इस हफ्ते अंतरराष्ट्रीय संगठन ऑक्सफैम ने भारत सहित दुनियाभर में लोगों के बीच संपत्ति को लेकर लोगों के बीच असमानता से संबंधित एक रिपोर्ट ‘रिवॉर्ड वर्क, नॉट वेल्थ’ जारी की है. इसके मुताबिक बीते साल भारत में उत्पन्न कुल संपत्ति के 73 फीसदी हिस्से पर देश के एक फीसदी सबसे अमीर लोगों का कब्जा है. इसके अलावा अरबपतियों की सूची में 17 नए भारतीयों ने अपनी जगह बनाई है. बताया जाता है कि इस सूची में शामिल 101 देशवासियों की कुल संपत्ति में 20.7 लाख करोड़ रु की बढ़ोतरी हुई है. साल 2016 में यह आंकड़ा 4.89 लाख करोड़ रुपये था. उधर, वैश्विक स्तर पर आर्थिक असमानता की स्थिति और भी गंभीर है. 2017 में दुनिया की 82 फीसदी संपत्ति केवल एक फीसदी आबादी के पास गई.

भारत में आर्थिक असमानता पर ऑक्सफैम इंडिया की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) निशा अग्रवाल का कहना है कि भारत के आर्थिक विकास का फायदा कुछ ही लोगों को लगातार मिल रहा है. संगठन का आगे कहना है कि भारत सरकार केवल कुछ लोगों के लिए नहीं बल्कि, प्रत्येक के लिए काम करे. दूसरी ओर, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी इस रिपोर्ट के बहाने मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री दुनिया को यह भी बताएं भारत में आर्थिक असमानता क्यों बढ़ रही है. इसके जवाब में भाजपा ने इसके लिए देश पर दशकों तक शासन करने वाली कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है.

देश के प्रमुख हिंदी और अंग्रेजी अखबारों ने ऑक्सफैम की रिपोर्ट में सामने आई देश की भयावह तस्वीर को लेकर अपनी-अपनी चिंता जाहिर की है. साथ ही, उन्होंने देश में आर्थिक असमानता के पीछे की वजहों को भी सामने लाने की कोशिश की है. इस बारे में अधिकांश अखबारों का मानना है कि अगर सरकार इस चुनौती को दूर कर पाने में विफल रहती है तो देश को बहुत बुरे नतीजों का सामना करना पड़ सकता है.

नवभारत टाइम्स ने आर्थिक असमानता बढ़ने को चिंता का विषय बताया है. अखबार लिखता है कि इस असमानता की वजह से पूरी दुनिया में लोगों के अंदर भारी आक्रोश है और इसकी अभिव्यक्ति हिंसक विरोध प्रदर्शनों और अराजकता के जरिए हो रही है. अखबार के मुताबिक अमीरों के पास संपत्ति इकट्ठा होने का सबसे बड़ा नुकसान इसका अनुत्पादक होकर अर्थतंत्र से बाहर हो जाना है. उनका उपभोग न तो उत्पादन में कोई योगदान करता है और न ही इससे विकास दर को कोई गति मिल पाती है. नवभारत टाइम्स का आखिर में कहना है कि असमानता के मुद्दे को टालते जाने की भी एक सीमा है. इसके आगे आशंका जताई गई है कि इसकी वजह से दुनिया ऐसी किसी अराजकता की शिकार न हो जाए , जिससे उबरने की उम्मीद भी मुश्किल हो.

दूसरी ओर, जनसत्ता ने ऑक्सफैम की रिपोर्ट के हवाले से भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने की क्षमता पर सवाल उठाया है. अखबार का आगे कहना है कि देश में असमानता बढ़ने की रफ्तार दुनिया के मुकाबले अधिक है. उसके मुताबिक भारत में शासन ऐसे संविधान की बुनियाद पर चलता है, जिसके नीति निदेशक तत्वों में लोगों के बीच गैर-बराबरी घटाना राज्य का कर्तव्य बताया गया है. साथ ही, जनसत्ता का मानना है कि एक ओर देश में आबादी का एक बड़ा हिस्सा गंभीर बीमारियों की सूरत में जान बचाने का खर्च नहीं उठा सकता जबकि दूसरी ओर, मुट्ठी भर लोगों के लिए आलीशान पांच सितारा अस्पताल पहुंच के दायरे में हैं. अपने संपादकीय के आखिर में अखबार ने कहा है कि देश में असमानता बढ़ने के पीछे की वजह नीति नियामकों द्वारा जमीनी हालात से आंखें चुराना है.

उधर, हिंदुस्तान टाइम्स का इस बारे में कहना है कि एक तरफ भारतीय शेयर बाजार नई ऊंचाइयों को छू रहा है, तो वहीं दूसरी ओर आय असमानता एक बड़ी समस्या के रूप में देश के सामने आई है. अखबार का आगे कहना है कि उदारीकरण के बाद उन व्यक्तियों को ही अधिक फायदा हुआ है, जो पहले से अमीर थे. दूसरी ओर, आर्थिक परिदृश्य में निचले स्तर पर मौजूद व्यक्तियों के लिए भूख, गरीबी, कुपोषण और शिक्षा प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं. अंग्रेजी के इस प्रमुख अखबार का आगे कहना है कि एक अनुमान के मुताबिक साल 2020 में भारतीयों की औसत आयु 29 साल होगी. यानी देश की कुल आबादी के एक बड़े हिस्से को पर्याप्त शिक्षा के साथ कौशल उपलब्ध कराने की जरूरत होगी. साथ ही, इससे कहीं अधिक जरूरी इसे रोजगार देना होगा. हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक अगर ऐसा नहीं होता है तो इन बेरोजगार युवाओं के जरिए समाज में अशांति आसानी से फैल सकती है.

द टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक ऑक्सफैम की रिपोर्ट से इस बात की पुष्टि होती है कि विकास और इसके अनुमानों के बाद भी संपत्ति का वितरण निचले स्तर पर नहीं हुआ है. इसके अलावा इस अखबार ने विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के समावेशी विकास से संबंधित सूचकांक का भी जिक्र किया है. इस सूचकांक में भारत दुनिया के 74 देशों के बीच 62वें पायदान पर है. इस मामले में पाकिस्तान की स्थिति भारत के मुकाबले बेहतर है. इसके अलावा अखबार ने भारत के विकास पर भी सवाल उठाए हैं जिसमें श्रम प्रधान उद्योगों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है और जो आवश्यकता से अधिक खेतिहर मजदूरों को उद्योगों में खपाने में भी विफल रहा है. साथ ही, अखबार ने लालफीताशाही और श्रम सुधार के विरोध को असमानता की वजह माना है.