इस समय भारतीय क्रिकेट टीम दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर है. तीन मैचों की टेस्ट सीरीज 2-1 से गंवाने के बाद उसने छह मैचों की वनडे सीरीज 5-1 से अपने नाम की है. भारत ने दक्षिण अफ्रीका में बीते 25 सालों में पहली बार कोई वनडे सीरीज जीतने में कामयाबी पायी है. एशियाई टीमों के लिए दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और न्यूजीलैंड में खेलना हमेशा ही एक अलग तरह की चुनौती रही है. यही कारण है कि इन देशों में मिली हार या जीत को लंबे समय तक याद रखा जाता है.

लेकिन, भारतीय टीम का एक दक्षिण अफ्रीका दौरा ऐसा भी है जिसे हार और जीत से अलग किसी और वजह से याद किया जाता है. साल 2001 में हुए इस दौरे में टेस्ट सीरीज के दौरान एक ऐसी घटना घटित हुई जो क्रिकेट के इतिहास में अपनी तरह की इकलौती और अनूठी घटना कही जाती है. इसकी शुरुआत सीरीज के दूसरे मैच में मैच रेफरी माइक डेनिस के विवादित फैसलों से हुई थी. इनमें उन्होंने सचिन तेंदुलकर सहित छह भारतीय खिलाड़ियों पर एक साथ कड़ी कार्रवाई करते हुए इन्हें एक टेस्ट से बाहर बैठने की सजा सुनाई थी.

भारत में इसका जमकर विरोध हुआ, यहां तक कि देश की संसद में भी ये मामला उठाया गया. सांसदों की राय थी कि ब्रिटिश रेफरी माइक डेनिस ने भारतीय खिलाड़ियों के साथ ज्यादती की है और उनके फैसले में रंगभेद का दुराग्रह छिपा है. इनका यह भी कहना था कि अगर भारतीय टीम दक्षिण अफ्रीका में सम्मान के साथ नहीं खेल सकती तो उसे वापस बुला लेना चाहिए.

माइक डेनिस के फैसलों का भारत में भारी विरोध हुआ था | फोटो : एएफपी
माइक डेनिस के फैसलों का भारत में भारी विरोध हुआ था | फोटो : एएफपी

इस मामले पर विवाद बढ़ता देख बीसीसीआई ने आईसीसी के सामने डेनिस को सेंचुरियन में होने वाले तीसरे टेस्ट मैच से हटाने की शर्त रख दी. लेकिन, आईसीसी ने मैच रेफरी को सही ठहराते हुए ऐसा करने से इनकार कर दिया. इसके बाद भारत और अफ्रीका के बोर्डों ने क्रिकेट की शीर्ष संस्था के खिलाफ जाकर डेनिस को तीसरे मैच से बाहर कर दिया. आईसीसी ने चेतावनी दी कि यह मैच अधिकृत नहीं माना जाएगा. लेकिन, इस चेतावनी की परवाह न करते हुए दोनों देशों ने सेंचुरियन पार्क में तीसरा टेस्ट मैच खेला. क्रिकेट के इतिहास में यह एक अनोखी घटना है क्योंकि आईसीसी ने आज तक इस टेस्ट मैच को मान्यता नहीं दी है.

मैच रेफरी माइक डेनिस का बवाल खड़ा करने वाला वह फैसला क्या था?

माइक डेनिस ने पोर्ट एलिजाबेथ में खेले गए दूसरे टेस्ट मैच के आखिरी दिन भारत के चार खिलाड़ियों वीरेंद्र सहवाग, शिवसुंदर दास, दीप दास गुप्ता और हरभजन सिंह को ज्यादा अपील करने और अंपायर पर दबाव बनाने के आरोप में एक टेस्ट से हटाने और उनकी फीस से पचहत्तर प्रतिशत पैसा जुर्माने के रूप में काटने की सजा सुनाई थी. साथ ही रेफरी ने सचिन तेंदुलकर पर गेंद की सीवन से छेड़खानी करने का आरोप लगाया और उन्हें भी एक टेस्ट मैच खेलने से बैन कर दिया .

