कुछेक साल पहले अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने फिल्म ‘पद्मावत’ को लेकर एक विचारोत्तेजक आलेख लिखा था. इस आलेख का मंतव्य यह सवाल उठाना था कि क्या बलात्कार की निश्चित आशंका के डर से जौहर सराहनीय था? इस प्रश्न को यदि हम आज की नारीवादी कसौटियों पर कसने चलें, तो इसमें इस बात की अनदेखी हो जाने का खतरा रहता है कि हमारे आधुनिक सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का विकास क्रमिक रूप से हुआ है. सामाजिक अध्ययन की दृष्टि से एक तटस्थ अध्येता के लिए देशकाल, परिस्थिति, प्रचलित मूल्य, संदर्भ और परिप्रेक्ष्य इत्यादि का ध्यान रखना जरूरी हो जाता है. संभव है कि जो चुनौतियां उस समय की महिलाओं के सामने जिस रूप में थीं, उसमें उस समय के सामाजिक चिंतन के हिसाब से उन्होंने अपनी जान देने का निर्णय ले लिया हो.

सात सौ साल पहले की किसी परिघटना का मूल्यांकन यदि आज के समानतावादी और स्वतंत्रतावादी विचारों के आधार पर कठोरतापूर्वक करने बैठ जाएं, तो हम सरासर यह भूल कर बैठेंगे कि आधुनिक सामाजिक और राजनीतिक चेतना पूरे वैश्विक मानव समाज में धीरे-धीरे क्रमिक रूप से आई है. और इसलिए तत्कालीन परिस्थितियों की विकरालता को देखते हुए हमें अपने पूर्वजों या पूर्वजाओं के प्रति थोड़ी सहानुभूति से ही काम लेना चाहिए.

लेकिन साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना पड़ सकता है कि आज की कोई कलाकृति हमारी लड़कियों या महिलाओं को यह संदेश सूक्ष्म रूप से भी न दे बैठे कि बलात्कार के पहले या बाद में आत्महत्या सराहनीय है. वास्तव में, यदि सामाजिक यौन केंद्रितता को एक किनारे रख दें, तो बलात्कार केवल एक शारीरिक हमला और दुर्घटना मात्र है.

लेकिन जब हम महिलाओं की यौनिकता को ही उनके व्यक्तित्व का एकमात्र केंद्र बना देते हैं, जब हम उनके यौनांग या जननांग की ‘पवित्रता’ को ही उनके अस्तित्व की अनिवार्य शर्त बना देते हैं, तो यह हमारी महिलाओं में इतनी आत्मघृणा या इतने आत्मतिरस्कार का भाव भर देता है कि वे ऐसे मामलों में कई बार अपनी जान ले बैठती हैं. कई बार पुरुषों के साथ हुए बलात्कार में भी यही बात निकलकर आती है. बलात्कार से पीड़ित पुरुषों द्वारा आत्महत्या की खबरें आती ही रहती हैं.

यह एक कड़वी सच्चाई है कि अतीत में साम्राज्य स्थापित करने के लिए लड़े गए युद्धों और जातीयतावादी संघर्षों में भी महिलाओं पर विशेष अत्याचार हुए. दुनिया के कई युद्धग्रस्त हिस्सों में आज भी ऐसा हो रहा है. लेकिन भारतीय संदर्भ में इसे केवल मुस्लिम आक्रमणकारी बनाम राजपूत शासकों की चक्की में पिसती महिलाओं के नजरिए से नहीं देखा जा सकता, क्योंकि अन्य युद्धों में भी कमोबेश ऐसा हुआ हो सकता है.

यह नरपशुओं के बीच हुए युद्धमात्र की एक सच्चाई होती है. उदाहरण के लिए, बांग्लादेश के मुक्ति-संघर्ष में तो मुस्लिम सैनिकों ने ही लाखों मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार किए. वहां के पुरुषों के साथ भी सैनिकों ने बलात्कार किए. वहां उन्होंने ‘बंगभाषी मुसलमान बनाम अन्य मुसलमान’ की दुर्भावना की आड़ में ऐसा किया. लेकिन उसके बाद जो हुआ, उसमें और जौहर में कोई फर्क नहीं किया जा सकता. बलात्कार-पीड़िता बांग्लादेशी मांओं, बहनों, पत्नियों और बेटियों को उनके अपने परिवार ने, अपने समाज ने ही अपनाने से इनकार कर दिया. हज़ारों-लाखों की संख्या में उन परित्यक्ताओं या बहिष्कृताओं ने आत्महत्या की.

