उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक जीत के बाद जब योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी तो उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार गरीबों की सरकार होगी. उसकी प्राथमिकता होगी गरीब, गांव और किसान. मुख्यमंत्री योगी ने पांच कालीदास मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास में प्रवेश करने से पहले ही सादगी पूर्ण जीवन की बात कहकर वहां शयनकक्षों में अखिलेश यादव के समय से लगाए गए तमाम एयर कंडीशनर हटवा दिए थे. उन्होंने वहां लगे चमक-दमक वाले पर्दे और मंहगे पलंग आदि हटवाकर भी यह संदेश दिया था कि उत्तर प्रदेश की नई सरकार के मुखिया सादगीपूर्ण जीवनशैली वाले हैं और पूर्ववर्ती सरकारों की फिजूलखर्ची वाला अंदाज अब कल की बात हो जाएगा. लेकिन पूर्व मुख्यमंत्रियों को राजसी ठाठ के लिए आजीवन दिए जाने वाले भव्य बंगलों के मामले में योगी सरकार के नजरिए से लगता है कि हालात अब भी कोई खास बदले नहीं हैं.

मामला उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को बड़े-बड़े बंगले बांटे जाने का है. यहां फिलहाल छह पूर्व मुख्यमंत्रियों के पास हजरतगंज के पॉश इलाके में कई-कई एकड़ में बने बड़े-बड़े सरकारी बंगले हैं. इन बंगलों पर इनको जीवन भर रहने का अधिकार दिया गया है. इसी अधिकार को गैरकानूनी मानते हुए ‘लोक प्रहरी’ नामक एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में अगस्त 2017 में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की थी. याचिका में मांग की गई थी कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी खर्च पर इस तरह के बंगले देना गैरकानूनी है. इस पर हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले में उसका पक्ष जानना चाहा था. लेकिन सादगी की बात करने वाले और फिजूल खर्ची के घोर विरोधी कहे जाने वाले योगी आदित्यनाथ की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो जवाब दायर किया है वह चौंकाने वाला है. इसमें अखिलेश सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी आवास देने के प्रावधान को सही ठहराया है.

‘सादगी-पसंद’ और ‘गरीबों की सरकार’ ने अपने लिखित जवाब में कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री एक ‘विशिष्ट वर्ग’ के व्यक्ति होते हैं क्योंकि पद छोड़ने के बाद वे पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में जाने जाते हैं और उनके कुछ प्रोटोकॉल भी होते हैं. इसीलिए उन्हें सुविधाएं दी जाती हैं. सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी पद छोड़ने के बाद कई सुविधाएं मिलती हैं, इसलिए पूर्व मुख्यमंत्रियों को उम्र भर के लिए सरकारी आवास देने को गलत नहीं कहा जा सकता.

उत्तर प्रदेश सरकार ने 1996 के सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा है कि उस आदेश में कहा गया था कि विधायिका द्वारा बनाए गये किसी कानून को सिर्फ इसी आधार पर निरस्त नहीं किया जा सकता कि अदालत को यह अनुचित लगता है. सांसद और विधायक जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं और यह समझा जाता है कि वे यह बेहतर समझते हैं कि जनता के लिए सही क्या है और गलत क्या. ऐसे में अदालत को उनके विवेक में बदलाव नहीं करना चाहिए. प्रदेश सरकार ने कहा है कि इस मामले में मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है. इसकी अगली सुनवाई अब 13 मार्च को होनी है.

उत्तर प्रदेश में एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद जिंदगी भर के लिए सरकारी बंगलों पर अधिकार जमाने की आदत बहुत नई नहीं है. कमलापति त्रिपाठी, विश्वनाथ प्रताप सिंह और हेमवतीनंदन बहुगुणा को मुख्यमंत्री के तौर पर मिले बंगलों पर बरसों तक उनके परिजनों का कब्जा रहा. 1997 में हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद वीपी सिंह, कमलापति त्रिपाठी, हेमवतीनंदन बहुगुणा और श्रीपति मिश्रा के आवास तो खाली हो गए मगर मायावती की गठबंधन सरकार ने ‘एक्स चीफ मिनिस्टर्स रेजिडेंस अलाटमेंट रूल्स 1997’ बना कर एक बार फिर बंगलों पर कब्जा जमाये रखने का इंतजाम कर दिया. इसी के बाद मायावती के लिए माल एवेन्यू में एक भव्य बंगले का इंतजाम किया गया जो उनके अलग-अलग कार्यकालों में फैलते-फैलते कई सरकारी दफ्तरों को लीलता गया और अब भी एक बड़ी निजी संपत्ति की तरह मौजूद है.

