प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और संघ प्रमुख मोहन भागवत की चिंता बढ़ाने वाली खबर घर के अंदर से ही आई है. भाजपा के अंदर से ही एक बागी खेमा उठकर खड़ा हो गया है जिसे पार्टी के अंदर और बाहर दोनों तरफ से समर्थन है. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने ‘राष्ट्र मंच’ के नाम से जो संस्था बनाई है वह ऊपर से गैर राजनीतिक दिखती है, लेकिन है पूरी तरह सियासी. इस कदम को उठाने से पहले यशवंत सिन्हा ने पूरी तैयारी की थी और अब वे पीछे लौटने वाले नहीं हैं. वे लगातार विपक्ष के ताकतवर नेताओं के संपर्क में हैं और भाजपा और संघ के कुछ महत्वपूर्ण नेताओं का भी अघोषित समर्थन उन्हें मिला हुआ है.

ऐसा नहीं है कि मोदी-शाह और मोहन भागवत इससे अनजान थे. वे सब जानते थे, फिर भी यशवंत सिन्हा को रोक नहीं पाए. समस्या सिर्फ यशवंत सिन्हा नहीं हैं, अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा उनके छोटे भाई की तरह हैं. शत्रुघ्न के करीबी स्टाफ की मानें तो सियासत में अगर ‘शत्रु’ किसी की बात सबसे ज्यादा सुनते हैं तो वह हैं उनके ‘बड़े भाई’ यशवंत सिन्हा. एक वक्त था जब शत्रुघ्न और यशवंत दोनों आडवाणी कैंप के नेता माने जाते थे. जब आडवाणी हाशिए पर चले गए तो दोनों ने नरेंद्र मोदी का भी समर्थन किया.

बिहार के कुछ नेता अब भी इन दोनों के बेहद करीब हैं. उन्हीं में से एक बताते हैं कि यशवंत सिन्हा मोदी सरकार में वित्त मंत्री बनना चाहते थे और शत्रुघ्न मंत्री. लेकिन दोनों को कोई पद नहीं दिया गया. इसके बाद यशवंत को राज्यपाल का पद ऑफर किया गया, राजनीति से रिटायर होकर राजभवन जाने की सलाह दी गई. उन्होंने अपने बेटे को मंत्री बनवा दिया और खुद सियासत से दूर चले गए. फिर नीति आयोग में उनकी वापसी की चर्चा शुरू हुई. लेकिन यशवंत सिन्हा के पास प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन नहीं आया.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि पिछले दो साल में यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा दोनों ने प्रधानमंत्री कार्यालय से मुलाकात के लिए कई बार वक्त मांगा. लेकिन जब सीधे तरीके से उनकी बात नहीं सुनी गई तो दोनों ही ने अपनी भाषा और तरीका बदल दिया. इसके बाद से यशवंत सिन्हा अपनी ही सरकार के खिलाफ महाराष्ट्र से लेकर झारखंड तक धरना देते और भूख हड़ताल पर बैठे दिखे. और शत्रुघ्न ने भी ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ा जिसमें वे मोदी सरकार की कमियां निकाल सकते थे.

अब तैयारी 2019 के चुनाव की है. यशवंत और शत्रुघ्न का मोर्चा अब घर के अंदर रहकर ही सीधे-सीधे प्रधानमंत्री और अमित शाह पर हमला करेगा. भाजपा में चर्चा है कि दोनों सिन्हा चाहते हैं कि बात इतनी बढ़े, हमला इतना तेज़ हो कि पार्टी उन्हें निकाल दे और फिर वे ‘शहीद’ की तरह भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार करें. शत्रुघ्न सिन्हा तब पार्टी में आए जब नरेंद्र मोदी का नाम गुजरात से और अमित शाह का अहमदाबाद से बाहर कोई नहीं जानता था. इतने पुराने नेताओं को पार्टी से निकालना हर लिहाज से घाटे का सौदा है. इसलिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने फिलहाल छोटे नेताओं को सख्त निर्देश दिया है कि वे किसी भी सूरत में यशवंत और शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ बयानबाजी नहीं करें. लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं कि सिन्हा बंधुओं को नज़रअंदाज़ कर दिया जाएगा. बस सही समय का इंतजार किया जाएगा जैसा अब तक किया जा रहा है.

सुनी-सुनाई है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी इन दोनों नेताओं से कई बार संपर्क किया और यशवंत सिन्हा को राज्यसभा भेजने का ऑफर दिया था. लेकिन संघ के एक प्रमुख नेता के इशारे पर यशवंत सिन्हा ने यह ऑफर ठुकरा दिया. संघ को करीब से जानने वाले एक सूत्र की मानें तो देश की सियासत में हालात कुछ वैसे बन रहे हैं जैसे 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के वक्त थे. उस वक्त भी मीडिया में इंडिया शाइनिंग का शोर था और अटल लहर का जोर माना जा रहा था. लेकिन संघ के ही एक खेमे ने स्वदेशी जागरण मंच और मजदूर संघ के नेताओं के जरिए अपनी ही सरकार के खिलाफ जबरदस्त मोर्चा खोल दिया. 2004 में तमाम भविष्यवाणियों के बावजूद अटल सरकार गिर गई और सोनिया गांधी ने कांग्रेस को सत्ता दिला दी.

इस बार भी बात गांव, गरीब और किसान की हो रही है. भाजपा से नाराज़ चल रहे नेता आजकल यह कहते सुनाई देते हैं कि 2004 में भाजपा अपने घर में लगी आग को बुझा नहीं पाई और लहर के भरोसे मैदान में उतर गई. अगर इस बार भी घर की आग नहीं बुझी तो बाज़ी पलट सकती है. आग बुझाना आसान नहीं है क्योंकि जिन्हें आग बुझानी है उन्हीं में से कुछ नेता चाहते हैं कि यह जलती रहे.