की मान ली है. यह भी एक बड़ी वजह है कि समाज का मुख्य तबक़ा जो गंदगी फैलाने में सबसे बड़ा हिस्सेदार भी है, इन लोगों के लिए कभी कोई प्रभावी गोलबंदी करता दिखाई नहीं देता. सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन इस मसले पर कहते हैं कि भारतीय समाज की मानसिकता यह है कि सफ़ाई का काम एक ख़ास वर्ग (दलितों) का ही है. उनके मुताबिक़ जब तक इस सोच में बदलाव नहीं आएगा तब तक यह समस्या बनी रहेगी.

क्या रोबो स्कैवेंजिंग एक विकल्प है?

सरकारों की अनदेखी के अलावा सीवरों की बनावट भी इन मौतों के लिए ज़िम्मेदार है. सीवरों के डिज़ाइन ऐसे हैं कि उनमें किसी इंसान के जाए बग़ैर सफ़ाई नहीं हो सकती. नतीजतन, इनकी सफ़ाई में सफाईकर्मियों की जिंदगी का सफ़ाया हो रहा है. हालांकि केरल में हुए एक सफल प्रयोग से इस समस्या का छोटा, लेकिन प्रभावशाली समाधान निकल सकता है.

देश में सीवरों की सफ़ाई के मौजूदा अमानवीय तरीक़े और इसके जानलेवा परिणामों को देखते हुए हाल ही में कुछ युवा इंजीनियरों ने केरल सरकार के सामने रोबो स्कैवेंजिंग (रोबोट के ज़रिए सीवरों की सफ़ाई) का प्रस्ताव रखा था. ये सभी ‘जेनरोबोटिक इनोवेशन्स’ नाम की कंपनी के सह-संयोजक हैं. ये युवा अपना एक प्रोजेक्ट लेकर केरल सरकार के पास गए थे. अच्छी बात यह रही कि सरकार ने राज्य के जल प्राधिकरण के साथ मिलकर कंपनी को वित्तीय सहायता देने का फ़ैसला किया.

इस काम के लिए कंपनी ने जो मशीन तैयार की है उसका नाम ‘बैंडीकूट’ है. यह मशीन ज़मीन और मैनहोलों के अंदर से कचरा खोदकर निकालती है. इस साल फ़रवरी में मशीन का पहला प्रारूप तैयार हो चुका था. तब से अब तक कई बार इसकी असल टेस्टिंग हो चुकी है. कंपनी के संयोजक अरुण के मुताबिक़ इस मशीन को चलाना मोबाइल ऑपरेट करने जितना आसान है. यह स्वचालित है और इसका आकार मैनहोल के आकार के मुताबिक़ है. कंपनी अलग-अलग डिज़ाइन के मैनहोलों के हिसाब से भी मशीनें तैयार कर रही है.

बैंडीकूट के साथ जेनरोबोटिक इनोवेशन्स की टीम.
बैंडीकूट के साथ जेनरोबोटिक इनोवेशन्स की टीम.

हाल में जेनरोबोटिक इनोवेशन्स ने कई प्रयोगों के तहत सीवरों की सफ़ाई की है. केरल के अलावा कंपनी दूसरे राज्यों के भी संपर्क में है. अगर वह आगे भी अपने प्रयास में कामयाब हुई और सरकारों ने गंभीरता दिखाई तो शायद आने वाले वक़्त में सीवरों की सफ़ाई के लिए सफ़ाईकर्मियों को उनमें उतरने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

युवाओं का यह प्रयास एक उम्मीद जगाता है, लेकिन जब तक इस मशीन या ऐसी अन्य मशीनों का इस्तेमाल चलन में नहीं आता तब तक काम के दौरान सफाईकर्मियों की जान का जोखिम कम करने की त्वरित जरूरत तो है ही.