1997 के नियमों के बाद वीर बहादुर सिंह, रामनरेश यादव और नारायण दत्त तिवारी के बंगले छिनने का खतरा भी खत्म हो गया और बाद में बड़े-बड़े ऐसे बंगलों में रहने की मुफ्त सुविधा पाने वाले पूर्व मुख्यमंत्रियों की इस सूची में कल्याण सिंह, मायावती, मुलायम सिंह, राजनाथ सिंह और अखिलेश यादव का नाम भी जुड़ गया.

बसपा और सपा में तो इसी बात की होड़ ही रही कि कौन अपना बंगला ज्यादा बड़ा और भव्य बनवा सकता है. मायावती के हर कार्यकाल के बाद उनका बंगला नए सिरे से संवरा होता तो मुलायम सिंह यादव ने पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में विक्रमादित्य मार्ग के दो बंगलों को एक करवा लिया. उनके पुत्र अखिलेश इस मामले में उनसे भी आगे रहे. अपने कार्यकाल में ज्यादातर समय तक वे पांच कालीदास मार्ग पर अपने पिता के साथ रहते रहे. मगर कार्यकाल पूरा होने के पहले उन्होंने मुख्यमंत्री के आवास के तौर पर अपने लिए एक बहुत बड़ा बंगला ढूंढ़ लिया. राज्य के कृषि उत्पादन आयुक्त के बंगले को मुख्यमंत्री के नए आवास के तौर पर नए सिरे से निर्मित किया गया. चार विक्रमादित्य मार्ग का यह बंगला एक दरवाजे के जरिए मुलायम सिंह के आवास में भी खुलता है. पहले से ही बहुत बड़े इस बंगले को दुगना बड़ा करने के लिए इसके पीछे बने पीडब्ल्यूडी के कर्मचारियों के घरों को भी तोड़कर इसमें मिला लिया गया और इस तरह इस बंगले का एक सिरा विक्रमादित्य मार्ग पर खुलता है तो दूसरा कालीदास मार्ग पर.

अखिलेश यादव के इस बंगले की सजावट पर 20 करोड़ के खर्च की भी चर्चाएं होती रहीं मगर यह काम बेहद गोपनीयता से हुआ. पांचसितारा बाथरूम, इटेलियन मार्बल, बेल्जियन ग्लास और एयरकंडीशंड बेडमिंटन हाल जैसी चीजों के लिए चर्चा में आए इस बंगले के आगे मायावती की भी सारी भव्यता फीकी पड़ गयी.

लेकिन अखिलेश के लिए इस बंगले में रहने की राह बहुत आसान नहीं रही. सात अक्टूबर 2016 को नवरात्रों में अखिलेश ने मुलायम वाला घर छोड़कर इस नए घर में प्रवेश किया. मगर इसी बीच मुख्यमंत्री के रूप में उनके दो-दो बंगलों पर रहने को लेकर पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर हो गईं. चुनाव के बाद अप्रैल 2017 में इस मामले में हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को कहकर खारिज कर दिया कि अब अखिलेश मुख्यमंत्री नहीं रहे हैं इसलिए इस याचिका का कोई महत्व नहीं रह गया है.

इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगलों के मामले में ही दायर एक अन्य याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने भी उन्हें खासा परेशान किया था. लोक प्रहरी ने 2004 में ही एक याचिका दायर कर पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए 1997 में बनाए गए नियमों की चुनौती दी थी. बीस बार लिस्टिंग के बाद 27 नवंबर 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपना फैसला सुरक्षित कर लिया. करीब 20 महीने बाद एक अगस्त 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने 1997 के मुख्यमंत्री आवास आवंटन नियमों को गलत बताते हुए पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी बंगले देने के प्रावधान को रद्द कर दिया. अदालत ने सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को दो महीने में बंगले खाली करने और उनसे किराया वसूली का भी आदेश दिया.

इस आदेश के बाद नारायण दत्त तिवारी, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, मायावती, मुलायम सिंह को बंगले खाली करने थे. समाजवादियों के लिए यह दोहरी आफत थी. क्योंकि इस आदेश से मुलायम का बंगला खाली होता और अखिलेश द्वारा अपने लिए सरकारी खर्चे पर बन रहे सपनों के महल का सपना भी ढह जाना था. इसलिए समाजवादी सरकार ने नया पैंतरा आजमाया और नए प्रावधानों के साथ 30 अगस्त 2016 को उत्तर प्रदेश मंत्री (वेतन, भत्ता और प्रकीर्ण उपबंध) (संशोधन) विधेयक पारित करवा के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ही अंगूठा दिखा दिया. इसके बाद मुलायम का बंगला भी बच गया और अखिलेश के लिए भी बड़े बंगले का हक पक्का हो गया.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के इसी आदेश के बाद उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्रियों के आजीवन बंगलों की सुविधा हाईकोर्ट के एक आदेश के जरिए समाप्त हो गई. उत्तराखंड में पांच वर्ष तक पूर्णकालिक मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी ने फारेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में एक शानदार बंगला ’अनंत’अपने नाम करवाया था, तो कुछ महीनों के लिए मुख्यमंत्री बने भगत सिंह कोश्यारी के नाम भी यहां पर एक बड़ा बंगला था. इसी तरह रमेश पोखरियाल निशंक, बीसी खंडूरी और विजय बहुगुणा के पास भी उनके मंत्री सांसद या विधायक वाले बंगलों के साथ साथ पूर्व मुख्यमंत्रियों के रूप में भी देहरादून में एक एक बड़ा बंगला था. नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश के बाद उत्तराखंड में वहां के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने पड़े.