प्रकारांतर से क्या वह जौहर जैसा ही नहीं था? कहा जाता है कि जिन नग्न लड़कियों और महिलाओं को फांसी लटकने का अन्य कोई साधन नहीं मिला, उन्होंने अपने ही बालों की चोटी से लटककर फांसी लगा ली. इस तरह उनकी हत्या बलात्कारियों ने नहीं की, बल्कि अपने ही समाज और परिजनों द्वारा लांछित-बहिष्कृत किए जाने की सामाजिक बर्बरता ने उनकी हत्या की. इस तरह बलात्कार-पूर्व जौहर या बलात्कार-बाद की आत्महत्या, ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. और वह मर्दाभिमानवादी या ‘पवित्रतावादी’ सिक्का है, महिलाओं के जननांग को ही उनके संपूर्ण अस्तित्व का केन्द्र बना देना या उनकी ‘पवित्रता’ की अनिवार्य शर्त बना देना.

सदियों की मानसिक पराधीनता और आत्महीनता की वजह से स्वयं महिलाओं ने ही इस सिक्के को हाथों-हाथ लिया और किसी पुरुष द्वारा किए गए एक शारीरिक हमले को अपने जीवन-मरण का प्रश्न बना लिया. हर दिन बढ़ते बलात्कार के मामलों और उस पर आने वाली राजनीतिक-सामाजिक प्रतिक्रियाओं को देखें तो इस विषय में महात्मा गांधी के विचार बरबस याद आते हैं. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब दुनियाभर के फौजी ‘शत्रुदेश’ की महिलाओं के साथ बलात्कार को युद्धनीति के रूप में स्वीकार कर चुके थे, उस दौरान फरवरी, 1942 में किसी महिला ने उसी संदर्भ में महात्मा गांधी को पत्र लिखकर उनसे बलात्कार के बारे में तीन सवाल पूछे -

यदि कोई राक्षस-रूपी मनुष्य राह चलती किसी बहन पर हमला करे और उससे बलात्कार करने में सफल हो जाए, तो उस बहन का शील-भंग हुआ माना जाएगा या नहीं?

क्या वो बहन तिरस्कार की पात्र है? क्या उसका बहिष्कार किया जा सकता है?

ऐसी स्थिति में पड़ी हुई बहन औऱ जनता को क्या करना चाहिए?

एक मार्च, 1942 को गुजराती ‘हरिजनबंधु’ में गांधीजी ने इस पत्र का जवाब देते हुए लिखा- ‘…जिस पर बलात्कार हुआ हो, वह स्त्री किसी भी प्रकार से तिरस्कार या बहिष्कार की पात्र नहीं है. वह तो दया की पात्र है. ऐसी स्त्री तो घायल हुई है, इसलिए हम जिस तरह घायलों की सेवा करते हैं, उसी तरह हमें उसकी सेवा करनी चाहिए. वास्तविक शील-भंग तो उस स्त्री का होता है जो उसके लिए सहमत हो जाती है. लेकिन जो उसका विरोध करने के बावजूद घायल हो जाती है, उसके संदर्भ में शील-भंग की अपेक्षा यह कहना अधिक उचित है कि उस पर बलात्कार हुआ. ‘शील-भंग’ शब्द बदनामी का सूचक है और इस तरह वह ‘बलात्कार’ का पर्याय नहीं माना जा सकता है. जिसका शील बलात्कारपूर्वक भंग किया गया है, यदि उसे किसी भी प्रकार निन्दनीय न माना जाए तो ऐसी घटनाओं को छिपाने का जो रिवाज हो गया है, वह मिट जाएगा. इस रिवाज के खत्म होते ही ऐसी घटनाओं के विरुद्ध लोग खुलकर चर्चा कर सकेंगे.’

