वित्त मंत्री अरुण जेटली जब 2018-19 का बजट पेश कर रहे थे तो ऐसा लग रहा था कि वे मतदाताओं को संबोधित कर रहे थे. इसलिए इस बार उन्होंने खेती, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों को खुलकर धनराशि आवंटित की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैसे भी पहले कई बार कह चुके हैं कि हमें सिर्फ चुनावी साल में ‘राजनीति’ करनी चाहिए. और यह चुनावी नहीं बल्कि महाचुनावी साल है. इसमें आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. और चूंकि बजट की बातें वित्तीय साल के संदर्भ में की जाती हैं तो कहा जा सकता है कि इस वित्तीय साल में ही लोकसभा के चुनाव भी पूरे नहीं तो आधे तो संपन्न हो ही सकते हैं.

आइए जानते हैं ऐसे समय में आए बजट के उन ऐसे चार फैसलों के बारे में जिन्हें लीक से थोड़ा हटा हुआ माना जा सकता है:

1. अरुण जेटली ने आज के बजट भाषण में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना शुरू करने का ऐलान किया है. इसके तहत देश के 10 करोड़ गरीब परिवारों (50 करोड़ लोग) को हर साल पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा दिया जाएगा. इस योजना को उन्होंने ‘सभी को स्वास्थ्य बीमा’ मुहैया कराने की दिशा में उठाया गया कदम करार दिया है. केंद्रीय वित्त मंत्री ने आश्वस्त किया है कि यदि यह प्रयोग सफल रहा तो आगे से इस योजना की सुविधा सभी को दी जाएगी. जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार का यह कदम सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं के मामले में मनरेगा या शिक्षा का अधिकार की तरह और उस स्तर का ही है.

मोदी सरकार ने इसके अलावा हर तीन लोकसभा क्षेत्रों में एक मेडिकल कॉलेज और हर प्रदेश में एक सरकारी मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा भी की है. अरुण जेटली ने बताया कि इस योजना के तहत 24 नये मेडिकल कॉलेज खोले जाएंगे. उन्होंने मौजूदा अस्पतालों को बेहतर बनाने का भी ऐलान किया है.

उनके इन कदमों का उनके आलोचक भी स्वागत कर रहे हैं. जाने-माने पत्रकार प्रंजॉय गुहा ठाकुरता ने एनडीटीवी से कहा, ‘कई लोग सरकार की यह कहकर आलोचना कर सकते हैं कि उसने राजकोषीय घाटे का लक्ष्य पूरा नहीं किया. लेकिन चुनाव के समय ही सही लोगों के कल्याण पर ज्यादा पैसे खर्च करने के फैसले का स्वागत होना चाहिए.’

2. सरकार ने इसके अलावा सांसदों के वेतन-भत्तों को बढ़ाने के लिए एक व्यवस्था बनाने का ऐलान किया है. इसके तहत सांसदों का वेतन महंगाई को ध्यान में रखते हुए हर पांच साल पर बढ़ाया जाएगा. इसके लिए सरकार एक कानून के जरिये व्यवस्था बनाने की बात कर रही है. जानकार सरकार के इस फैसले को पारदर्शी और जवाबदेह लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी बताते हुए क्रांतिकारी करार दे रहे हैं. उनके अनुसार देर-सबेर राज्यों में भी विधायकों का वेतन तय करने के लिए ऐसी ही व्यवस्था का बनना लगभग तय है. असल में अभी तक बिना किसी उचित प्रक्रिया के सांसदों और विधायकों द्वारा ही अपना वेतन बढ़ा लिया जाता था. और कानून बनाने वाले अपना वेतन बढ़ाने की किसी और व्यवस्था को लागू करने के प्रति उत्साह नहीं दिखाते थे. माना जा रहा है कि मोदी सरकार का यह फैसला अगले चुनाव में अपनी छवि मजबूत करने के इरादे से लिया गया है. फिर भी जानकारों को लगता है यह स्वागत योग्य है.

3. अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में ऐलान किया है कि अब खरीफ (बरसात में लगने वाली) फसलों के लिए किसानों को लागत से 50 फीसदी ज्यादा कीमत दी जाएगी. यह भाजपा का चुनावी वादा भी था. इसके अलावा वित्त मंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ऐसी व्यवस्था बनाएगी जिससे तय हो सके कि किसानों को उनकी फसल का ​वाजिब दाम मिल सके. इसके लिए वह गांव में ही ऐसी मंडियां बनाने जा रही हैं जो एपीएमसी कानून के दायरे से बाहर हों और सीधे ई-नैम (ई नैशनल एग्रीकल्चर मार्केट) पोर्टल से जुड़ी हों. जानकारों ने सरकार के इस फैसले को सराहनीय बताया है. लेकिन इनमें से कुछ का यह भी मानना है कि बिना पर्याप्त निवेश के यह केवल घोषणा बनकर ही रह सकता है.

4. ईज आॅफ लिविंग का सपना पूरा करने के लिए वित्त मंत्री ने ‘सभी को घर’ के लक्ष्य पर भी अपना ध्यान केंद्रित किया है. इसके लिए ‘अफोर्डेबल हाउसिंग फंड’ बनाने की घो​षणा की गई है. इस फंड से गरीबों के लिए सस्ते घर बनाने के लिए पैसे का इंतजाम किया जाएगा. आम बजट के मुताबिक वित्त वर्ष 2018-19 में गांवों में 51 लाख और शहरों में 37 लाख घर बनाए जाएंगे. इस तरह सरकार अगले साल गरीबों के लिए 88 लाख घर बनवाएगी. जाहिर है इससे करीब 4.5 करोड़ गरीबों का घर का सपना पूरा हो सकेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले कई बार कह चुके हैं कि उनकी सरकार 2022 तक ‘सभी को घर’ दे देगी. इस तरह वित्त मंत्री का ताजा ऐलान सरकार का विजन पूरा करने के लिए उठाया गया है.