जनवरी की 17 तारीख को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री उज्जैन की तराना तहसील में किसानों की सभा को संबोधित कर रहे थे. उन्हें समझा रहे थे कि वे ‘जनता के कितने बड़े सेवक’ हैं. वे कह रहे थे, ‘मैंने मुख्यमंत्री को उसके दफ़्तर से, उसके बंगले से बाहर लाकर सड़क पर जनता के बीच खड़ा कर दिया है. यह मुख्यमंत्री आपका है. आपके बीच का है. कांग्रेस के समय में तो मुख्यमंत्री को काेई छू तक नहीं सकता था. उनके बगल में खड़ा होना तो दूर की बात थी. लेकिन मैं जनता से जुड़े रहने के लिए, उनके बीच रहने के लिए सब कुछ करता हूं.’ फिर चौहान आगे कहते हैं, ‘जब लोग मुझसे मिलने आते हैं तो कई बार मेरे सुरक्षाकर्मी सुरक्षा कारणों से उन्हें रोकने लगते हैं. लेकिन मुझे यह पसंद नहीं. मैं उन सुरक्षाकर्मियों को पकड़कर एक तरफ़ कर देता हूं. और कहता हूं - आने दो भइया, मिलने दो.’

मुख्यमंत्री का यह बयान एक ख़ास घटना की तरफ़ उनकी ओर से दिया गया स्पष्टीकरण भी था. दरअसल जिस दिन मुख्यमंत्री यह सफ़ाई दे रहे थे उसके दो दिन पहले ही साेशल मीडिया पर एक वीडियाे वायरल हुआ था. यह वीडियो धार शहर के सरदारपुर कस्बे का बताया जाता है. इसमें मुख्यमंत्री अपने एक सुरक्षा गार्ड की बांह पकड़कर उसे खींचकर दूसरी तरफ़ करते दिखाई दे रहे हैं. इस दौरान उन्होंने उसकी पीठ पर जोर की धौल भी जमा दी. बताया यह भी जाता है कि एक बच्चा मुख्यमंत्री के साथ तस्वीर खिंचाना चाहता था, लेकिन सुरक्षाकर्मी ने उसे दूसरी तरफ़ धकिया दिया. इससे मुख्यमंत्री नाराज़ हो गए थे.(वीडियो देखने के लिए इसका लिंक नीचे दिया गया है)

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वीडियो का सच चाहे जो हो, लेकिन उससे एक बात एकदम साफ़ हुई कि अमूमन शांत रहने और बेफ़िक्र दिखने वाले शिवराज इन दिनों दबाव में हैं. इसकी एक और मिसाल पिछले महीने मुगावली विधानसभा क्षेत्र के पिपरई गांव में हुए एक सम्मेलन के दौरान भी दिखी. प्रधानमंत्री आवास योजना और अन्य सरकारी योजनाओं के हितग्राहियों के इस सम्मेलन मुख्यमंत्री नई घोषणा करने से पहले वे घाेषणाएं गिना रहे थे जिन्हें अब तक पूरा कर दिया गया है.

घोषणाएं होते जाना और उनका पूरा न होना शिवराज सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है

असल में मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार का सबसे बड़ा सिरदर्द भी यही है कि मुख्यमंत्री लगातार घोषणाएं करते जाते हैं, मगर उनमें से अधिकांश पूरी नहीं होतीं. प्रदेश कांग्रेस का तो आरोप है कि शिवराज सिंह अब तक करीब 12 हजार घोषणाएं कर चुके हैं. इनमें से तमाम योजनाएं प्रशासनिक-तकनीकी या वित्तीय कारणों से अधूरी ही अटकी पड़ी हैं. इस सिलसिले में प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता नरेंद्र सलूजा ने अपने अधिकृत ट्विटर अकाउंट से इसी 15 जनवरी को एक दिलचस्प तस्वीर भी साझा की थी. यह तस्वीर धार शहर में लगे एक पोस्टर की थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठन हिंदू जागरण मंच की ओर से लगाए गए पोस्टर में मुख्यमंत्री के लिए साफ़ संदेश था, ‘मुख्यमंत्री धार आ रहे हैं, आपका स्वागत है. पर आपसे विनम्र निवेदन है कि कृपया कोई नया वादा न करें. पहले 14 वर्ष पूर्व किए गए वादे पूरा करें. 14 वर्ष का समय कम नहीं होता.’ आगे इसी पोस्टर में मुख्यमंत्री को उनका वादा याद दिलाया गया था जिसमें उन्होंने कहा था, ‘भोजशाला मां सरस्वती का मंदिर है. इसमें सिर्फ़ मां सरस्वती की ही पूजा होनी चाहिए.’ फ़िर शिवराज पर सवाल भी दागा गया, ‘मां सरस्वती क़ैद से कब आज़ाद होंगी.’