गांधीजी के लिए इस लेख का शीर्षक था- ‘बलात्कार के समय क्या करें?’ इस लेख में गांधी आगे लिखते हैं- ‘जिस स्त्री पर इस तरह का हमला हो, वह हमले के समय हिंसा-अहिंसा का विचार न करे. उस समय आत्मरक्षा ही उसका परम-धर्म है. उस समय उसे जो साधन सूझे उसका उपयोग कर उसे अपने सम्मान और शरीर की रक्षा करनी चाहिए. ईश्वर ने उसे जो नाखून दिए हैं, दांत दिए हैं और जो बल दिया है वह उनका उपयोग करेगी. और उनका उपयोग करते-करते वह जान दे देगी. जिस स्त्री या पुरुष ने मरने का सारा डर छोड़ दिया है, वह न केवल अपनी ही रक्षा कर सकेंगे, बल्कि अपनी जान देकर दूसरों की रक्षा भी कर सकेंगे.’

हालांकि गांधी यह भी मानते थे कि महिलाओं को स्वयं में निर्भयता, आत्मबल और नैतिक बल भी पैदा करनी होगी. जैसा कि वे 14 सितंबर, 1940 को ‘हरिजन’ में लिखते हैं कि ‘यदि स्त्री केवल अपने शारीरिक बल पर या हथियार पर भरोसा करे, तो अपनी शक्ति चुक जाने पर वह निश्चय ही हार जाएगी.’ इसलिए जान देने की प्रेरणा या इसका साहस होना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन वह पहले ही हार मानकर आत्महत्या के रूप में न हो, बल्कि एक सम्मानजनक जीवन की चाह में लड़ते-लड़ते जान देने के अर्थ में हो.

यदि किसी जमाने में महिलाओं के अस्तित्व या व्यक्तित्व को उनकी मानवीय संपूर्णता में न देखकर, केवल उनके जननांगों तक सीमित कर दिया जाता था, तो उसकी परिणति उनके द्वारा भय, ग्लानि या शर्म के मारे आत्महत्या कर लेने के रूप में होती थी. यहां तक कि उनके परिजनों द्वारा उन्हें जबरन मार दिए जाने या बहिष्कृत किए जाने की स्थिति बनती थी.

आज हम उस अवस्था से बहुत हद तक आगे बढ़ चुके हैं. मानने लगे हैं कि भय, ग्लानि और शर्म की स्थिति तो उन पर आक्रमण करने वालों के लिए होनी चाहिए. ऐसे आक्रमणों में चोट खाकर बच गईं महिलाओं के प्रति केवल वैसी ही सहानुभूति होनी चाहिए, जैसे किसी अन्य आक्रमण में चोट खाए हुए के प्रति. यही भावना स्वयं आक्रमण की शिकार महिलाओं की भी स्वयं के प्रति होनी चाहिए. यही बात बलात्कार से आक्रमित पुरुषों या अन्य लिंगों पर भी लागू होती है. यदि सिनेमा, साहित्य या कई बार राजनीति के जरिए भी यौन केंद्रित शर्म, आत्मघृणा और ग्लानि की वजह से आक्रमितों द्वारा की गई आत्महत्या का महिमामंडन हो रहा हो, तो हमें फिर से सोचने की जरूरत होगी.

ऊपर जिक्र किए गए आलेख की थोड़ी और बात करें तो अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने जो सवाल उठाए थे, वे इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि भारत की ज्यादातर महिलाओं का फिल्म-दर्शक और उपभोक्ता के रूप में पर्याप्त क्रिटिकल और जागरूक बनना अभी बाकी है. और जब स्वयं अभिनेत्रियां ही ऐसे विचारोत्तेजक सवाल उठाने का साहस दिखाती हैं, तो वे इस महत्वपूर्ण माध्यम के लिए भी नई संभावनाओं को जन्म देती हैं. किसी भी सेंसरशिप या हो-हंगामे से अधिक हमें ऐसी चर्चाओं और संवादों की जरूरत है.