बीते हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न चाहते हुए भी एक बार फिर ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को आगे बढ़ा दिया. जुलाई, 2015 में ईरान ने यह समझौता जर्मनी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों - ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, रूस और अमेरिका के साथ किया था. इस समझौते के तहत ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को रोकने पर सहमत हुआ जिसके बदले इन देशों ने उस पर सालों से लगे प्रतिबंधों को हटा दिया था.

इस समझौते के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को हर 90 दिन में यह प्रमाणित करना होता है कि ईरान परमाणु समझौते का पालन कर रहा है. बीते हफ्ते डोनाल्ड ट्रंप ने तीसरी बार इसे प्रमाणित किया, लेकिन यह भी कहा कि वे ऐसा आखिरी बार कर रहे हैं. लाख चाहने के बाद भी डोनाल्ड ट्रंप के इस समझौते से खुद को अलग न कर पाने के पीछे जानकार दो मुख्य वजह बताते हैं.

समझौता तोड़ने के पक्ष में ट्रंप की दलीलें कमजोर दिखती हैं

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञों की मानें तो ट्रंप समझौता तोड़ने की जो वजहें बता रहे हैं उनका कोई मजबूत आधार नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति का दावा है कि ईरान उसे मिल रही परमाणु सामग्री का इस्तेमाल हथियार बनाने के लिए कर रहा है. लेकिन, इस दावे से उलट संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और यूरोपीय संघ दोनों का कहना है कि वे ईरान की गतिविधियों पर लगातार निगाह बनाए हुए है और वह परमाणु समझौते के अनुसार अपना वादा निभा रहा है.

ट्रंप इस समझौते को तोड़ने के पीछे की दूसरी वजह इसका बेहद उदार होना बताते हैं. उनके मुताबिक यह समझौता ईरान को तय सीमा से कहीं अधिक हैवी वॉटर (परमाणु रिएक्टरों के संचालन में इसका इस्तेमाल होता है) प्राप्त करने और अंतरराष्ट्रीय जांचकर्ताओं को जांच के मामले में सीमित अधिकार देता है. वे यह भी कहते हैं कि इस समझौते के बाद भी ईरान गैर परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल का निर्माण कर रहा है. साथ ही वह सीरिया, यमन और इराक में शिया लड़ाकों और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों को लगातार हथियार सप्लाई कर रहा है. अमेरिका का कहना है कि ईरान की इन हरकतों को रोकने के लिए इस समझौते को रद्द कर इसे और कठोर बनाया जाना चाहिए.

अमेरिका और इजरायल के कारण ईरान ने अपनी मिसाइलों को जमीन में 500 मीटर से ज्यादा की गहराई में रखा है | फोटो: एएफपी
अमेरिका और इजरायल के कारण ईरान ने अपनी मिसाइलों को जमीन में 500 मीटर से ज्यादा की गहराई में रखा है | फोटो: एएफपी

अमेरिका की इन दलीलों पर समझौते का हिस्सा रहे अन्य देशों का कहना है कि परमाणु समझौता काफी सोच समझकर किया गया था और अब बीच में इसमें कोई तब्दीली नहीं की जा सकती. इनका यह भी कहना है कि ईरान द्वारा बैलिस्टिक मिसाइल बनाने और अन्य देशों को हथियार बेचने की बात कहकर परमाणु समझौता नहीं तोड़ा जा सकता क्योंकि समझौते की शर्तों में ये बातें शामिल ही नहीं थी.

ईरान में पश्चिमी देशों का भारी निवेश भी परमाणु समझौते के पक्ष में जाता है

14 जुलाई 2015 को परमाणु समझौते पर अंतिम हस्ताक्षर होने के बाद जनवरी, 2016 में ईरान से प्रतिबंध हटाने की घोषणा कर दी गयी थी. इसके तुरंत बाद ही ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने व्यवसायिक समझौते करने शुरू कर दिए थे. इस दौरान उन्होंने यूरोपीय देशों से अरबों डॉलर के व्यापारिक समझौते किये. ईरान ने अपने सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार इटली के साथ ऊर्जा, स्टील, भवन निर्माण और यात्री विमानों की खरीद और तेल गैस के निर्यात सहित 20 बिलियन डॉलर यानी एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के समझौते किये थे.

