केंद्र सरकार ने अगले वित्त वर्ष में विभिन्न सरकारी इकाइयों में अपनी हिस्सेदारी के विनिवेश से 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है. केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने बीते महीने 2018-19 का आम बजट पेश करते हुए यह जानकारी दी थी. उन्होंने यह भी कहा था कि सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के 24 केंद्रीय उद्यमों में रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया शुरू की है जिसमें एयर इंडिया भी शामिल है.

2016-17 में केंद्र सरकार ने 56,500 करोड़ रुपये के विनिवेश का लक्ष्य रखा था. लेकिन इसके मुकाबले सरकार 46,500 करोड़ रुपये का ही विनिवेश कर पाई. इसी तरह सरकार ने 2015-16 के लिए 69,500 करोड़ रुपये का विनिवेश लक्ष्य रखा. लेकिन विनिवेश हो पाया 23,997 करोड़ रुपये का. ऐसे ही 2014-15 में 63,425 करोड़ रुपये विनिवेश का लक्ष्य रखा गया था लेकिन मामला सिर्फ 31,350 करोड़ रुपये पर अटक गया. इसकी वजह बताते हुए आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि बैंकों की खराब हालत होने से कर्ज मिलने में हो रही दिक्कतों और आर्थिक सुस्ती की वजह से निजी क्षेत्र के लिए पैसा जुटाना मुश्किल हो गया है. ऐसे में विनिवेश को लेकर निजी निवेशक उत्साह नहीं दिखा रहा है.

सरकार की उम्मीद और इसका कारण

11 जनवरी, 2018 तक सरकार ने इस वित्त वर्ष में 72,500 करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य के मुकाबले 54,337 करोड़ रुपये का विनिवेश किया था. जाहिर है कि 11 जनवरी के बाद चालू वित्त वर्ष में तकरीबन 50 दिन बचे थे और लग रहा था कि सरकार पिछले दो साल की तरह इस साल भी अपने विनिवेश लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाएगी. लेकिन बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उम्मीद जताई कि वह लक्ष्य से ऊंची छलांग मारते हुए एक लाख करोड़ रु के आंकड़े तक पहुंच जाएगी.

वित्त मंत्री की इस उम्मीद की एक खास वजह है. दरअसल, पिछले तीन वित्तीय वर्ष से विनिवेश लक्ष्य नहीं हासिल होने से परेशान सरकार ने इस साल इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक नायाब रास्ता निकाला है. इसके तहत उसने अपनी ही कंपनी की हिस्सेदारी अपनी ही किसी दूसरी कंपनी के हाथों बेचने की योजना बनाई है.

इसी योजना के तहत केंद्र सरकार हिंदुस्तान पेट्रोलियम काॅरपोरेशन लिमिटेड यानी एचपीसीएल में अपनी कुल 51 फीसदी हिस्सेदारी अपनी ही दूसरी कंपनी आॅयल ऐंड नेचुरल गैस काॅरपोरेशन यानी ओएनजीसी को बेच रही है. इस सौदे के बदले सरकार को ओएनजीसी 36,915 करोड़ रुपये देगी. इस पैसे के मिलते ही केंद्र सरकार न सिर्फ अपने 72,500 करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य को हासिल कर लेगी बल्कि इस साल विनिवेश का आंकड़ा इसके पार 91,252 करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा. इसका मतलब यह हुआ कि इस सरकार के कार्यकाल में पहली बार ऐसा होगा कि केंद्र सरकार अपने घोषित विनिवेश लक्ष्य को हासिल करेगी.

सौदे पर सवाल

लेकिन इस पूरे मामले में असल सवाल इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपनाए गए तरीके पर उठाया जा रहा है. ओएनजीसी सरकार की सबसे अधिक कमाई करने वाली कंपनी है. इसके पास काफी अतिरिक्त पैसा भी है. इसके बावजूद एचपीसीएल सौदे के लिए कंपनी तकरीबन 20,000 करोड़ रुपये अलग-अलग बैंकों से जुटाने की कोशिश कर रही है.

सरकार की पहल पर होने वाले इस तरह के सौदों में ओएनजीसी को शामिल करने को लेकर पहले भी सवाल उठे हैं. कुछ समय पहले घाटे में चल रही गुजरात स्टेट पेट्रोलियम काॅरपोरेशन को भी ओएनजीसी ने 7,700 करोड़ रुपये में खरीदा था. इस कंपनी ने बड़ी परियोजनाओं में तब हाथ डालना शुरू किया जब मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री होते थे. लेकिन यह कंपनी लगातार घाटे में रही. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस कंपनी को केंद्र सरकार की एक कंपनी के हाथों बेचे जाने को लेकर बाहर भी बहुत सवाल उठे और ओएनजीसी के अंदर भी. इसके बावजूद यह सौदा हुआ.

इसी तरह से एचपीसीएल के सौदे को लेकर भी ओनएजीसी के अंदर कई तरह की बातें चल रही हैं. कहा जा रहा है कि एक ऐसे दौर में जब अफ्रीकी देशों समेत दुनिया के और कई तेल और गैस उत्पादक देशों में चीन अपना निवेश बढ़ा रहा है तो उस वक्त ओएनजीसी जैसी कंपनी के संसाधनों का इस्तेमाल उन देशों में निवेश करने के बजाय भारत सरकार की ही दूसरी कंपनी एचपीसीएल में कराने का कोई औचित्य नहीं है. उल्लेखनीय है कि ओनएजीसी की सहयोगी कंपनी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड भारत के बाहर 18 देशों में 39 जगहों पर तेल और गैस उत्पादन का काम कर रही है.

एचपीसीएल मूलतः तेल और गैस के वितरण के काम में है. ऐसे में कहा यह जा रहा है कि वितरण के काम में ओएनजीसी का पैसा लगाकर सरकार उत्पादन के मोर्चे पर जोखिम ले रही है. इससे तेल और गैस के आयात पर होने वाला खर्च बढ़ेगा और अंततः इसका वित्तीय दुष्प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.