यहां याद दिलाते चलें कि भोजशाला एक विवादित स्थल है. और आरएसएस-भाजपा व उससे जुड़े हिंदू संगठनों पर यह आरोप लगते हैं कि वे अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए भोजशाला विवाद का भी इस्तेमाल करते रहते हैं. इस राजनीति का असर ये हुआ है कि अब भोजशाला को मध्य प्रदेश की अयोध्या तक कहा जाने लगा है.

लोगों का गुस्सा अब बाहर आने लगा है

बहरहाल शिवराज सरकार के ख़िलाफ़ इन दिनों सड़कों पर भी गुस्सा दिखने लगा है. धार में लगे पोस्टरों के दौरान ही ऐसा एक और मामला सुर्ख़ियों में आया था. उस वक़्त 13 जनवरी को चार महिला शिक्षकों ने अपने सिर मुंडवा लिए थे. चारों शिक्षक- शिल्पी सिवान, सीमा क्षीरसागर, अर्चना शर्मा और रेणुका सागर अध्यापक संवर्ग (यानी संविदा या कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर नियुक्ति पाने वाले) से ताल्लुक़ रखती हैं. आज़ाद अध्यापक संघ के बैनर तले भोपाल में प्रदर्शन करते हुए ये मांग कर रही थीं कि प्रदेश में अध्यापक संवर्ग के शिक्षकों को शिक्षा विभाग में शामिल कर नियमित किया जाए.

मध्य प्रदेश में ऐसे शिक्षकों की तादाद 2.88 लाख बताई जाती है. संगठन के अध्यक्ष शिवराज वर्मा के मुताबिक़ अभी अध्यापक संवर्ग के शिक्षकों के बारे में साफ़ नहीं है कि वे नगरीय निकायों के तहत हैं या शिक्षा विभाग के. बहरहाल महिला शिक्षकों के सिर मुंडवाने से मचे बवाल के बाद मुख्यमंत्री को घोषणा करना पड़ी कि अध्यापकों काे नियमित किया जाएगा और उन्हें शिक्षा विभाग में शामिल किया जाएगा. हालांकि यह अब तक घोषणा ही है. और घोषणाओं के मामले में शिवराज का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा नहीं है इसलिए कांग्रेस इस पर भी सवाल उठा रही है.

ऐसे ही अन्य वर्गों में भी किसी न किसी बहाने से गुस्सा छलक-छलककर बाहर अपने को तैयार दिखता है. मिसाल के तौर पर जिस गार्ड को शिवराज सिंह ने सरदारपुर में धौल जमाई (जिसका शुरू में जिक्र है) थी वह गुर्जर समाज का बताया जाता है. वह भी चंबल के उस इलाके से जहां की दो विधानसभा सीटों- मुंगावली और कोलारस में फरवरी में उपचुनाव हो रहे हैं. ख़बरें हैं कि वहां भाजपा को हराने के लिए गुर्जर समाज लामबंद हो रहा है. खबरों के मुताबिक भोपाल में अभी हाल में ही कई भाजपा नेताआें के बंगलों के बाहर पोस्टर चिपके देखे गए थे. इनमें लिखा था, ‘मुख्यमंत्री माफ़ी मांगें. गुर्जर समाज का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान.’ इस मसले पर मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ कहीं-कहीं प्रदर्शन भी हुए हैं.

स्थानीय निकाय के चुनावी नतीजे और नए राज्यपाल की सक्रियता ने भी शिवराज सिंह के माथे पर बल डाल दिए हैं

शिवराज की चिंता के कारण और भी हैं. मसलन अभी जनवरी में प्रदेश के 20 नगरीय निकायों (नगर पालिका और नगर परिषदों) में चुनाव हुए. इनमें से भाजपा ओर कांग्रेस को नौ-नौ सीटें (अध्यक्ष पद की) मिलीं. एक सीट निर्दलीय उम्मीदवार ने जीती जिसे कांग्रेस का समर्थन था. रीवा जिले की सेमरिया नगर परिषद के अध्यक्ष की सीट पर कानूनी दांव-पेंच के चलते नतीज़ा घाेषित नहीं हुआ. बताया जाता है कि 2003 के बाद से पहली बार कांग्रेस ने इस तरह का चुनावी प्रदर्शन किया है जिसकी शायद उसे भी उम्मीद कम ही रही होगी.

