भाजपानीत मोदी सरकार ने गुरुवार को अगले साल आम चुनाव से पहले अपना आखिरी पूर्ण बजट पेश किया. माना जा रहा था कि इस बजट के जरिए सरकार मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर सकती है. केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट भाषण को देखें तो वे इसकी कोशिश करते दिखे भी. इसके लिए वे केवल कल्याणकारी योजनाओं और इनकी घोषणाओं पर ही निर्भर नहीं रहे, बल्कि उन्होंने देश के आम नागरिक की भाषा का सहारा भी लिया. पौने दो घंटे के भाषण के दौरान अरुण जेटली ने कई बार बजट दस्तावेज को हिंदी में पढ़ा. हालांकि, इस दौरान वित्त मंत्री हिंदी के कठिन शब्दों से जूझते हुए दिखे.

ऐसे में सवाल उठता दिखता है कि वित्त मंत्री को हिंदी में परेशानी के बाद भी बजट के कुछ हिस्सों को इस भाषा में पढ़ने की क्या जरूरत पड़ी थी. जानकारों के मुताबिक इसका जवाब अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि, राजनीतिक समीकरणों से निकलता हुआ दिखता है.

अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण की शुरुआत अंग्रेजी में करते हुए पिछली कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार को भ्रष्टाचार और नीति-पंगुता (पॉलिसी पैरैलिसिस) के मोर्चे पर घेरने की कोशिश की. हालांकि, कुछ देर बाद ही उनकी गाड़ी अंग्रेजी से हिंदी की पटरी पर आ गई. वित्त मंत्री ने कहा, ‘एक समय था जब भ्रष्टाचार शिष्टाचार का अंग बन गया था. आज हमारे नागरिक विशेष रूप से नवयुवक वर्ग ईमानदारी का जीवन व्यतीत करने को तत्पर हैं.’ माना जा रहा है कि इससे उन्होंने देश के बड़े तबके खासकर हिंदी पट्टी के लोगों को यूपीए सरकार के शासन के दौरान हुए घोटालों की याद दिलाने की कोशिश की. साथ ही, देश के युवा वर्ग को ईमानदार भी बताया.

जानकारों का मानना है कि अगले आम चुनाव से पहले भाजपा लगातार मतदाताओं को कांग्रेसनीत यूपीए के घोटालों वाले कार्यकाल की याद दिलाने की कोशिश करती दिखाई देगी. साथ ही, उपलब्धि के तौर पर वह अपने शासन को भ्रष्टाचार-मुक्त बताने से नहीं चूकेगी. इसके अलावा युवाओं को ईमानदार बताना, उन्हें अपनी ओर खींचने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. बताया जाता है कि साल 2014 के चुनाव में युवाओं ने बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिया था. जाहिर तौर पर इस वर्ग को भाजपा अगले चुनाव में खोना नहीं चाहेगी.

अरुण जेटली ने गरीबी और गरीबों का भी जिक्र किया. उनका कहना था, ‘देश की वर्तमान शीर्ष नेतृत्व गरीबी को बहुत करीब से देखकर गरीबी में जीकर यहां तक पहुंचा है. एससी-एसटी वर्गों की, पिछड़ों की आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की चिंताएं होती हैं, उनसे भली-भांति परिचित हैं. गरीब और मध्यम वर्ग के लिए केस स्टडी नहीं बल्कि, वे (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) खुद ही केस स्टडी हैं.’ उनका आगे कहना था, ‘पिछले तीन वर्षों से सरकार की योजनाओं का केंद्र गरीब रहा है, मध्यम वर्ग रहा है, ये सरकार गरीब की छोटी-छोटी चिंताओं और बड़ी-बड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए लगातार कोशिश करती रही है.’

वित्त मंत्री की इस बात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी जोड़ा जा सकता है जो अपनी सरकार को बार-बार गरीबों की सरकार बताते रहे हैं. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक गरीबों की बड़ी तादाद हिंदी पट्टी के राज्यों -उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड में रहती है. अब तक के चुनावी आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं कि इन राज्यों के मतदाताओं के बीच भाजपा की मजबूत पकड़ रही है. 2014 के आम चुनाव में भाजपानीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने इन राज्यों में विपक्षी दलों का करीब-करीब सफाया कर दिया था. एनडीए ने इन राज्यों की कुल 204 लोक सभा सीटों में से 184 पर जीत हासिल की थी. इनमें से 172 पर अकेले भाजपा के उम्मीदवारों ने जीत का परचम लहराया था.