ईरान ने फ्रांस की तेल कम्पनी ‘टोटल’ के साथ 4.8 बिलियन डॉलर यानी 30 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की डील साइन की है जिसके तहत यह कंपनी फारस की खाड़ी में ईरानी क्षेत्र से गैस और तेल निकालेगी. इस दौरान ईरान ने फ्रांस की कार निर्माता कंपनी रेनॉल्ट के साथ अब तक की सबसे बड़ी 778 मिलियन डॉलर ( करीब पांच हजार करोड़ रुपए) की डील पर भी हस्तक्षर किये. साथ ही साल 2017 के अंत तक ईरान ने भवन निर्माण और उड्डयन के क्षेत्र में काम करने वाली फ़्रांस की कंपनियों से भी अरबों डॉलर के समझौते कर लिए हैं.

परमाणु समझौता होने के बाद जर्मनी की कंपनियों ने भी ईरान में बड़ा निवेश किया है. हाल ही में जारी हुई जर्मनी के ‘फेडरेशन ऑफ जर्मन इंडस्ट्रीज’ की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान को जर्मनी का सालाना निर्यात 2017 में बढ़कर 3.5 अरब डॉलर (20 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा) हो गया है.

ऐसा ही कुछ हाल चीन का भी है. एक रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त, 2017 में ईरान और चीन के बीच कुल सालाना आयात और निर्यात दोनों बढ़कर करीब 18 अरब डॉलर (करीब एक लाख करोड़ रुपए) तक पहुंच गया है. रूस के साथ भी ईरान के कारोबार में बड़ी तेजी आई है.

जाहिर है कि अमेरिका के परमाणु समझौते से हटने और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाने से अरबों डॉलर का यह निवेश डूबने की आशंका बन जाएगी. साथ ही इसका सीधा प्रभाव इन सभी देशों की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर पड़ेगा. ऐसे में ये सभी देश कतई नहीं चाहते कि यह परमाणु डील खतरे में पड़े.

अमेरिका के अकेला पड़ने और रूस के मुख्य भूमिका में आने का डर

सीरिया में रूस के आने से मुंह की खा चुके अमेरिका को यह डर भी है कि उसके इस परमाणु समझौते से हटने के बाद रूस कूटनीतिक रूप से और ताकतवर हो सकता है. अमेरिका पहले ही ईरान और रूस की बढ़ती नजदीकियों की वजह से खासा चिंतित है. साथ ही उसे जिस तरह की चेतावनियां अपने यूरोपीय साथियों से मिल रही हैं, उससे उनके रूस के करीब जाने की भी आशंका पैदा हो जाती है. पिछले दिनों आए कुछ बयानों पर गौर करें तो इस मामले में अमेरिका की चिंता की वाजिब वजहें दिखती हैं.

बीते दिनों जर्मनी की ओर से अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा गया था कि ईरान के साथ हुए समझौते को रद्द करने से यूरोप और अमेरिका के बीच खाई और बढ़ेगी. जर्मनी के विदेश मंत्री जिगमार गाब्रिएल का कहना था, ‘यह जरूरी है कि यूरोप इस मुद्दे पर एकजुट रहे. हमें अमेरिका को यह बताने की जरूरत है कि ईरान के मुद्दे पर उसका व्यवहार हम यूरोपीय लोगों को रूस और चीन के अमेरिका विरोधी रुख के करीब ले जायेगा.’

इसके बाद रूस की तरफ से भी बयान आया, जिसमें रूस के विदेश मंत्री सरगेई लावरोव का कहना था कि अमेरिका के परमाणु समझौते से बाहर होने के बाद भी रूस इसे टूटने नहीं देगा और आगे आकर इसे बचाएगा.

