उत्तरी सीरिया के कुर्दों की ‘वाईपीजी’ मिलिशिया के विरुद्ध अपने अभियान का तुर्की अब और अधिक विस्तार करने जा रहा है. 19 जनवरी को शुरू हुए इस सैन्य अभियान के पहले सप्ताह में तुर्की को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पायी, हालांकि वह इसे खुलकर स्वीकार नहीं करता. तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने 27 जनवरी को कहा कि उनकी सेना, तुर्की की सीमा के पास के अफ़रीन इलाके में प्रवेश करने के बाद, अब उससे दक्षिण में पड़ने वाले सीरियाई प्रदेश इदलिब की तरफ़ आगे बढ़ेगी.

अफ़रीन में सीरिया के कुर्द अल्पसंख्यकों का बहुमत है. 2015 में वहां की जनसंख्या क़रीब सात लाख थी, जो इस बीच सिकुड़ कर अनुमानतः तीन लाख रह गई बताई जाती है. अफ़रीन में अमेरिका का समर्थन प्राप्त उन सीरियायी कुर्दों का स्वायत्त शासन है, जिनकी ‘वाईपीजी’ मिलिशिया ने स्वघोषित ख़लीफ़ा अल बगदादी के ‘इस्लामी स्टेट’ (आईएस) के लड़ाकों को उनकी राजधानी राक्का से खदेड़ बहर कर दिया.

तुर्क सैनिकों के साथ इस्लामी जिहादी भी हैं

अफ़रीन के दक्षिण में स्थित इदलिब सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के विरुद्ध लड़ रहे विद्रोहियों के अब भी नियंत्रण में है. ये विद्रोही राष्ट्रपति असद के साथ-साथ कुर्दों के भी विरोधी हैं और तुर्की का साथ दे रहे हैं. तुर्की के सैनिकों ने 19 जनवरी को अकेले ही नहीं, बल्कि अपने आप को ‘’फ्री सीरियन आर्मी’’ (एफ़एसए) कहने वाले अरब और इस्लामी विद्रोहियों के सहयोग से अफ़रीन पर आक्रमण शुरू किया.

तुर्की के कुछ सैनिक पहले से ही इदलिब में मौजूद हैं. वहां उन्हें तुर्की, रूस और ईरान के बीच हुई एक सहमति के तहत एक ऐसे तथाकथित ‘सुरक्षा-ज़ोन’ की निगरानी के लिए भेजा गया है, जो राष्ट्रपति असद के सैनिकों और उनका विरोध कर रहे विद्रोहियों को एक-दूसरे से अलग रखने के लिए बनाया गया है. रूस ने इस बीच उन जगहों से अपने सैनिक हटा लिये हैं, जो कुर्दों के स्वायत्तशासी इलाकों में पड़ते हैं और जहां अब किसी भी समय तुर्की के सैनिक और उनका साथ दे रहे सीरियाई अरबों के ‘एफ़एसए’ लड़ाके पहुंच सकते हैं.

कुर्दों से मिली हार का बदला

बताया जाता है कि इन अरब और इस्लामी लड़ाकों के भेस में अल बगदादी वाले ‘इस्लामी स्टेट’ या ‘अल नुसरा फ्रंट’ के भी कई जिहादी तुर्की का साथ देते हुए कुर्दों से अपनी हार का बदला ले रहे हैं. सीरिया में मानवाधिकारों की खोज-ख़बर रखने वाली लंदन स्थित संस्था का कहना है कि अफ़रीन पर तुर्की के आक्रमण के बाद से, रविवार 28 जनवरी तक, कुर्दों की ‘वाईपीजी’ मिलिशिया के 59 लड़ाके, तुर्की के सात सैनिक और तुर्की की ओर से लड़ रही ‘’फ्री सीरियन आर्मी’’ (एफ़एसए) के 69 लड़ाके मारे गये थे. तुर्की का कहना है कि उसके साझे अभियान को 20 जानों का नुकसान उठाना पड़ा है, जबकि शत्रुपक्ष के 343 लोगों को ‘निष्क्रिय’ कर दिया गया है.

