माओवादियों के खिलाफ सुरक्षाबलों की नई रणनीति के परिणाम दिखने लगे हैं. इसके चलते देश में माओवादियों की हिंसा से प्रभावित कई जिलों की संख्या में कमी आई है. केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2015 से माओवादियों के कब्जे वाले जिलों की संख्या में उल्लेखनीय रूप से गिरावट देखने को मिली है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के मुताबिक अब देश में केवल 58 जिले ऐसे हैं जहां माओवादी प्रभावी रूप से बने हुए हैं.

2015 में देश के 75 जिले नक्सली हिंसा से प्रभावित थे. 2016 में इनकी संख्या 67 हो गई और 2017 में यह आंकड़ा गिरकर 58 पर आ गया है. इस दौरान माओवादियों की तरफ से होने वाले हमलों में से 90 प्रतिशत हमले केवल चार राज्यों में हुए. ये राज्य हैं बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा.

अधिकारियों का मानना है कि बड़े माओवादी नेताओं को निशाना बनाने की नई रणनीति इस सफलता की मुख्य वजह है. वे माओवादियों की सूचना देने वालों और खुफिया विभाग को भी इसका श्रेय देते हैं. अधिकारियों ने बताया कि सीआरपीएफ, आईएएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी और राज्य सुरक्षाबलों के कई और संयुक्त अभियान चलाए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि इसके अलावा प्रशासन भी विकास के कामों को तेज गति से कर रहा है. इनमें ज्यादा दूरी वाले गांवों में पुलिस स्टेशन बनाना, सड़क निर्माण और मोबाइल टावर लगाना जैसे काम शामिल हैं.

सीआरपीएफ के महानिदेशक राजीव राय भटनागर ने बताया कि हथियार, पैसे और वरिष्ठ नेताओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने की नक्सलियों की क्षमता में काफी गिरावट आई है. उन्होंने कहा कि नक्सली अब केवल तीन इलाकों में प्रभावी रह गए हैं. ये हैं बस्तर-सुकमा का 1200 किलोमीटर का इलाका, आंध्र प्रदेश-ओडिशा सीमा का 2000 किलोमीटर का क्षेत्र और 4500 किलोमीटर के दायरे में फैला अबूझमाड़ का जंगल. राजीव राय ने बताया कि इन इलाकों में अभी तक सुरक्षाबलों और प्रशासन की मौजूदगी नहीं है.