जिन निकायों में कांग्रेस जीती उनमें धार की सरदारपुर नगर परिषद भी शामिल है जहां मुख्यमंत्री ने अपने सुरक्षा गार्ड को धकियाया था और राघौगढ़ नगर परिषद (इस दोनों निकाय में पहले भाजपा काबिज़ थी) भी. गुना जिले का राघौगढ़ कस्बा कांग्रेस के दिग्गज दिग्विजय सिंह का गृह नगर है. यहां उनकी ग़ैरमौज़ूदगी में कांग्रेस को जिताने की जि़म्मेदारी उनके बेटे जयवर्धन सिंह संभाल रहे थे जो राजनीति में अभी नए-नए ही हैं.

लोगों में बढ़ते असंतोष और विपरीत चुनाव नतीज़ों के ऊपर तुर्रा ये कि प्रदेश नई राज्यपाल आनंदी बेन पटेल अपनी लगातार सक्रियता से शिवराज सिंह के माथे पर बल डाल रही हैं. वे लगातार लोगों से संवाद कर रही हैं और जिस तरह के जननेता होने का दंभ शिवराज भरते हैं काफ़ी कुछ उस तरह राज्यपाल भी जनता के बीच पहुंच रही हैं. उदाहरण के तौर पर उन्होंने पहले ही दिन अहमदाबाद से भोपाल आने के लिए चार्टर्ड बस की मदद ली. राजभवन के वाहनों से नहीं आईं. इस सफ़र में जगह-जगह रास्तेभर उनका स्वागत-सत्कार होता रहा.

राज्यपाल का पद संभालने के अगले ही दिन उन्होंने सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की बैठक बुला ली. उन्हें अगली बार अपने-अपने संस्थान का अकादेमिक कैलेंडर बनाकर लाने का निर्देश दिया. साथ में व्यवस्थित प्रजेंटेशन भी. इस बीच वे एक गोशाला भी गईं, गायत्री मंदिर घूमीं और आंगनबाड़ियाें का भी दौरा किया. राज्यपाल ने आंगनबाड़ियों में पोषण आहार आदि की व्यवस्थाओं का जायज़ा लिया है. यहां बताते चलें कि पोषण आहार में मध्य प्रदेश सरकार पर घोटाले, पक्षपात और अनियमितताओं सहित कई सवाल हैं.

यही नहीं क्रम जारी रखते हुए गणतंत्र दिवस के अगले दिन राज्यपाल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी से मिलने पहुंच गईं. बताया जाता है कि वहां उन्होंने जोशी के पुत्र और राज्य में स्कूल शिक्षा राज्य मंत्री दीपक जोशी से प्रदेश सरकार के काम करने के तौर-तरीकों का फ़ीडबैक लिया. यह भी जानना चाहा कि सरकार में कितनी महिला मंत्री हैं.

शिवराज सिंह की चिंताएं आगे और बढ़ सकती हैं

मध्य प्रदेश में मुंगावली और कोलारस विधानसभा सीटों पर 24 फरवरी को उपचुनाव होने हैं. यह इलाका़ सिंधिया परिवार के प्रभाव क्षेत्र वाला है. यानी यहां कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया से शिवराज का सीधा मुक़ाबला होना है. पर इस मुक़ाबले शिवराज के तरफ़ की ‘सिंधिया’ यानी यशोधरा राजे उनके साथ नहीं हैं. कम से कम अब तक यशोधरा ने ऐसा संकेत नहीं दिया है कि वे पार्टी और सरकार की ओर से इन उपचुनाव में जोर लगाएंगी.

कहा जा रहा है कि यशोधरा दो कारणों से नाराज़ हैं. पहला- पिछले साल अप्रैल में सिंधिया परिवार पर शिवराज की टिप्पणी से जुड़ा है. यह टिप्पणी भिंड जिले की अटेर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के दौरान की गई थी. राजनीति समझने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अटेर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार में शिवराज की टिप्पणी ने आख़िरी मौके पर अहम भूमिका निभाई थी. बहरहाल, यशोधरा की नाराज़गी का दूसरा कारण मुंगावली और कोलारस जैसे उन्हीं के इलाके में उनको ही तवज़्ज़ो न मिलना भी बताया जा रहा है. यहां तक कि प्रत्याशी चयन में भी उनसे राय नहीं ली गई है.

यानी कुल मिलाकर स्थिति ये है कि चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं शिवराज सिंह चौहान के लिए मुश्किलें भी बढ़ती दिखाई दे रही हैं. और इन्हीं मुश्किलों के हिसाब से दबाव भी. ऐसे में यह भी कहा जा सकता है कि इस समय वे अपने राजनीतिक करियर के सबसे मुश्किल दौर में हैं.