ब्रिटेन से लेकर बांग्लादेश तक बोली जाने वाली दर्जनों भाषाओं के मूल का सवाल लंबे समय से इतिहासकारों, भाषा विशेषज्ञों और मानवविज्ञानियों के बीच बहस का विषय रहा है. दरअसल धरती की करीब आधी आबादी की भाषाएं भारोपीय भाषा परिवार कहे जाने वाले वाले विशाल बरगद की टहनियां हैं. देखा जाए तो यह एक चकित करने वाली बात है कि दुनिया के तीन अरब लोग ऐसी भाषाएं बोलते हैं जिनका उद्गम एक ही भाषा से हुआ है. इसलिए भी कि यह भाषा कभी खानाबदोशों के एक ऐसे समुदाय द्वारा बोली जाती थी जिनकी संख्या वैज्ञानिकों के मुताबिक कुछ हजार से ज्यादा नहीं रही होगी.

सवाल उठता है कि यह भाषा पूरे संसार में कैसे फैली. कैसे इसने संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, फ्रेंच, फारसी और भोजपुरी जैसी असाधारण विविधता को जन्म दिया?

तो फिर यह भाषा पूरे संसार में कैसे फैली? कैसे इसने संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, फ्रेंच, फारसी और भोजपुरी जैसी असाधारण विविधता को जन्म दिया? इस तरह के सवाल भाषा और मानव विज्ञानियों को लंबे समय से मथते रहे हैं.

इस आदि भाषा को प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा कहा जाता है. कहते हैं कि इसमें बात करने वाली खानाबदोश जातियां करीब छह से आठ हजार साल पहले दुनिया में फैलनी शुरु हुईं. मानवविज्ञानियों का मानना है कि इतिहास के उस दौर में इस भाषा को बोलने वाले लोग घुड़सवारी में कुशल हो रहे थे. उन्होंने रथ बनाना भी सीख लिया था. घोड़ों और पहियों का कुशल संयोग करके कांस्य युग के ये लोग यूरोप की ढलानों से आने वाली दुनिया को आकार देने की यात्राओं पर निकल पड़े.

जीन में आए बदलाव की भी अहम भूमिका

घुड़सवारी के कौशल और रथों के निर्माण ने इन लोगों को सैन्य क्षमता के लिहाज से उस समय के बाकी समाजों से बेहतर कर दिया था. लेकिन एक और बात थी जिसने यूरोप और एशिया में इन खानाबदोशों के अपार विस्तार में मदद की. वैज्ञानिकों का मानना है कि छह हजार साल पहले इन लोगों के जीन में एक विशेष बदलाव भी आया. इस बदलाव के चलते उनमें जानवरों से मिलने वाला दूध पचाने की क्षमता विकसित हो गई. पहले ऐसा नहीं था.

अलग-अलग भाषाओं के विस्तार को दिखाता एक नक्शा
अलग-अलग भाषाओं के विस्तार को दिखाता एक नक्शा

यानी अब इन खानाबदोशों के लिए किसी भी दूसरे इलाके में जाने पर दूध के रूप में बढ़िया पोषण का एक विकल्प हमेशा मौजूद था. यही वजह है कि उनके जीवन में अब घोड़ों और दूध देने वाले जानवरों का महत्व बहुत बढ़ गया. जानकारों के अनुसार इन बदलावों की छाप शुरुआती वैदिक सभ्यता और संस्कृति में भी देखी जा सकती है जिसमें अश्व और गाय का बहुत महत्व है.

प्रोटो इंडो यूरोपियन या आर्य मूल रूप से कहां से आए, इस पर दो प्रतिस्पर्धी मत हैं. परंपरागत विचार यह है कि उनकी मूल भूमि काले सागर और कैस्पियन सागर के बीच का इलाका है जो आज रूस, यूक्रेन और कजाकिस्तान में पड़ता है. दूसरा और कुछ नया मत कहता है कि प्रोटो इंडो यूरोपियन एनातोलिया नाम के इलाके से दूसरे हिस्सों में फैले. यह इलाका आज तुर्की में पड़ता है. इस मत को कुछ समय पहले न्यूजीलैंड में यूनिवर्सिटी ऑफ ऑकलैंड के रसेल ग्रे और क्वेंटिन एटकिंसन के शोध से भी बल मिला. प्रतिष्ठित पत्रिका साइंस में छपे इस शोध के नतीजे दर्शाता एक दिलचस्प वीडियो इंटरनेट पर भी उपलब्ध है.

ग्रे और एटकिंसन ने अपने शोध में 103 प्राचीन और आधुनिक भाषाओं का अध्ययन किया था. इसमें उन्होंने उसी तकनीक का सहारा लिया जो जैव विकास या बीमारियों के अध्ययन में अमूमन इस्तेमाल होती है. दरअसल इन दोनों जीव विज्ञानियों का मानना है कि भाषा का विकास काफी कुछ जैविक विकास की तरह ही होता है. इंसान के जीन्स की तरह उसकी जबान में आए फर्क की महीन पड़ताल बता सकती है कि वक्त की लंबी सड़क पर वह कब किस मोड़ से गुजरा होगा.

ग्रे और एटकिंसन के मुताबिक शब्दों के उच्चारण और अर्थ का अध्ययन करके जाना जा सकता है कि कोई भाषा समय के किस पड़ाव पर जाकर दो अलग-अलग धाराओं में बंट गई. इस अध्ययन के तहत अलग-अलग भाषाओं में पाए जाने वाले समान शब्दों का अध्ययन किया गया. मदर, स्काई आदि जैसे इन शब्दों की गहन पड़ताल के बाद विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुंचे कि यूरोप और एशिया में बोली जाने वाली तमाम भाषाओं की जड़ करीब आठ हजार साल पहले एनातोलिया में बोली जाने वाली भाषा थी.