सोमवार को संसद में आर्थिक समीक्षा पेश होने के बाद इसे तैयार करने वाले वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और इसके विकास के बगैर देश का विकास नहीं हो सकता. वे यहीं नहीं रुके. उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया में जो भी देश आगे बढ़े हैं, वे तब ही बढ़े हैं जब उनके यहां कृषि लाभकारी हुई है. समीक्षा में भी इस बार कृषि क्षेत्र का कायाकल्प कैसे हो, इसे लेकर विस्तार से चर्चा है. राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी किसान और किसानी पर खासा जोर था.

इन सबसे यह संकेत मिल रहा था कि इस बार के बजट में केंद्रीय वित्त मंत्री किसान और किसानी के लिए कुछ महत्वपूर्ण घोषणाएं कर सकते हैं. वित्त वर्ष 2018-19 का बजट इन अपेक्षाओं के अनुरुप ही है.

कृषि पर अतिरिक्त ध्यान देना एक तरह से सरकार की राजनीतिक मजबूरी बन गई थी. पिछले एक साल में देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान आंदोलन हुए. कई जगह हिंसा भड़की. इनमें से अधिकांश आंदोलन भाजपा शासित प्रदेशों में हुए. इस आधार पर यह कहा जा रहा है कि देश के किसान भाजपा, केंद्र सरकार और राज्य की भाजपा सरकारों से नाराज हैं. गुजरात में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए जो मुश्किलें पैदा हुईं, उसके लिए भी किसानों और गांवों में रहने वाले लोगों के गुस्से को ही प्रमुख वजह बताया गया. राज्य के ग्रामीण इलाकों में भाजपा को अपेक्षाकृत कम सीटें मिलीं.

इस साल आठ राज्यों में चुनाव होने हैं और अगले आम चुनाव भी दूर नहीं हैं. अगर इस साल चुनाव में जाने वाले राज्यों में से मध्य प्रदेश की बात करें तो कृषि क्षेत्र में शिवराज सिंह चौहान सरकार के कामकाज का प्रचार केंद्र सरकार खूब करती रही है. लेकिन कुछ समय पहले यहां के किसान भी उग्र आंदोलन कर चुके हैं. अगर यहां के किसानों की नाराजगी और बढ़ती है तो इसकी व्याख्या भाजपा के कृषि विकास माॅडल के नाकाम होने के तौर पर भी की जाएगी. ऐसे में आम बजट के बारे में सभी को उम्मीद थी कि इसमें कृषि पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.

अपने बजट भाषण की शुरुआत अर्थव्यवस्था से जुड़े बुनियादी आंकड़ों से करने के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली थोड़ी ही देर में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आ गए. उन्होंने एक बार फिर से दोहराया कि केंद्र सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए प्रतिबद्ध है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्होंने कई योजनाओं की घोषणा की. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार कृषि को एक उद्यम के तौर पर विकसित करना चाहती है. जेटली ने यह भी कहा कि कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए उनकी सरकार जरूरी व्यवस्थाएं सुनिश्चित करेगी.

वित्त मंत्री ने 2200 ग्रामीण हाटों को ग्रामीण कृषि बाजार के तौर पर विकसित करने की बात भी कही. सरकार को लगता है कि ऐसा करने से कृषि उत्पादों को बेहतर बाजार और कीमत मिल पाएगी. जेटली ने यह घोषणा भी की कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बेहतर ग्रामीण सड़कें बनाकर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कृषि उत्पादों को बेहतर बाजार मिल सके. पशुपालन को बढ़ावा देने वाले प्रावधानों की घोषणा के साथ-साथ उन्होंने आर्गेनिक खेती के प्रसार के लिए जरूरी आवंटन की घोषणा भी की.

जेटली ने कहा कि केंद्र सरकार किसानों को उनके उत्पाद के लिए लागत से 50 फीसदी अधिक मूल्य देने के लिए प्रतिबद्ध है. उन्होंने कुछ फसलों के लिए यह मूल्य दिए जाने का दावा भी किया. हालांकि, जमीनी स्तर पर इसकी सच्चाई को लेकर कई तरह के संदेह व्यक्त किए जा रहे हैं. कृषि क्षेत्र को दिए जाने वाले कर्ज को उन्होंने 2017-18 के 10 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 2018-19 में 11 लाख करोड़ रुपये करने का लक्ष्य रखा. खाद्य प्रसंस्करण का बजट दोगुना करने की घोषणा भी वित्त मंत्री ने की.

इन प्रावधानों के जरिए केंद्र सरकार ने किसानों की नाराजगी दूर करने और उनके मन में उम्मीद जगाने की कोशिश की है. क्योंकि किसानों की बुरी स्थिति की खबरें सरकार को हर तरफ से मिल रही हैं. खुद सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि इस सरकार के अब तक के कार्यकाल में कृषि विकास दर औसतन दो फीसदी सालाना के आसपास बनी हुई है.

वित्त मंत्री की बजट घोषणाएं किसानों का गुस्सा कितना शांत कर पाएंगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इनका क्रियान्वयन कितना प्रभावी ढंग से हो पाता है. इसके क्रियान्वयन पर काफी हद तक आगामी लोकसभा चुनाव और राज्यों में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों के मुद्दे तय होंगे.