इसके अलावा माइक डेनिस ने भारतीय कप्तान सौरव गांगुली को अपने खिलाड़ियों को नियंत्रित न कर पाने के आरोप में एक टेस्ट और दो वनडे से बाहर बैठने की सजा सुना दी. सहवाग को छोड़कर सभी को सस्पेंडेड बैन की सजा सुनाई गई थी जिसके तहत सचिन की सजा एक महीने बाद और अन्य की दो महीने बाद लागू होनी थी. सहवाग पर अंपायर के साथ अभद्र व्यवहार करने का भी आरोप लगा था जिस वजह से उनके ऊपर लगे बैन की तामील अगले टेस्ट मैच से ही होनी थी.

यह सजा अन्यायपूर्ण और पक्षपाती क्यों थी?

उस समय दुनिया के कई क्रिकेट दिग्गजों ने माइक डेनिस द्वारा दी गयी इस सजा को ज्यादा सख्त और पक्षपाती बताया था. मैच के दौरान हुए पूरे घटनाक्रम को जानने के बाद शायद हर कोई इन लोगों की बात से सहमत दिखेगा. दरअसल, पोर्ट एलिजाबेथ में हुए दूसरे टेस्ट मैच में दक्षिण अफ्रीका के अंपायर इयान ऑवेल पहली बार अंपायरिंग कर रहे थे. भारत की पहली पारी में उन्होंने कई बल्लेबाजों को गलत आउट दिया था. दक्षिण अफ्रीकी कप्तान शॉन पोलाक की एक गेंद भारतीय ओपनर दीप दासगुप्ता के बल्ले से लगने के बाद उनके पैड में लगी. लेकिन, पोलाक के उत्साह में देर तक अपील करने के कारण ऑवेल ने गुप्ता को पगबाधा यानी एलबीडब्ल्यू आउट दे दिया.

इसके बाद इस मैच में भारत को फॉलोआन से बचाने वाले वीवीएस लक्ष्मण शतक की ओर बढ़ रहे थे. पोलाक की लेग स्टंप से काफी बाहर जाती एक गेंद लक्ष्मण के बाएं पैड पर लगी. साफ़ दिख रहा था कि लक्ष्मण आउट नहीं हैं, लेकिन पोलाक की जोरदार अपील के चलते नौसिखिया अंपायर इयान ऑवेल ने उन्हें भी आउट दे दिया. उस समय जनसत्ता के वरिष्ठ संपादक प्रभाष जोशी अपने एक लेख में लिखते हैं कि ये दोनों उदाहरण किसी को भी यह समझाने के लिए काफी थे कि अगर उत्साह और विश्वास से देर तक अपील की जाए तो अंपायर ऑवेल दबाव में आते हैं और आउट दे देते हैं. वे लिखते हैं कि इसी के चलते भारतीय खिलाड़ियों ने भी इस रणनीति का इस्तेमाल करने का फैसला किया.

दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज निकी बॉय के खिलाफ पगबाधा की अपील करते भारतीय खिलाड़ी | फोटो : एएफपी
दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज निकी बॉय के खिलाफ पगबाधा की अपील करते भारतीय खिलाड़ी | फोटो : एएफपी

दक्षिण अफ्रीका की दूसरी पारी में भारतीय फील्डरों ने हरभजन और कुंबले की गेंदबाजी के दौरान जमकर ऐसी अपीलें कीं. विकेट कीपर दासगुप्ता और बल्लेबाज के करीब ही सिली पॉइंट फील्डिंग कर रहे वीरेंद्र सहवाग, शिव सुंदर दास के अलावा हरभजन सिंह ने पैड से लगी कई गेंदों पर उत्साह में देर तक अपीलें की. दक्षिण अफ्रीका की तरह ही भारत की भी यह रणनीति कामयाब रही. अफ़्रीकी बल्लेबाज डिपेनार और लॉंन्स क्लूजनर के बल्ले और पैड से लगकर उछली दो गेंदों पर कैच की अपील को इयान ऑवेल ने स्वीकार कर उन्हें आउट दे दिया. जबकि, ये दोनों ही आउट नहीं थे.

