इस साल संसद के बजट सत्र की शुरुआत करते हुए अपने संबोधन में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने स्वास्थ्य को लेकर गरीब और मध्य वर्ग की चिंता और इस संबंध में मोदी सरकार की कोशिशों का जिक्र किया था. उन्होंने कहा कि इलाज के खर्च का आर्थिक आघात, बीमारी के आघात को और भी अधिक कष्टकारी बना देता है. राष्ट्रपति का आगे कहना था कि केंद्र सरकार ने इसे ध्यान में रखते हुए नई ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति’ बनाई है. उनके मुताबिक साथ ही ‘राष्ट्रीय आयुष मिशन’ द्वारा योग-आयुर्वेद जैसी परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है.

उधर, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण (2017-18) में भी समावेशी और टिकाऊ विकास हासिल करने के लिए शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के साथ स्वास्थ्य को भी प्राथमिकता देने की बात कही गई. इसमें आगे कहा गया कि भारत का विश्‍व की अग्रणी ज्ञान अर्थव्‍यवस्‍थाओं में से एक के रूप में उभरना तय है जहां शिक्षा, कौशल विकास एवं स्‍वास्‍थ्‍य सरकार के लिए प्राथमिकताएं बनी रहेंगी. दूसरी ओर, बच्चों और महिलाओं में कुषोषण को स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकार की मुख्य चुनौती बताया गया. इसके अलावा इस साल के बजट (2018-19) में वित्त मंत्री ने देश के करीब 50 करोड़ लोगों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना की घोषणा की. इसे अमेरिका की तर्ज पर मोदीकेयर भी कहा जाता रहा है. इसके तहत प्रत्येक गरीब परिवार को पांच लाख रुपये की स्वास्थ्य बीमा देने की बात कही गई है. बताया जाता है कि सरकार इसे लागू करने के लिए इस पर तेजी से काम कर रही है.

इससे पहले भाजपानीत केंद्र सरकार ने बीते साल 15 मार्च को नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को मंजूरी दी थी. इससे पहले 2002 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लाई गई थी. इन 15 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो गई है. लेकिन दूसरी ओर देखें तो आजादी के सात दशक बाद भी देश में स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है. विश्व स्वास्थ्य सूचकांक में शामिल कुल 188 देशों के बीच भारत 143वें पायदान पर है. कई मोर्चों पर उसका हाल अफ्रीकी देशों से भी बुरा है. नई स्वास्थ्य नीति को मोदी सरकार ने मील का पत्थर बताया है. लेकिन, बहुत से जानकार हैं जिनका मानना है कि बीमार तंत्र और बुनियादी ढांचे के अभाव की वजह से यह ख्याली पुलाव साबित हो सकती है.

नई नीति में कई लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं. इनमें सबसे प्रमुख सभी को मुफ्त दवा और इलाज की सुविधा उपलब्ध करवाना है. इसमें स्वास्थ्य क्षेत्र पर बजट आवंटन बढ़ाने की भी बात है. इसके अलावा बीमारियों, शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में कमी लाने के साथ प्रजनन दर का भी लक्ष्य निर्धारित किया गया है. नई नीति में सरकार का ध्यान प्राथमिक स्वास्थ्य पर अपेक्षाकृत अधिक केंद्रित रहने की बात कही गई है. विशेषज्ञ इलाज के लिए निजी क्षेत्र पर भी निर्भर होने की बात भी हो रही है.

स्वास्थ्य सुविधा अधिकार नहीं

नई नीति को लेकर सबसे पहला एतराज यही जताया जा रहा है कि शिक्षा और खाद्य सुरक्षा की तरह स्वास्थ्य नागरिकों का अधिकार नहीं है. यानी किसी वजह से कोई मरीज मुफ्त इलाज और दवा की सुविधा की सुविधा से वंचित होता है तो वह इसे पाने के लिए अदालत का रुख नहीं कर पाएगा. 2015 में जारी ड्राफ्ट में इसे अधिकार की तरह देने का प्रस्ताव था लेकिन, ऐसा नहीं हुआ है. इसके अलावा जानकारों का मानना है कि साल 2017-18 के आम बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए जो बातें या घोषणाएं की गई हैं, इस नीति में उससे ज्यादा कुछ नहीं है. 2015 के ड्राफ्ट में स्वच्छ भारत सेस की तरह स्वास्थ्य सेस लगाने की भी बात कही गई है. नई नीति में इसे वापस ले लिया गया है.

स्वास्थ्य को अधिकार के रूप में नहीं देने पर केंद्र सरकार ने सफाई दी है कि राज्यों ने इस पर आपत्ति जाहिर की थी. उसके मुताबिक राज्यों का कहना था कि स्वास्थ्य क्षेत्र में बुनियादी ढांचे और संसाधनों की कमी की वजह से वे इसे अधिकार के रूप में लोगों को उपलब्ध नहीं करवा पाएंगे.