जर्मनी के विदेश मंत्री जिगमार गाब्रिएल
जर्मनी के विदेश मंत्री जिगमार गाब्रिएल

अमेरिकी मीडिया की मानें तो इस मामले में अपनी कमजोर दलीलों और यूरोपीय देशों के ईरान में बड़े निवेश की वजह से ही डोनाल्ड ट्रंप हर बार इस डील को लेकर अपने मन मुताबिक फैसला लेने से पीछे हट जाते हैं. माना जा रहा है कि अमेरिकी प्रशासन इस बात पर एक राय हो चुका है कि अब जैसी परिस्थितयां बन गई हैं उनमें यह फैसला लेने के बाद कोई भी अमेरिका का साथ नहीं देगा और वह अकेला पड़ जाएगा.

यूरोपीय देश सवाल उठा रहे हैं कि अमेरिका की आंतरिक राजनीति का खामियाजा वे क्यों भुगतें

यूरोपीय देशों का यह भी कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की आंतरिक राजनीति की वजह से ईरान के साथ हुआ परमाणु समझौता तोड़ना चाहते हैं. इनके मुताबिक अमेरिका 2015 में सीरिया में मिली हार को अभी तक नहीं पचा पाया है. सीरिया में सत्ताधारी बशर अल-असद की जीत को अमेरिका और इजरायल की बड़ी हार की तरह भी देखा जाता है. सीरिया से पहले अमेरिका ने जिस देश में भी दखल दिया, वहां तख्तापलट कर दिया. लीबिया, ट्यूनिशिया, युगोस्लाविया, इराक और अफगानिस्तान इसके उदाहरण हैं. लेकिन, सीरिया में लाख कोशिशों के बाद भी वह असद को हटाने में सफल नहीं हो सका.

अमेरिका की मुराद पूरी न हो पाने की वजह रूस, ईरान और हिजबुल्लाह के गठजोड़ को माना जाता है जिसने असद सरकार की मदद कर अमेरिका के अरमानों पर पानी फेर दिया था. यूरोपीय देशों के कुछ जानकारों का मानना है कि अमेरिका सीरिया में हुई अपनी इस हार के चलते ईरान को सबक सिखाना चाहता है.

वैसे ईरान के साथ परमाणु समझौता तोड़ने की जड़ें अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति चुनाव से भी जुड़ती है. तब रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप हर मौके का जमकर फायदा उठा रहे थे. सीरिया में अमेरिका को मिली कूटनीतिक हार को लेकर उन्होंने ओबामा प्रशासन पर कई बार हमला बोला था. ट्रंप ने ही चुनावों के दौरान इसे एक बड़ा मुद्दा बना दिया था. उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि ईरान को उसकी हरकत के लिए सजा देंगे और परमाणु समझौता रद्द कर उस पर और कड़े प्रतिबंध लगायेंगे.

जर्मनी के विदेश मंत्री जिगमार गैब्रिएल स्थानीय अखबार को दिए एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘डोनाल्ड ट्रंप अपनी घरेलू राजनीति के लिए ईरान समझौते की बलि देना चाहते हैं. लेकिन दुनिया की अन्य पांच शक्तियां भी इस समझौते में शामिल हैं, इसलिए हम इसे अमेरिका की घरेलू राजनीति का मोहरा नहीं बनने देंगे.’

हालांकि डोनाल्ड ट्रंप अब तक के अपने कार्यकाल में कई चौंकाने वाले फैसले कर चुके हैं सो इस बात को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता कि तीन महीने बाद वे ईरान परमाणु समझौते पर भी कोई चौंकाने वाला फैसला ले लें. हां, लेकिन यह जरूर है कि इस मुद्दे पर जिस तरह की परिस्थितियां बन चुकी हैं, उनमें यह ट्रंप के कार्यकाल का सबसे अप्रत्याशित फैसला भी बन सकता है.