तटस्थ प्रेक्षकों का कहना है कि तुर्की की सेना और उसका साथ दे रहे अरब-इस्लामी लड़ाकों को अफ़रीन में ऐसे प्रबल प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है कि वे कुछेक किलोमीटर से अधिक आगे नहीं बढ़ पाये हैं. ऐसे में तुर्की के राष्ट्रपति का यह कहना कि उनके सैनिक इदलिब से भी आगे बढ़ते हुए अफ़रीन से क़रीब 95 किलोमीटर पूर्व में पड़ने वाले मनबीज तक, और अंततः ‘इराक़ी सीमा तक आगे बढ़ते रहेंगे’ कुछ ज़्यादा ही डींग हांकने जैसा है.

जब तुर्क और अमेरिकी सैनिकों का सामना होगा

मनबीज में ही वे अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जो कुर्दों की ‘वाईपीजी’ मिलिशिया को हथियार और प्रशिक्षण देने के लिए भेजे गये हैं. सबके मन में अब यही प्रश्न है कि मनबीज में जब नाटो सैन्य संगठन की सबसे बड़ी सेना के अमेरिकी सैनिक और नाटों की दूसरी बड़ी सेना के तुर्क सैनिक आमने-सामने होंगे, तब क्या होगा? क्या वे एक-दूसरे पर गोली चलायेंगे? संभवतः नहीं.

अमेरिकी सरकार के प्रवक्ताओं ने हालांकि कई बार कहा है कि अमेरिका मनबीज से अपने सैनिक हटाने या ‘वाईपीजी’ के साथ सहयोग भंग कर देने की नहीं सोच रहा. पर यह सब बहुत मंद स्वर में कहा गया है, अमेरिका ने तुर्की के सरासर अवैध सैन्य अभियान पर कोई टीका-टिप्पणी करने से अब तक जिस तरह बचने में ही समय बिताया है, उसे देखते हुए ऐसा लगता नहीं कि वह भाग्य के मारे उन कुर्दों के लिए तुर्की के विरुद्ध हथियार उठाने की भलमनसाहत दिखायेगा, जिनके ‘कुर्दिस्तान’ वाले सपने के प्रति उसे कभी सहानुभूति नहीं रही, बल्कि उसका विरोध ही किया!

कथनी आदर्शवादी, करनी पाखंडी

अपनी कथनी में अमेरिका जितना आदर्शवादी दिखता है, करनी में उतना ही ढोंगी निकलता है. सीरियाई कुर्दों को आज लग रहा है कि अमेरिका ने उन्हें धोखा दिया. उन्हें ठगा. अपने सैनिकों की जान बचाने के लिए अल बगदादी के दुर्दांत जिहादियों से कुर्दों को लड़ा दिया. बगदादी के जल्लादों को जहन्नुम में पहुंचाने को लिए हज़ारों कुर्दों ने अपने प्राणों की बलि दे दी. लेकिन आज, जब उसी अल बगदादी के जिहादियों को पालने-पोसने और उनकी दवा दारू करने वाले एर्दोआन की सेना ने, बिना किसी उकसावे के, उत्तरी सीरिया के कुर्दों पर गोले और बम बरसाना शुरू कर दिया है, तो अमेरिका की बोलती बंद है. 27 जनवरी को तुर्की के बड़बोले राष्ट्रपति एर्दोआन और अमेरिका के मुंहफट राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच टेलीफ़ोन पर बातचीत हुई, पर ऐसा कुछ सुनने में नहीं आया है कि ट्रंप ने एर्दोआन से ‘संयम बरतने’ से अधिक कुछ कहा हो.

पश्चिम का दोगलापन

अमेरिका ही नहीं, यूरोप सहित पूरा पश्चिमी जगत, जिसने अन्यथा दुनिया भर में हर जगह मानवाधिकारों की रक्षा का ठेका ले रखा है, तुर्की द्वारा उत्तरी सीरिया के कुर्दों पर हमले और वहां के रिहायशी घरों पर भी बम गिराए जाने को, बिना किसी निंदा के, ‘चिंताजनक’ बता कर चुप हो जाता है. कुर्दों के नेतृत्व में बने सीरिया के विपक्षी गुटों के संघ ‘सीरियन डेमोक्रेटिक काउन्सिल’ (एसडीसी) के सह-अध्यक्ष इलहाम एहमेद ने आरोप लगाया है कि ‘तुर्की अफ़रीन के नागरिकों पर, लंबे समय से विश्व भर में प्रतिबंधित, नापाम बम भी बरसा रहा है.’