बीमार तंत्र और आधे-अधूरे संसाधन

सरकार ने नई नीति में सबको मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध करवाने की बात कही है. कल्याणकारी अर्थशास्त्र पर काम करने के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन का मानना है कि शिक्षा के साथ स्वास्थ्य भी सामाजिक विकास के लिए महत्वपूर्ण कारक है. लेकिन भारत में अधिकांश आबादी अभी भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं हासिल करने के लिए जूझ रही है और उसे अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा इलाज पर खर्च करना पड़ रहा है. रिसर्च एजेंसी अर्न्स्ट एंड यंग द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 80 फीसदी शहरी और करीब 90 फीसदी ग्रामीण नागरिक अपने सालाना घरेलू खर्च का आधे से अधिक हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कर देते हैं. इस वजह से हर साल चार फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे आ जाती है.

स्वास्थ्य क्षेत्र में पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं और मानव संसाधनों का न होना एक बड़ी समस्या है. इस चुनौती की ओर खुद पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ध्यान दिलाया था. दिसंबर, 2016 में उन्होंने कहा था कि देशभर में 24 लाख नर्सों की कमी है. राष्ट्रपति का कहना था कि देश में नर्सों की संख्या बढ़ने की जगह लगातार घट रही है. उनके मुताबिक 2009 में इनकी संख्या 16.50 लाख थी जो 2015 में घटकर 15.60 लाख रह गई. राष्ट्रपति ने सवा अरब से अधिक आबादी के लिए केवल 1.53 लाख स्वास्थ्य उपकेंद्र और 85,000 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होने पर चिंता जाहिर की थी.

जहां तक डॉक्टरों की बात है तो खुद सरकार मानती है कि देशभर में 14 लाख डॉक्टरों की कमी है. इतनी कमी होने के बावजूद हर साल केवल 5500 डॉक्टर ही तैयार हो पाते है. देश में विशेषज्ञ डॉक्टरों की 50 फीसदी से भी ज्यादा कमी है. नेशनल हेल्थ प्रोफाइल-2017 की मानें तो प्रति 10 हजार की आबादी पर एक सरकारी एलोपैथिक डॉक्टर है. इसके अलावा देश में स्थित कुल एलोपैथिक डॉक्टरों में से केवल 10 फीसदी ही सरकारी स्वास्थ्य सेवा में नियुक्त हैं. दूसरी ओर, आयुष डॉक्टरों की संख्या केवल 7, 71,468 है. साल 2016 में जारी विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट कहती है कि भारत में खुद को एलोपैथिक डॉक्टर बताने वालों में से एक-तिहाई केवल 12वीं पास हैं. साथ ही, 57 फीसदी डॉक्टरों ने कोई मेडिकल डिग्री हासिल नहीं की है.

दूसरी ओर, ग्रामीण इलाकों में तो विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी यह आंकड़ा 82 फीसदी तक पहुंच जाता है. देश के छह लाख से अधिक गांवों की बात करें तो यहां पांच में से सिर्फ एक डॉक्टर ही ऐसा है जिसके पास प्रैक्टिस करने लिए निर्धारित योग्यता है. बताया जाता है कि देश में करीब सात लाख डॉक्टरों की और जरूरत है लेकिन, मेडिकल शैक्षणिक संस्थानों से प्रतिवर्ष केवल 30,000 डॉक्टर ही निकल पाते हैं. इन आंकड़ों से समझा जा सकता है कि सरकार ने जो मुफ्त इलाज की सुविधा देने की बात कही है, उसे हासिल करना कितना मुश्किल है.

उधर, राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने अपने अभिभाषण में कहा है कि केंद्र ने डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए एमबीबीएस की 13,000 तथा पोस्ट ग्रेजुएट की 7,000 से अधिक सीटों को मंजूरी दी है. हालांकि, जानकारों का मानना है कि देश में डॉक्टरों की भारी कमी को देखते हुए यह संख्या ऊंट के मुंह में जीरे जैसी है. साथ ही, राष्ट्रपति ने चिकित्सा शिक्षा में गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक’ को भी उम्मीद भरी नजरों से देखा है.

मुफ्त दवा कितनी कारगर?

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 में जरूरतमंद लोगों को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवा देने की बात शामिल है. अर्न्स्ट एंड यंग के मुताबिक भारत में मरीजों को इलाज पर कुल खर्च का 70 फीसदी से अधिक हिस्सा दवाइयों पर खर्च करना पड़ता है. यदि सरकार लोगों को मुफ्त दवा देने में सफल हो जाती है तो यह मरीजों के लिए बहुत बड़ी राहत मिलेगी.