इसके उलट उत्तर प्रदेश सरकार किसी भी हाल में पूर्व मुख्यमंत्रियों के राजसी ठाठ छोड़ने को तैयार नहीं है. जबकि चुनावी एफिडेविटों के अनुसार मायावती के पास करोड़ों की संपत्ति के साथ दिल्ली और लखनऊ में अपने घर हैं. मुलायम सिंह के पास भी करोड़ों की सम्पत्ति के साथ इटावा, सैफई और लखनऊ में एक-एक घर है. राजनाथ सिंह के पास भी लखनऊ में अपना घर है.

अखिलेश सरकार द्वारा बंगलों को बचाए रखने के बनाए गए नए नियमों को एक बार फिर लोक प्रहरी ने ही एसएलपी के जरिए चुनौती दी. अगस्त 2017 में दायर इस याचिका की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ कानूनविद गोपाल सुब्रमण्यम को न्याय-मित्र नियुक्त किया था. इस मामले में आठ जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में उनका कहना था कि पूर्व मुंख्यमंत्रियों को घर देने का कानून खत्म होना चाहिए क्योंकि इससे संविधान की धारा 14 का उल्लंघन होता है. यहां तक कि उन्होंने पूर्व राष्ट्रपतियों और पूर्व प्रधानमंत्रियों के बंगलों के मामले में भी ऐसा ही करने की मांग की. इसी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों से इस बारे में जवाब मांगा था. मगर अब इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने जो जवाब दिया है वह हैरान करने वाला है.

नैतिक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यपाल के सलाहकार रहे सीबी पांडेय कहते हैं, ‘यह उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्य की जनता के साथ अन्याय है. सरकार सुरक्षा के नाम पर इतनी बड़ी फिजूल खर्ची का समर्थन कैसे कर सकती है. इन चार-पांच बंगलों के सालाना रखरखाव पर ही हर साल लाखों का खर्च होता है. इनमें मिल रही सारी सुविधाएं मुफ्त हैं. बिजली का बिल तक ये लोग देते नहीं. जेड और जेड प्लस सुरक्षा के बहाने बगलों को बचाने का प्रयास अनुचित है.’

लोक प्रहरी के लिए इस मामले की पैरवी कर रहे ‘पूर्व आईएएस अधिकारी और लोकप्रहरी के महासचिव एसएन शुक्ला का राज्य सरकार के जवाब के बाद भी कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगलों का मामला जनता के साथ होने वाली लूट का मामला है. इसमें कोई पब्लिक इंटरेस्ट सर्व नहीं होता. क्योंकि पब्लिक के पैसे से ऐसे लोगों को विशेष सुविधा दी जा रही है जो अब पब्लिक सर्वेंट नहीं हैं.’

इस तरह के बड़े-बड़े बगलों के कारण आम लोगों को भी तरह तरह की असुविधाएं होती हैं. इन सारे बंगलों के आसपास का इलाका एक तरह का विशिष्ट क्षेत्र बन जाने के कारण आम नागरिकों के लिए वहां से आना-जाना भी मुश्किल हो जाता है. इसके साथ-साथ मंत्रियों और विधायकों के लिए आवास की समस्या भी बढ़ती जा रही है. नाम न जाहिर करने की शर्त पर बीजेपी के एक बड़े नेता कहते हैं, ‘हमारे प्रधानमंत्री खुद को लोकसेवक कहते हैं और मुझे नहीं लगता कि लोकसेवकों के लिए बड़े-बड़े भव्य बंगलों की कोई जरूरत होती है, वह भी तब जब वे मुख्यमंत्री पद छोड़ चुके होते हैं.’

परंतु इसके ठीक उलट बीजेपी की सरकार का नजरिया बताता है कि उसकी परिभाषा प्रधानमंत्री की परिभाषा से अलग है. इसलिए इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर आने वाले दिनों में योगी आदित्यनाथ के लिए भी किसी पॉश वीआईपी इलाके में कोई बड़ा सा भव्य पूर्व मुख्यमंत्री आवास तैयार किया जाने लगे.