2013 में नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी की ओर से लोकसभा चुनावों के लिए चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने से नाराज होकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़ दिया था. उस वक्त उन्होंने इस्तीफा देकर अपना मंत्रिमंडल भंग नहीं किया था बल्कि भाजपा के सभी मंत्रियों को अपनी सरकार से बर्खास्त किया था. इसके बाद नीतीश कुमार उन्हीं लालू प्रसाद यादव के साथ आते चले गए जिनके विरोध पर उन्होंने अपनी पूरी राजनीति खड़ी की थी. फिर नीतीश और लालू की जोड़ी ने 2015 में जबर्दस्त जीत हासिल की, लेकिन दो साल के अंदर ही फिर नीतीश ने लालू का साथ छोड़ दिया और रातोंरात भाजपा के साथ मिलकर 27 जुलाई, 2017 को एक बार फिर से मुख्यमंत्री बन गए.

भाजपा के साथ दूसरी पारी खेलते हुए शनिवार को नीतीश कुमार सरकार के छह महीने पूरे हो चुके हैं. इस दौरान कई मौके आए जब लगा कि ये नीतीश कुमार उन नीतीश कुमार से काफी अलग हैं जो अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी की अगुवाई वाली भाजपा के साथ हुआ करते थे. कई बार यह दिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा के साथ नीतीश कुमार उतने मुखर नहीं हैं जितने अटल-आडवाणी की भाजपा के साथ थे. बल्कि मोटे तौर पर देखा जाए तो इन छह महीने में नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी और अमित शाह की हां में हां मिलाते ही दिखे हैं.

बदलाव के उदाहरण

इसे कुछ उदाहरणों के जरिए समझा जा सकता है. 2015 के विधानसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कई सभाओं में बिहार को विशेष पैकेज देने की बात करते थे. भाजपा से दोबारा नाता जोड़ते वक्त नीतीश कुमार ने कहा था कि उन्होंने यह निर्णय बिहार के विकास के लिए लिया है. इसके बावजूद वे इस विशेष पैकेज का जिक्र करते नहीं दिखते. इन छह महीने में कोई मौका ऐसा नहीं आया जब नीतीश कुमार केंद्र सरकार पर या नरेंद्र मोदी पर इस विशेष पैकेज के लिए दबाव बनाते दिखे हों.

बिहार के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग नीतीश कुमार की पुरानी मांगों में से एक है. इस मांग को लेकर उन्होंने दिल्ली के रामलीला मैदान तक में शक्ति प्रदर्शन किया था. लेकिन संयोग से 2005 से लेकर 2017 के 26 जुलाई तब जब भी वे बिहार के मुख्यमंत्री रहे, केंद्र में उनकी विरोधी सरकार रही. पहले जब भाजपा के समर्थन से वे बिहार के मुख्यमंत्री थे तो केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार थी. बाद में जब वे कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के समर्थन से मुख्यमंत्री बने तो केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार थी.

लेकिन 27 जुलाई से बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने जिस नई पारी की शुरुआत की उसमें पहली बार ऐसा हुआ कि राज्य में उनकी सहयोगी पार्टी भाजपा की सरकार केंद्र में है. नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड भी औपचारिक तौर पर केंद्र की सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा है. इसके बावजूद नीतीश कुमार इन छह महीनों में कभी भी बिहार के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग उठाते हुए नजर नहीं आए. न ही उनकी कोई ऐसी कोशिश दिखी जिससे लगे कि वे बिहार को यह दर्जा दिलाने के लिए केंद्र सरकार पर कोई दबाव बना रहे हैं.