मैच खत्म होने के बाद मैच रेफरी माइक डेनिस ने चार भारतीय खिलाड़ियों को अंपायर पर दबाव बनाने के मकसद से ज्यादा अपीलें करने का दोषी पाते हुए उन्हें एक मैच से बाहर बैठने और 75 फीसदी मैच फीस काटने की सजा सुना दी. जानकारों की मानें तो डेनिस का यह निर्णय अन्यायपूर्ण और पक्षपाती इसलिए था कि अगर उन्होंने सहवाग, दासगुप्ता, शिव सुंदर दास और हरभजन को सजा दी तो फिर दक्षिण अफ्रीकी गेंदबाज पोलाक को क्यों छोड़ दिया. जबकि उनकी अपीलों पर दीप दासगुप्ता और लक्षमण को गलत आउट दिया गया था.

कई जानकारों का यह भी कहना था कि न्याय करने बैठाया गया कोई भी रेफरी ऐसा एकतरफा फैसला नहीं सुना सकता. अगर कोई सुनाता भी है तो उस पर सवाल जरूर उठेगा. इनके अनुसार डेनिस सजा सुनाते समय यह भूल गए कि उनके फैसले पर अन्यायी, एकतरफा और पक्षपाती होने का आरोप जरूर लगेगा.

ब्रिटिश मैच रेफरी माइक डेनिस | फोटो : एएफपी
ब्रिटिश मैच रेफरी माइक डेनिस | फोटो : एएफपी

डेनिस द्वारा सचिन तेंदुलकर को दी गयी सजा पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ. दरअसल, तेज गेंदबाज जवागल श्रीनाथ और अजीत अगरकर के शुरूआती ओवरों में गेंदबाजी करने के बाद कप्तान ने तेंदुलकर को गेंदबाजी के लिए बुलाया था. कुछ घंटे पहले हुई बारिश की वजह से पिच की मिट्टी और मैदान की घास गेंद की सीवन पर चिपक गयी थी. ऐसी परिस्थिति में हर गेंदबाज गेंद को साफ़ करता है, तेंदुलकर भी वही कर रहे थे.

हालांकि, नियम कहता है कि उन्हें ऐसा अंपायर को दिखाकर या उनसे ही करवाना चाहिए थे. जाहिर है कि तेंदुलकर ने अंपायर से नहीं पूछा. लेकिन, टीवी पर गेंद की सीवन साफ़ करते तेंदुलकर को देखा जा सकता है, जिसमें साफ़ दिख रहा था कि वे अपने अंगूठे से सीवन के किनारे लगी गंदगी साफ़ कर रहे थे न कि गेंद को ज्यादा घुमाने के लिए उससे छेड़छाड़ कर रहे थे.

उस समय आईसीसी की क्रिकेट कमेटी अध्यक्ष और उस मैच में कमेंट्री कर रहे सुनील गावस्कर के अलावा रवि शास्त्री, नवजोत सिंह सिद्धू और ज्योफ्री बायकॉट सभी का कहना था कि तेंदुलकर पर धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगाया जा सकता क्योंकि वे अपने नाखूनों से न तो गेंद की सीवन उठा रहे थे और न ही सिलाई उधेड़ रहे थे. इन लोगों का यह भी कहना था कि अंपायर से बिना पूछे गेंद साफ़ करने की वह सजा नहीं हो सकती जो तेंदुलकर को दी गई. इसके लिए सचिन को चेतावनी देना पर्याप्त हो सकता था. इन लोगों ने ये दलीलें तेंदुलकर के गेंद साफ़ करते हुए दृश्यों को टीवी पर दिखाते हुए दी थीं.

इस घटना से जुड़ता हुआ एक पहलू यह भी है कि उसी समय ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच चल रहे एक टेस्ट मैच में न्यूजीलैंड के गेंदबाज क्रेग मैकमिलन को भी गेंद की सीवन साफ़ करते हुए देखा गया. वे भी अंपायर को बिना बताए ऐसा कर रहे थे. लेकिन, इस मैच के रेफरी जैकी हेंड्रिक्स ने उसी नियम के तहत मैकमिलन को कोई सजा नहीं दी.

इसी तरह खिलाड़ियों के बर्ताव पर कभी किसी कप्तान को सजा नहीं दी गयी, लेकिन माइक डेनिस ने कप्तान गांगुली को सबसे सख्त सजा दे डाली. उस समय कई जानकारों का कहना था कि अगर दूसरे रेफरी भी डेनिस की तरह काम करते तो ऑस्ट्रेलिया के कप्तान स्टीव वा, दक्षिण अफ्रीका के हेंसी क्रोनिए और न्यूजीलैंड के कप्तान स्टीफन फ्लेमिंग तो हमेशा मैचों से बाहर ही बैठे रहते.