जानकार बताते हैं कि इन राज्यों के मतदाताओं के लिए लोक-लुभावन योजनाओं के साथ उन्हें उनकी भाषा में संबोधित करना सरकार का एक बड़ा चुनावी दांव था. भाजपा की यह कोशिश दिखती है कि वह इन पर अपनी पकड़ बनाकर रखे, जिससे उसे 2019 में अकेले सरकार बनाने में मुश्किलों का सामना न करना पड़े. इससे पहले इस साल उसे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपनी सत्ता बचाए रखने की चुनौती का भी सामना करना है.

दूसरी ओर, कांग्रेस मोदी सरकार को अंबानी-अडानी (बड़े-बड़े कारोबारियों) की सरकार बताती रही है. इसके जवाब में अरुण जेटली ने देश के गरीबों और मध्यम वर्ग के लोगों की जिंदगी आसान बनाने के लिए ‘ईज ऑफ लीविंग’ को सामने रखा. इसके बारे में भी उन्होंने हिंदी में ही बात की. इसके अलावा महिलाओं को चूल्हे के धुएं से मुक्ति (उज्ज्वला योजना) और गरीबों को मुफ्त बिजली (सौभाग्य योजना) की बात हो या किसानों और युवाओं के लिए अलग-अलग घोषणाओं की, अरुण जेटली कई बार हिंदी के शब्दों के साथ जूझते हुए दिखे गए. वित्त मंत्री के इन शब्दों से इस समझा जा सकता है, ‘गरीब की चिंता रही है कि सिर के ऊपर एक अदद छत की. भ्रष्टाचार करते बईमानी करके जुटाई गई संपत्ति से दूर गरीब को ईमानदारी की कमाई से बस एक छोटा सा छत-एक छोटा से मकान चाहता है. गरीब अपने घर का सपना पूरा कर सके, इसके लिए हमारी सरकार उसकी पूरी मदद कर रही है.’

अरुण जेटली अपने बजट भाषण में ऐसे वाक्यों भी का इस्तेमाल करते दिखे, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी चुनावी रैलियों में करते हुए दिखाई देते हैं. उदाहरण के लिए, किफायती दरों पर आम लोगों के लिए हवाई सेवा (उड़ान योजना) का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘सरकार की इस पहल (उड़ान) से हवाई चप्पल पहनने वाले नागरिक भी हवाई जहाज से यात्रा कर सकते हैं.’ साथ ही, सौभाग्य योजना की चर्चा करते हुए भी जब उन्होंने घर में बिजली की गैर-मौजूदगी का जिक्र किया तो इसमें भी नरेंद्र मोदी की शैली साफ-साफ नजर आई. अरुण जेटली ने इस बारे में कहा, ‘घर का (में) एक घंटा बिजली न हो तो हम लोग इधर-उधर दौड़ने लगते हैं. टीवी कैसे चलेगा, मोबाइल कैसे चार्ज होगा, लैपटॉप का क्या होगा?’

भाजपा की चुनावी रणनीति और कार्यशैली पर नजर रखने वाले जानकारों का मानना रहा है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी देश के करीब 85 करोड़ मतदाताओं को उनकी ही भाषा में संबोधित करने के मोर्चे पर विपक्षी दलों के मुकाबले कहीं आगे दिखती है. इनमें अधिकतर मतदाता गरीब और किसान वर्ग से आते हैं और इनमें से ज्यादातर का संबंध हिंदी पट्टी के राज्यों से है. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक भाजपा अगले चुनाव में पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत में चुनौतियों को देखते हुए इन राज्यों में अपनी पकड़ में किसी तरह की ढील देने का जोखिम नहीं उठा सकती. साथ ही, इसके लिए मोदी सरकार किसी मौके को छोड़ने की भूल भी नहीं कर सकती. इसके लिए सरकार के पास संसद से देश के मतदाताओं को संबोधित करने से बड़ा मौका नहीं हो सकता था. जानकारों के मुताबिक इसलिए लड़खड़ाते हुए ही सही, अरुण जेटली बजट के दौरान कुछ-कुछ अहम मौकों पर हिंदी की पटरी पर भी चलते रहे.