गुरुवार यानी एक फरवरी, 2018 को संसद में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली वित्त वर्ष 2018-19 का बजट पेश करेंगे. इस बजट में क्या होगा, इसके बारे में मीडिया में काफी चर्चा हो रही है. हर कोई अलग-अलग संकेतों को पकड़कर आम बजट के लिए अपने अनुमान लगा रहा है.

आम बजट से पहले सरकार के स्तर पर दो महत्वपूर्ण चीजें हर बजट सत्र में होती हैं. इनमें पहला है राष्ट्रपति का अभिभाषण. बजट सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होती है और इसमें दोनों सदनों के सदस्य को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति केंद्र सरकार की नीतियों और कार्ययोजना के बारे में बताते हैं. इसी तरह बजट सत्र में सरकार आर्थिक समीक्षा पेश करती है. इसमें अर्थव्यवस्था की सेहत का सही अंदाजा तो मिलता ही है, यह भी पता चलता है कि आर्थिक मोर्चे पर सरकार की ओर से आगे की कार्ययोजना क्या रहने वाली है.

इस लिहाज से देखें तो राष्ट्रपति के अभिभाषण और आर्थिक समीक्षा से आम बजट के लिए कुछ महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैंः

कृषि और गरीबों पर जोर

राष्ट्रपति के अभिभाषण की शुरुआत में ही भीम राव अंबेडकर का जिक्र है. राष्ट्रपति ने कहा कि राजनीतिक लोकतंत्र के लिए सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र जरूरी है. इसमें आम आदमी की जिंदगी को आसान बनाने के लिए सरकार की कोशिशों, सामाजिक न्याय और आर्थिक लोकतंत्र का जिक्र है. राष्ट्रपति ने विस्तार से किसानों, अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों का जिक्र किया है. आर्थिक समीक्षा में कृषि पर विस्तार से चर्चा है और इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़ा गया है.

इससे संकेत यह मिलता है कि अगले वित्त वर्ष के बजट में कृषि और गरीबों से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण घोषणाएं हो सकती हैं. कृषि पर ध्यान दिए जाने की राजनीतिक वजह भी है. गुजरात में भारतीय जनता पार्टी ने भले ही जैसे-तैसे सरकार बचा ली हो, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में उसे सीटें नहीं मिली हैं. इसकी वजह किसानों का गुस्सा बताया जा रहा है. ऐसे में कहा जा रहा है कि सरकार इस वर्ग को अपने पाले में लाने के लिए कुछ लोकलुभावन घोषणाएं कर सकती है.

अल्पसंख्यकों पर ध्यान

भाजपा, उसके सहयोगी संगठनों और उनके समर्थकों द्वारा अल्पसंख्यक विरोधी माहौल बनाने की चाहे जितनी भी कोशिशें हो रही हों लेकिन सरकार के स्तर पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों की महिलाओं को अपने पाले में लाने की कोशिश हो रही है. तीन तलाक के मसले का जिक्र राष्ट्रपति के अभिभाषण में है. राष्ट्रपति ने उम्मीद जाहिर की है कि इसे आपराधिक बनाने से संबंधित विधेयक पारित कराने में सभी दल साथ देंगे. पिछले साल हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा के कुछ रणनीतिकारों ने यह दावा किया था कि भाजपा का रुख तीन तलाक के खिलाफ होने की वजह से कुछ मुस्लिम महिलाओं ने पार्टी को वोट दिया. तीन तलाक पर केंद्र सरकार की सक्रियता को कई जानकार अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति के तौर पर देखते हैं.

आर्थिक समीक्षा में जहां लैंगिक भेदभाव की चर्चा की गई है, वहां तीन तलाक का भी विषय आया है. राष्ट्रपति ने भी अपने अभिभाषण में तीन तलाक के अलावा मुस्लिम महिलाओं को अकेले हज पर जाने की अनुमति और इस वर्ग के लिए चलाई जा रही कौशल विकास योजनाओं का भी जिक्र किया है. ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि बजट में अल्पसंख्यकों और खास तौर पर मुस्लिम महिलाओं के लिए कुछ योजनाओं की घोषणा हो.