हालांकि, मुफ्त दवा के साथ इसकी गुणवत्ता भी मायने रखती है. 2017 केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक सर्वे में यह बात सामने आई कि सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली 10 फीसदी दवाइयां घटिया किस्म की होती हैं. इस सर्वे रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई कि मेडिकल स्टोरों में मिलने वाली तीन फीसदी दवाओं की गुणवत्ता खराब है. इसके अलावा 0.023 फीसदी दवाएं नकली पाई गईं. सर्वे कराने वाली स्वायत्त संस्था ने सरकार को दवा खरीदने की प्रक्रिया पर फिर से विचार करने का सुझाव दिया है. साथ ही, बीते साल नवंबर में देश के कई राज्यों की दवा नियामक संस्थाओं ने 18 बड़ी कंपनियों की 27 दवाइयों की गुणवत्ता को मानक स्तर से कमतर आंका था. इन कंपनियों में एबॉट इंडिया, जीएसके इंडिया, सन फार्मा, सिप्ला और ग्लेनमार्क फार्मा शामिल हैं. दवा क्षेत्र में अलग-अलग वर्गों में शीर्ष आठ कंपनियों की हिस्सेदारी 47 से 92 फीसदी तक है.

निजी क्षेत्र को बिना नियमन तंत्र के बढ़ावा देना कितना सही?

नई स्वास्थ्य नीति में कहा गया है कि विशेषज्ञ और शीर्षस्तरीय इलाज में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाया जाएगा. सरकारी अस्पताल में इसकी सुविधा न होने पर लोगों को विशेषज्ञ इलाज के लिए निजी अस्पताल जाने की भी बात कही गई है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत निजी अस्पतालों को इसके लिए तय रकम देने का प्रावधान शामिल है.

स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी दवा कंपनियों और अस्पतालों की भूमिका पर नजर रखने वाले जानकार बताते हैं कि पर्याप्त सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने का कदम ठीक है. लेकिन इसके साथ ही वे इस पर नियमन की भी जरूरत बताते हैं.

नियमन क्यों जरूरी है, इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है. देश में एक सिरिंज बनाने की लागत दो रु आती है. लेकिन एक मरीज को इसकी पांच गुना तक ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है. कई रिपोर्टें बताती हैं कि मरीजों से दवा अधिकांश दवा कंपनियां लागत की तुलना में औसतन तीन गुना तक ज्यादा पैसे वसूलती हैं. बीते साल नवंबर में हरियाणा के गुरुग्राम (गुड़गांव) स्थित फोर्टिस अस्पातल ने एक साल साल की बच्ची आद्या सिंह के डेंगू के इलाज के लिए उसके परिवार को 18 लाख रुपये का बिल थमाया था. इसके बावजूद बच्ची की जान नहीं बच पाई थी. इसके बाद देश के कई बड़े अस्पतालों का नाम इस मरीज के परिजनों के जेब काटने के मामले में सामने आ चुका है.

जानकारों का कहना है कि नियमन तंत्र के बिना निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना सरकारी धन की लूट की एक बड़ी वजह बन सकता है, बिहार में कुछ साल पहले स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत सामने आया भ्रष्टाचार का मामला भी इसकी पुष्टि करता है. इस मामले में कागजों पर पुरुषों के भी ‘गर्भाशय’ का ऑपरेशन कर सरकारी पैसे को चूना लगाने की बात सामने आई थी.

साल 2016 में आई स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट बताती है कि भारतीय, सरकारी अस्पतालों की तुलना में निजी अस्पतालों पर आठ गुना अधिक खर्च करते हैं. 2013-14 में लोगों ने सरकारी अस्पतालों पर 8,193 और निजी अस्पतालों पर 64,628 करोड़ रुपये खर्च किए. जानकारों के मुताबिक सरकार को निजी और सरकारी क्षेत्र पर खर्च की जा रही रकम के इस अंतर को कम करने की कोशिश भी करनी चाहिए.

सुस्त रफ्तार

नई नीति में 2025 तक चरणबद्ध तरीके से कुल जीडीपी का 2.5 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च करने का लक्ष्य हासिल करने की बात है. फिलहाल यह आंकड़ा 1.04 फीसदी ही है. साल 2012 में आंकड़ा 1.01 फीसदी था. यानी पिछले पांच वर्षों में जीडीपी में हिस्सेदारी के लिहाज से स्वास्थ्य क्षेत्र पर नहीं के बराबर बढ़ोतरी की गई. अर्न्स्ट एंड यंग का मानना है कि भारत सरकार को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) कार्यक्रम के लिए जीडीपी का चार फीसदी तक खर्च करना होगा. लेकिन इस मामले में प्रगति की रफ्तार जितनी धीमी है उसे देखते हुए बहुत से जानकारों को संदेह है कि 2025 में भी यह लक्ष्य हासिल हो पाएगा.