नार्सिसिज्म या आत्ममुग्धता की इंसानी प्रवृत्ति पर बहस सदियों पुरानी है. हाल ही में समाज विज्ञानियों ने निष्कर्ष निकाला है कि यह प्रवृत्ति आधुनिक ‘महामारी’ में तब्दील हो सकती है. बीते कुछ समय में हुए अध्ययन ये भी बताते हैं कि आत्ममुग्धता के मानसिक रोग बन जाने के स्तर तक पहुंचाने में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है. अगर अपने आप के बारे में लिखने-पढ़ने को छोड़कर केवल तस्वीरों पर केंद्रित रहकर बात की जाए तो कैमरा फोन इसकी बड़ी वजह बनते दिखते हैं. बढ़िया से बढ़िया कैमरे (और अब तो सेल्फी कैमरे) वाले बेहतरीन मोबाइल की बदौलत हर कोई अपना मॉडल-फोटोग्राफर दोनों ही बना फिरता है.

इससे एकतरफ जहां आत्ममुग्धता बढ़ती है वहीं दूसरी तरफ लेटेस्ट-अपडेटेड एंड्रॉयड फोन रखने का जो दबाव पैदा होता है, वह दिमाग के साथ-साथ जेब पर भी बुरा असर डालता है. आज हर दूसरे दिन बाजार में पिछले से बेहतर कैमरा फोन लॉन्च किए जाते हैं जिनके बारे में बताया जाता है कि इसमें आठ, बारह या सोलह मेगापिक्सल का कैमरा है. और मोबाइल यूजर वाह-वाह करते हुए इन्हें खरीद लेना चाहता है. सिर-पैर के सवाल में इस बार का सवाल यही है कि क्या सच में ज्यादा मेगापिक्सल होने का मतलब कैमरे का अच्छी क्वालिटी का होना है?

जवाब की पड़ताल करने से पहले जरा यह समझ लेते हैं कि मेगापिक्सल का मतलब क्या होता है. एक मेगा पिक्सल की इमेज का मतलब उस इमेज में दस लाख पिक्सल्स होना है. अगर आपको किसी कैमरे से खींची जाने वाली तस्वीर की विड्थ और हाइट (चौड़ाई और ऊंचाई) का पता है तो आप बता सकते हैं कि वह कैमरा कितने मेगापिक्सल का है. उदाहरण के लिए किसी कैमरे से खींची गई तस्वीर का साइज 1920-1080 है तो तस्वीर में कुल पिक्सल्स की गिनती 1920*1080=20,73,600 होगी. इसका मतलब है कि यह तस्वीर लगभग दो मेगापिक्सल रिजॉल्यूशन वाले कैमरे से खींची गई है.

किसी डिजिटल कैमरे से जब तस्वीर खींची जाती है तो प्रकाश किरणें लेंस से होकर सेंसर की ओर जाती हैं और सेंसर इन प्रकाश किरणों को इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदल देता है. ये इलेक्ट्रिकल सिग्नल ही तस्वीर के हर पिक्सल में नजर आने वाले रंगों का निर्धारण करते हैं. यहां पर असली खेल होता है सेंसर सरफेस का, यानी कैमरे की क्वालिटी सही मायनों में सेंसर से निर्धारित होती है.

दरअसल सेंसर सरफेस बहुत छोटे-छोटे एरिया में डिवाइड होता है. एक एरिया यानी एक पिक्सल. चार मेगापिक्सल के एक डिजिटल कैमरे का सेंसर सरफेस इतने ही रिजॉल्यूशन वाले मोबाइल कैमरे के सेंसर सरफेस से कहीं ज्यादा होगा क्योंकि उसके सेंसर का आकार बड़ा होगा. इसलिए डिजिटल कैमरे की बनिस्बत मोबाइल कैमरे से तस्वीर खींचने पर सेंसर में प्रति पिक्सल कम प्रकाश किरणें आएंगी और तस्वीर की क्वालिटी में फर्क होगा. इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि ज्यादा सेंसर सरफेस होने के कारण वह अपेक्षाकृत बड़े एरिया में बंटा होगा जिससे एक एरिया या पिक्सल का साइज भी ज्यादा हो जाएगा और फोटो कहीं ज्यादा डिटेल्स के साथ खींची जा सकेगी.

इस तरह यह तो तय है कि ज्यादा मेगापिक्सल का मतलब अच्छी क्वालिटी नहीं है. इसके लिए कैमरे में अच्छा लेंस और सेंसर होना जरूरी है जो उसे कम रोशनी और ज्यादा दूरी से भी अच्छी क्वालिटी की तस्वीर लेने लायक बनाते हैं. अब सवाल उठता है कि इस स्थिति में हमें एक ठीक-ठाक मेगापिक्सल के कैमरे की जरूरत क्यों है. दरअसल ज्यादा मेगापिक्सल की किसी तस्वीर को आसानी से क्रॉप या जूम कर उसका सिर्फ एक ही हिस्सा इस्तेमाल किया जा सकता है. ज्यादा रिजॉल्यूशन होने से तस्वीर के छोटे हिस्से में भी आपको पर्याप्त पिक्सल्स मिल जाते हैं और उसे बड़े साइज में प्रिंट करने पर यह पिक्सलेट भी नही होती है या कहें कि छितराई हुई सी नहीं दिखती. इसलिए कैमरे का रिजॉल्यूशन सही होना जरूरी है, लेकिन सबसे जरूरी नहीं.