छवि के उलट जाता रुख

अटल-आडवाणी की भाजपा के साथ रहे नीतीश कुमार अपनी धर्मनिरपेक्षता की छवि को लेकर बेहद गंभीर रहते थे. जब भी भाजपा हिंदुत्ववादी एजेंडे पर जाने की कोशिश करती थी तो नीतीश कुमार इसका विरोध करते थे. वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने तो उस वक्त सरकार के लिए जो एजेंडा तैयार हुआ उससे राम मंदिर और अनुच्छेद-370 जैसे विवादास्पद मुद्दों को इससे बाहर रखवाने में नीतीश कुमार की भी भूमिका थी.

लेकिन नरेेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा के साथ वाले नीतीश कुमार भाजपा के हिंदुत्ववादी एजेंडे का विरोध करने की बात तो दूर रही, कुछ मौकों पर तो वे इन मुद्दों पर भाजपा का साथ देते दिखते हैं. पद्मावत फिल्म पर मचे बवाल के बीच कुछ भाजपा शासित राज्यों ने इस फिल्म को प्रतिबंधित किया था. अटल-आडवाणी की भाजपा के साथ रहे नीतीश कुमार ऐसे विषयों पर अपना एक अलग स्टैंड ले लेते थे. लेकिन मोदी-शाह की भाजपा वाले नीतीश कुमार ने दूसरे राज्यों की भाजपा सरकारों की तर्ज पर बिहार में भी संजय लीला भंसाली की इस फिल्म को प्रतिबंधित कर दिया था.

अटल-आडवाणी की भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार बिहार में पसमांदा मुस्लमानों को अपने साथ लाने की कोशिश करते दिखते थे. इस वर्ग के लिए उन्होंने अपने शुरुआती कार्यकाल में कई कदम उठाए थे. लेकिन मोदी-शाह की भाजपा के समर्थन से इस बार मुख्यमंत्री के तौर पर काम कर रहे नीतीश कुमार ने अपनी इस पारी में कभी भी इस वर्ग के हकों और हितों की बात नहीं की है. ऐसा लगता है कि कभी जिस वर्ग को अपने पाले में लाने के लिए जमकर मेहनत करने वाले नीतीश कुमार ने इस वर्ग को इस बार भुला दिया है.

पहले वाले नीतीश कुमार भाजपा और इसके सहयोगी संगठनों द्वारा मुस्लिम समाज के विरोध में की गई बातों या गतिविधियों का विरोध करते थे. लेकिन इस बार के नीतीश कुमार गोरक्षा के नाम पर देश भर में मुस्लिम समाज के खिलाफ हो रही गतिविधियों पर कभी मुंह खोलते नहीं दिखते. जिस बिहार के वे मुख्यमंत्री हैं, वहां भी ऐसी कुछ घटनाएं हुई हैं, लेकिन इन मामलों पर नीतीश कुमार की वह सख्ती नहीं दिखती जो वह पहले ऐसे मामलों पर दिखाते थे.

पिछले साल सितंबर में जब नरेंद्र मोदी ने मंत्रिमंडल विस्तार किया तो उस वक्त तक नीतीश की पार्टी जनता दल यूनाइटेड औपचारिक तौर पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल हो गई थी. चर्चा थी कि जदयू के दो नेताओं को मोदी सरकार में मंत्री बनाया जाएगा. एक कैबिनेट मंत्री और एक राज्य मंत्री की चर्चा थी. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने नीतीश की पार्टी का कोई मंत्री नहीं बनाया. अटल-आडवाणी की भाजपा की अगुवाई वाले सरकार में न सिर्फ मंत्री बल्कि उनका मंत्रिमंडल भी तय कराने वाले नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए इस अपमान के बावजूद कुछ बोल नहीं पाए. अपमान का घूंट पीकर भी उन्होंने चुप रहना ही मुनासिब समझा.

कुल मिलाकर देखा जाए तो इस पारी वाले नीतीश कुमार पहले वाले नीतीश कुमार के मुकाबले काफी बदले-बदले नजर आ रहे हैं. इस बदलाव के बावजूद बिहार को विकास के मोर्चे पर कोई फायदा होता है या नहीं, यह तो आने वाले वक्त में ही पता चल पाएगा.