महिला सशक्तिकरण

महिला सशक्तिकरण पर भी राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में कई बातों का उल्लेख किया. उन्होंने इसके लिए सरकार की ओर से चल रही योजनाओं का जिक्र किया. राष्ट्र के विकास के लिए महिलाओं की भागीदारी के महत्व पर उन्होंने बोला. ऐसे ही आर्थिक समीक्षा में इस बार महिलाओं से जुड़े मुद्दों को काफी तरजीह दी गई. समीक्षा का थीम कलर इस बार गुलाबी है. वित्त मंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार और समीक्षा तैयार करने वाले अरविंद सुब्रमण्यम की ओर से बताया गया है कि महिलाओं के मुद्दों के प्रति जागरूकता लाने के मकसद से ऐसा किया गया. इसके अलावा समीक्षा में एक अध्याय अलग से है जिसमें विस्तार से यह बताया गया है कि कैसे लोग अब भी बेटी की जगह बेटा की इच्छा रखते हैं.

इन संकेतों के आधार पर ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि सरकार इस बार महिला सशक्तिकरण की दिशा में कुछ और महत्वपूर्ण घोषणाएं करेगी. वह महिलाओं के कौशल विकास, रोजगार और पढ़ाई से जुड़ी कुछ घोषणाएं कर सकती है. कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि कामकाजी महिलाओं के लिए प्रत्यक्ष कर में भी कुछ राहत की घोषणा हो सकती है.

आर्थिक प्रबंधन के उपाय

आर्थिक समीक्षा में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि अगला वित्त वर्ष यानी 2018-19 आर्थिक प्रबंधन के लिहाज से एक चुनौतीपूर्ण साल साबित हो सकता है. इसके पीछे वजह बताते हुए समीक्षा में यह कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं. बताया गया है कि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 10 डाॅलर की बढ़ोतरी होने से भारत की विकास दर में तकरीबन 0.3 फीसदी की कमी आती है. 2015-16 और 2016-17 में भारत ने जो कच्चा तेल आयात किया है, उसकी कीमत औसतन 46-47 डाॅलर प्रति बैरल थी. लेकिन अब यह 70 डाॅलर के आसपास है. इसका मतलब यह हुआ कि जीडीपी में तकरीबन 0.6 फीसदी की कमी कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से हो सकती है. कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर महंगाई से लेकर अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ता है.

ऐसे में सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह बेहतर आर्थिक प्रबंधन कैसे करे. क्योंकि अगर वह एनके सिंह समिति की सिफारिशों की हिसाब से वित्तीय घाटा कम करने के लिए सामाजिक क्षेत्रों पर खर्च कम करती है तो मतदाताओं के नाराज होने की आशंका है. अगर ऐसा नहीं करती है तो सरकार की माली हालत खराब होगी. ऐसे में यह उम्मीद की जा रही है कि सरकार बजट में आर्थिक प्रबंधन के मोर्चे पर कुछ नए उपायों की घोषणा कर सकती है.

कर स्लैब में बदलाव के बजाए मामूली हेरफेर

कृषि और अन्य सामाजिक विकास कार्यों में बजट बढ़ने का संकेत राष्ट्रपति के अभिभाषण से भी मिल रहा है और आर्थिक समीक्षा से भी. लोगों को उम्मीद तो यह भी है कि कर स्लैब में बदलाव हो. लेकिन आर्थिक प्रबंधन के मोर्चे पर सरकार की मुश्किलों को देखते हुए कर स्लैब में स्थाई बदलाव के संकेत आर्थिक समीक्षा से नहीं मिल रहे. अगर सरकार सामाजिक विकास पर अपने खर्च बढ़ाती है तो वैसे भी उसके पास आयकर में कोई बड़ी छूट देने का विकल्प नहीं बचता. खास तौर पर ऐसे माहौल में जब वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी से कर संग्रहण उम्मीद के मुताबिक नहीं हो रहा हो और न ही विनिवेश के मोर्चे पर सरकार को खास सफलता मिल रही हो.

लेकिन मध्य वर्ग के दबाव को देखते हुए कर स्लैब में मामूली हेरफेर की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. आर्थिक समीक्षा में भी कहा गया है कि नोटबंदी और जीएसटी की वजह से आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या बढ़ी है लेकिन इनमें से अधिकांश 2.5 लाख रुपये सालाना आमदनी के आसपास वाले हैं. इस लिहाज से भी देखें तो इसकी उम्मीद बनती है कि सरकार आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या बढ़ाने के लिए आयकर में कोई मामूली छूट का प्रावधान करे. एक विकल्प यह भी है कि 80सी के तहत जिस 1.5 लाख रुपये पर आयकर छूट है, उसकी सीमा बढ़ाकर सरकार दो लाख रुपये कर दे. इसकी संभावना इसलिए भी अधिक दिख रही है कि आर्थिक समीक्षा में भी कहा गया है कि आर्थिक विकास को बनाए रखने में निवेश की बड़ी भूमिका है.