इस मामले में सबसे अलग यह भी था कि बात सचिन जैसे प्रतिष्ठित खिलाड़ी की थी जो 12 साल से अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल रहे थे. वे तब तक 86 टेस्ट और 282 वनडे खेल चुके थे और उनके खिलाफ कभी कोई शिकायत नहीं हुई थी. दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज सचिन तब भी अपनी शालीनता और ईमानदारी के लिए इस खेल के सबसे आदर्श खिलाड़ी माने जाते थे. ऐसे में सचिन पर गेंद से छेड़खानी करने के आरोप ने भारत के लोगों को बुरी तरह आहत कर दिया.

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प्रभाष जोशी जी लिखते हैं कि डेनिस की सजा अपराध से कहीं ज्यादा, एकतरफा और पक्षपाती थी. इसलिए भारत जैसा देश जहां क्रिकेट को धर्म माना जाता है वहां इसका इतना विरोध होना लाजमी था. जनता के गुस्से के सामने भारत सरकार, बीसीसीआई और दक्षिण अफ्रीकी सरकार और बोर्ड को झुकना पड़ा. वे आगे लिखते हैं कि यह घटना होने के बाद आईसीसी के पास अवसर था कि वह डेनिस के किए को समझदारी से ठीक करके खेल को सही से चलने देती. लेकिन, उसने भी मामले की गंभीरता को न समझते हुए अड़ियल रवैया दिखाया. इसके चलते ही भारत की संसद के बाद दोनों देशों को कहना पड़ा कि वे डेनिस को बाहर करके तीसरा टेस्ट खेलेंगे. इस मामले में दक्षिण अफ्रीका रंगभेद की तोहमत से बचना चाहता था सो उसने इसमें भारत का साथ दिया. इसके बाद भारत और दक्षिण अफ्रीका दोनों ने सेंचुरियन में तीसरा टेस्ट मैच खेला.

आईसीसी और बीसीसीआई में सुलह कैसे हुई?

भारत को दक्षिण अफ्रीका के साथ 23-27 नवंबर तक तीसरा टेस्ट मैच खेलने के बाद 03 दिसंबर से इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज खेलनी थी. लेकिन, आईसीसी के साथ चल रही तकरार की वजह से मुश्किल यह थी कि इंग्लैंड आईसीसी के खिलाफ जाकर यह मैच नहीं खेलता क्योंकि ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और न्यूजीलैंड तीनों इस मामले में आईसीसी का समर्थन कर रहे थे. भारत में जो हालात थे उन्हें देखते हुए बीसीसीआई यह भी नहीं दिखाना चाहता था कि वह आईसीसी के सामने झुक गया है. उधर, आईसीसी भी दुनियाभर में हो रही अपनी किरकिरी और आधे से ज्यादा क्रिकेट खेलने वाले देशों के बीसीसीआई के पक्ष में खड़े होने के कारण भारी दबाव में थी.

यानी परिस्थितियों के लिहाज से दोनों ही इस विवाद को जल्द सुलझाना चाहते थे. ऐसे में एक लंबी बैठक के बाद दोनों ही एक-एक कदम पीछे हटने को राजी हुए. इसके बाद आईसीसी ने सचिन तेंदुलकर और सौरव गांगुली की सजा खत्म कर दी साथ ही दीप दासगुप्ता, शिव सुंदर दास और हरभजन सिंह की सजा पर दोबारा विचार करने का भरोसा दिया. जबकि, बीसीसीआई सेंचुरियन टेस्ट को अनाधिकृत मानने और वीरेंद्र सहवाग की सजा को बरकरार रखने पर सहमत हुआ.

यह सब होने के दो रोज बाद माइक डेनिस और आईसीसी के प्रवक्ता जोनाथन हेमुस ने एक बयान दिया जिसमें कहा गया, ‘सचिन तेंदुलकर गेंद से छेड़खानी करने के दोषी नहीं पाए गए हैं. उन्हें जो सजा दी गई थी वह अंपायरों को बताए बिना गेंद की सीवन से मिट्टी और घास निकालने के लिए थी और ऐसा करना गेंद से छेड़खानी करने से बिलकुल अलग है.’