देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बचपन का यह किस्सा सस्ता साहित्य मंडल द्वारा प्रकाशित उनकी आत्मकथा ‘मेरी कहानी’ का एक अंश है.


मां-बाप धनी-मानी और बेटा इकलौता हो तो अक्सर वह बिगड़ जाता है - फिर, हिंदुस्तान में तो और भी ज्यादा. और जब लड़का ऐसा हो जो ग्यारह साल की उम्र तक अपने मां-बाप का इकलौता रहा हो तो फिर दुलार की खराबी से उसके बचने की आशा और कम रह जाती है. मेरी दो बहनें उम्र में मुझसे बहुत ही छोटी हैं और हम हर एक के बीच काफी साल का फर्क है. इस तरह अपने बचपन में मैं बहुत कुछ अकेला ही रहा.

मगर हमारे घर में किसी तरह का अकेलापन नहीं था. हमारा परिवार बहुत बड़ा था, जिसमें चचेरे भाई वगैरह और दूसरे पास के रिश्तेदार बहुत थे, जैसा कि हिंदू परिवारों में आमतौर पर हुआ करता है. मगर मुश्किल यह थी कि मेरे तमाम चचेरे भाई उम्र में मुझसे बड़े थे और वे सब हाईस्कूल या कॉलेज में पढ़ते थे. उनकी नज़र में मैं उनके कामों या खेलों में शरीक होने लायक नहीं था. इस तरह इतने बड़े परिवार में मैं और भी अकेला पड़ गया था और ज्यादातर अपने ही खयालों और खेलों में मुझे अपना वक्त काटना पड़ता था.

शाम को रोज कई मित्र पिताजी से मिलने आया करते थे. पिताजी आराम से पड़ जाते और उनके बीच दिनभर की थकान मिटाते. उनकी जबरदस्त हंसी से सारा घर भर जाता था. इलाहाबाद में उनकी हंसी एक मशहूर बात हो गई थी. कभी-कभी मैं परदे की ओट से उनकी और उनके दोस्तों की ओर झाकंता और यह जानने की कोशिश करता कि ये बड़े लोग इकट्ठे होकर आपस में क्या-क्या बातें किया करते हैं! मगर जब कभी ऐसा करते हुए पकड़ा जाता तो खींचकर बाहर लाया जाता और सहमा हुआ कुछ देर तक पिताजी की गोद में बैठाया जाता.

मैं पिताजी की बहुत इज्जत करता था, उन्हें बल, साहस और होशियारी की मूर्ति समझता था और दूसरों के मुकाबले इन बातों में बहुत ही ऊंचा और बढ़ा-चढ़ा पाता था. मैं अपने दिल में मंसूबे बांधा करता था कि बड़ा होने पर पिताजी की तरह होऊंगा. पर, जहां मैं उनकी इज्जत करता था और उन्हें बहुत चाहता था, उनसे डरता भी बहुत था. नौकर-चाकरों पर और दूसरों पर बिगड़ते हुए मैंने उन्हें देखा था. उस समय वे बड़े भयंकर मालूम होते थे और मैं मारे डर के कांपने लगता था. नौकरों के साथ उनका जो यह बर्ताव होता था, उससे मेरे मन में उन पर कभी-कभी गुस्सा आ जाया करता था. उनका स्वभाव दरअसल भयंकर था और उनकी उम्र के ढलते दिनों में भी उनका हंसी-मजाक का माद्दा भी बड़े जोर का था और वे इरादे के बड़े पक्के थे. इससे आमतौर पर अपने आप पर जब्त रख सकते थे. ज्यों-ज्यों उनकी बढ़ती गई उनकी सयंम-शक्ति बढ़ती गई और फिर शायद ही कभी वे ऐसा भीषण स्वरुप धारण करते थे.

उनकी तेज-मिजाजी की एक घटना मुझे याद है, क्योंकि बचपन ही में मैं उसका शिकार हो गया था. कोई पांच-छह वर्ष की मेरी उम्र रही होगी. एक रोज़ मैंने पिताजी की मेज पर दो फाउन्टेन पेन पड़े देखे. मेरा जी ललचाया. मैंने दिल में कहा - पिताजी एक साथ दो पेनों का क्या करेंगे? एक मैंने अपनी जेब में डाल लिया. बाद में बड़ी जोरों की तलाश हुई कि पेन कहां चला गया? तब तो मैं घबराया. मगर मैंने बताया नहीं. पेन मिल गया और मैं गुनाहगार करार दिया गया. पिता जी बहुत नाराज हुए और मेरी खूब मरम्मत की. मैं दर्द व अपमान से अपना-सा मुंह लिये मां की गोद में दौड़ गया और कई दिन तक मेरे दर्द करते हुए छोटे-से बदन पर क्रीम और मरहम लगाये गए.

लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता कि इस सजा के कारण पिताजी को मैंने कोसा हो. मैं समझता हूं, मेरे दिल ने यही कहा होगा कि सजा तो मुझे वाजिब ही मिली है, मगर थी जरुरत से ज्यादा! लेकिन पिताजी के लिए मेरे दिल में वैसी ही इज्जत और मुहब्बत बनी रही - हां, अब एक डर और उसमें शामिल हो गया था, मगर मां के बारे में ऐसा न था. उनसे मैं बिलकुल नहीं डरता था, क्योंकि मैं जानता था कि वो मेरे सब किये-धरे को माफ कर देगी और उनके इस ज्यादा और बेहद प्रेम के करण मैं उन पर थोड़ा-बहुत हावी होने की भी कोशिश करता था. पिताजी की बनिस्बत मैं मां को ज्यादा पहचान सका था और मुझे पिताजी से ज्यादा वह अपने नजदीक मालूम होती थी. मैं जितना भरोसे के साथ माताजी से अपनी बात कह सकता था, उतने भरोसे के साथ पिताजी से कहने का स्वप्न में भी खयाल नहीं कर सकता था.