नापाम बमों से भीषण आग लगती है, इस कारण युद्ध में उनके प्रयोग पर प्रतिबंध लग गया है. तब भी बर्लिन के पत्रकारों से जर्मन सरकार की महिला प्रवक्ता ने 24 जनवरी को कहा कि ‘सीरिया के साथ वाली सीमा पर तुर्की के न्यायसंगत सुरक्षा-हित हैं... उसे आतमरक्षा का पूरा अधिकार है.’

ऐसा कहना कुछ इसी तरह है, मानो सीरिया में रहने वाले कुर्दों ने तुर्की की सीमा का अतिक्रमण कर उसे ललकारा है. तुर्क सेना इस ललकार का मात्र जवाब दे रही है. सभी जानते हैं कि अभी कुछ ही महीने पहले तक अल बगदादी की ख़लीफ़त से लड़ रहे सीरियाई कुर्द इस हालत में कभी नहीं हो सकते की तुर्की से टकराने की आत्मघाती मूर्खता करें.

जर्मनी द्वारा तुर्की का तुष्टीकरण

जर्मनी खुद तुर्की के राष्ट्रपति की विचित्र सनकों और उनके अपशब्दों के बार-बार निशाने पर रहा है, पर तुर्की का तुष्टीकरण करने में फिर भी वह सबसे आगे ही रहता है! 27 जनवरी को जर्मनी के कोलोन शहर में दो हज़ार पुलिसकर्मियों के घेरे में रह कर क़रीब 20 हजार कुर्दों ने तुर्की के सैन्य अभियान के विरोध में शांतिमय प्रदर्शन किया. कुछ प्रदर्शनकारियों ने तुर्की की एक जेल में बंद कुर्द नेता औएचलान के फ़ोटो वाली जैसे ही कुछ तख्तियां दिखायीं, पुलिस ने तुरंत प्रदर्शन भंग कर दिया. तुर्की के समान जर्मनी ने भी औएचलान की पार्टी ‘पीकेके’ पर प्रतिबंध लगा रखा है. जर्मनी में उनका फ़ोटो तक दिखाना मना है.

तुर्की के तुष्टीकरण का सबसे बड़ा उदाहरण तो यह है कि तुर्की के सैनिकों ने जिन टैंकों में बैठ कर सीरिया की तरफ़ कूच किया, वे जर्मनी से मिले, विश्व के सबसे उत्कृष्ट टैंकों में गिने जाने वाले ‘लेओपार्ड-2’ नाम के टैंक हैं. जर्मनी ने तुर्की को अब तक 354 ‘लेओपार्ड-2’ बेचे हैं. जर्मनी ने तुर्की को अन्य प्रकार के जो टैंक बेचे हैं, उनकी कुल संख्या भी करीब 750 तक पहुंचती है.

कुर्दों को बलि का बकरा बनाया

जर्मनी की ही तरह तुर्की भी अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो सैन्य संगठन का सदस्य है, इसलिए जर्मनी ने इन युद्धक टैंकों के उपयोग के बारे में ऐसी कोई शर्त नहीं लगायी है कि उनका किसके खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है और किसके खिलाफ नहीं. यानी तुर्की, जर्मन टैंकों के माध्यम से सीरिया के उन कुर्दों का सफ़ाया करने के लिए स्वतंत्र है, जिन्होंने ‘आईएस’ के कई ऐसे जर्मन जिहादियों को भी परलोक पहुंचाया होगा, जो कभी जर्मनी लौट कर अपने आतंकवादी हमलों से जर्मन जनता का भी ख़ून बहाते! शर्म की बात है कि लोकतंत्र और आत्मनिर्णय के अधिकारों जैसे मुद्दों पर अपनी सिद्धांत-प्रियता की शेखी बघारने वाले जर्मनी को जिन कुर्दों का आभारी होना चाहिये, अमेरिका की तरह उसे भी उन्हें बलि का बकरा बनाने में कोई संकोच नहीं है.

यही नहीं, सीरियाई कुर्दों के विरुद्ध तुर्की का अभियान शुरू होने के सप्ताह-भर पहले जर्मनी उसे बेचे गये अपने टैंकों को और अधिक मज़बूती देने की तुर्की की एक कामना पूरी करने का मन भी बना चुका था. बदले में तुर्की अपने यहां मनमाने ठंग से गिरफ्तार एक तुर्कवंशी जर्मन पत्रकार और कुछ अन्य जर्मन नागरिकों को रिहा कर देता.

टैंकों के बदले रिहाई का सौदा

तुर्की के विदेशमंत्री ने जर्मन विदेशमंत्री के निजी निवास पर जा कर यह सौदा पटाया था. सौदे पर स्वीकृति की मुहर बस लगने ही वाली थी कि तुर्की के राष्ट्रपति ने सीरियाई कुर्दों का ‘सफ़ाया’ कर देने का बिगुल बजा दिया. सकते में आ गयी जर्मन सरकार को खीसें निपोर कर अपना निर्णय टालना पड़ गया! इस सारे नाटक से कुछ ही पहले, बिना किसी अभियोगपत्र और अदालती सुनवाई के एक वर्ष से जेल में बंद, पत्रकार डेनिस युइज़ेल ने एक इंटरव्यू में कहा कि अपनी रिहाई के आदेशपत्र पर वे किसी के ख़ून के छींटे नहीं देखना चाहते. इससे तो अच्छा है कि उन्हें रिहाई मिले ही नहीं!

इस बीच कुर्दों के प्रति तुर्की में घृणा-प्रचार कुछ वैसे ही रंग लेता जा रहा है, जैसा हिटलर के समय पूरे यूरोप से यहूदियों का सफ़ाया कर देने का घृणा-प्रचार हुआ करता था. तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन की पार्टी ‘एकेपी’ के एक प्रमुख नेता व संसद-अध्यक्ष इस्माइल काहरामन ने कुर्दों के विरुद्ध तुर्की के सैन्य अभियान को ‘जिहाद’ बता कर उसे धर्मयुद्ध का दर्जा दे दिया है.

अफ़रीनवासियों का क्रंदन

काहरामन के इस कथन से 120 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले अफ़रीन में रह रहे क़रीब 20 हज़ार यज़ीदियों और कई हज़ार ईसाइयों के बीच भी खलबली मच गयी है. वे सोच रहे थे कि अल बगदादी के अभी-अभी समाप्त हुए ‘जिहाद’ के बाद वे अफ़रीन में अब शांतिपूर्वक रह सकेंगे. पर अब उन्हें यह डर सता रहा है कि इसके पहले कि वे चैन की सांस ले पाते, एर्दोआन के तुर्क जिहादी उनके सीने पर सवार हो जायेंगे. विवश होकर कुर्दों के साथ उन्होंने भी सीरिया की सरकार से अनुरोध किया है कि सीरिया की सीमाओं की तुर्की के आक्रमण से रक्षा के काम में उनकी मदद की जाये.

कहने की आवश्यकता नहीं कि सीरिया की पहले से ही थकी-हारी अधमरी सेना नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना से टकराने से बचना ही, न कि उससे लड़ना चाहेगी. कुर्दों ने रूस से भी सहायता की अपील की है. पर, रूस को न तो अतीत में कभी उनसे लगाव था और न अब उसे कोई दया आयेगी. तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन पिछले दो वर्षों में जिस तेज़ी से रूस के निकट सरकते गये हैं, उससे रूसी राष्ट्रपति पुतिन को लगता है कि वे तुर्की को गले लगा कर नाटो में फूट डाल सकते हैं. जहां इतने बड़ों-बड़ों की बिसात बिछी हो, वहां कुर्दों के दर्द से किसी को क्या फर्क पड़ेगा!