हम लोग जिनका पेशा क़लम घसीटना है उन्हें अपना लिखा सब कुछ गोस्वामी तुलसीदास के कहे ‘निज कबित्त न काहे लागे नीका’ के मुताबिक़ अच्छा ही लगता है. लेकिन कभी कुछ ऐसा होता है जिसे लिख कर विशेष रूप से संतोष होता है. ऐसा मुझे कुछ वक्त पहले रेवरेंड डेविड शेपर्ड के बारे में लिखकर लगा था. रेवरेंड शेपर्ड के बारे में कुछ जानकारी पहले से ही थी, लेकिन उनके बारे में लिखते वक्त उनके बारे में ज्यादा पढ़ना हुआ और उनके प्रति सम्मान कई गुना बढ़ गया.

शेपर्ड चर्च ऑफ़ इंग्लैंड के पादरी थे और बड़े क्रिकेटर थे. वे पचास के दशक में इंग्लैंड के काफी कामयाब शुरुआती बल्लेबाज़ थे और दो टेस्ट मैचों में कप्तान भी रहे थे. चर्च की व्यस्तताओं की वजह से वे धीरे धीरे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से दूर होते गए लेकिन बतौर पादरी उनका जीवन बहुत असाधारण था. क्रिकेट में उनका नाम इसलिए भी याद किया जाता है क्योंकि दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद के ख़िलाफ़ उन्होंने सन 1960 में दक्षिण अफ़्रीकी क्रिकेट टीम के ख़िलाफ़ खेलने से मना कर दिया था. जानकार कहते हैं कि इस वजह से ही वे भविष्य में अंग्रेज़ टीम के कप्तान नहीं बन पाए. अंग्रेज़ क्रिकेट में रंगभेद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले वे संभवत: पहले खिलाड़ी थे.

रेवरेंड शेपर्ड का कहना था कि ऐसा उन्होंने अपना धार्मिक कर्तव्य मान कर किया. दक्षिण अफ़्रीका में काले लोगों की शिकायत थी कि ईसाइयत ने उन्हें गोरे लोगों के हाथ की कठपुतली बना दिया है क्योंकि चर्च तो हमेशा गोरों का साथ देता है. एक साक्षात्कार में शेपर्ड कहते हैं, ‘मैं उन्हें बताना चाहता था ऐसा नहीं है , चर्च में एक आदमी तो ऐसा है जो उनके साथ खड़ा है.’ वे रंगभेद के ख़िलाफ़ लगातार सक्रिय रहे और लगभग 10 साल बाद इंग्लैंड के दक्षिण अफ़्रीका से क्रिकेट संबंध ख़त्म करने में भी उनकी बड़ी भूमिका थी.

बतौर पादरी भी रेवरेंड शेपर्ड लीवरपूल के ग़रीब हिस्सों में रहे. उस दौर में उन्होंने ग़रीब लोगों को संगठित किया और सरकार पर दबाव बना कर उनकी हालत को सुधारने की लगातार कोशिशें की. शहरी ग़रीबों, अश्वेत लोगों और महिलाओं की बेहतरी के लिए उन्होंने बहुत काम किया. समलैंगिकों के अधिकार के लिए भी उन्होंने सार्थक पहल की. ग्रेट ब्रिटेन की अनुदार मार्गरेट थैचर सरकार और सभी अनुदार ताक़तों को इसी वजह से वे हमेशा खटकते रहे जो उन पर ‘ मार्क्सवादी ‘ होने का आरोप लगाते रहे. इसी वजह से वे चर्च ऑफ़ इंग्लैंड के सर्वोच्च पद ‘आर्चबिशप ऑफ़ कैंटरबरी’ तक नहीं पहुंच पाए. रेवरेंड शेपर्ड देश की संसद के उच्च सदन में भी चर्च के प्रतिनिधि की हैसियत से पहुंचे और कई प्रगतिशील क़ानून बनवाने में आगे रहे. यह सब वे अत्यंत विनम्रता और शालीनता से करते रहे.

हमें यह अजीब और अनोखा लग सकता है कि एक धार्मिक नेता ऐसे प्रगतिशील और उदार मूल्यों के लिए लड़ता रहा. हम आम तौर पर यह देखते हैं कि धर्म से जुड़े लोग पुरातनपंथी , दक़ियानूसी और अनुदार मूल्यों और ताक़तों के समर्थक होते हैं. वास्तव में हमें आश्चर्य इस बात पर होना चाहिए कि ज़्यादातर धार्मिक नेता और संस्थान ऐसे क्यों हैं क्योंकि ज़्यादातर धर्मों के संस्थापक अपने वक्त में अत्यंत उदार , क्रांतिकारी और प्रगतिशील लोग थे और उन्होंने तत्कालीन यथास्थितिवादी ताक़तों को चुनौती दी थी.

महात्मा बुद्ध ने अपने दौर में एक ऐसा दर्शन सामने रखा जो उस युग में अभिजात्य वर्गों की सत्ता को चुनौती देता था.ईसा मसीह ने ग़रीब यहूदी जनता के हक़ों के लिए अत्याचारी रोमन साम्राज्य और उसके दलाल यहूदी सामंतों और धर्मगुरुओं के ख़िलाफ़ बग़ावत की थी. कुछ साल पहले बहुत चर्चित हुई रज़ा असलान की किताब ‘द ज़ीलट’ इस संदर्भ में पठनीय है. असलान उस किताब में कहते हैं कि ईसा को सूली पर चढ़ाया जाना इस बात का सबूत है कि तत्कालीन सत्ता उन्हें बाग़ी मानती थी क्योंकि यह सज़ा तब सिर्फ़ सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह करने वालों को ही दी जाती थी.बाइबिल का ‘नया नियम’ भी ईसा के क्रांतिकारी विचारों और कर्मों की गवाही है.

हज़रत मोहम्मद ने भी तत्कालीन अरब समाज के सत्ताधारियों के शोषण और मनमानी के ख़िलाफ़ एक ऐसे समाज की कल्पना की जो बराबरी , न्याय और कमज़ोर वर्गों को विशेषाधिकार के तत्वों पर आधारित हो. गुरु नानक और उनके बाद के अन्य नौ सिक्ख गुरुओं के विचार और आचरण अपने दौर में बहुत क्रांतिकारी दिखाई देते हैं. ये सभी महापुरुष अपने अपने दौर से बहुत आगे के लोग थे.

ऐसे में स्वाभाविक यह है कि उनके उत्तराधिकारी या अनुयायी लोगों को अपने अपने दौर में प्रगतिशील और अपने ज़माने के स्थापित मूल्यों से कहीं आगे की सोच रखनेवाला होना चाहिए. लेकिन अक्सर यही देखने में आता है कि धार्मिक नेता हर प्रगतिशील पहल का विरोध करते हैं. सारे धर्मों के प्रवर्तकों ने अपने अपने दौर के संदर्भ में महिलाओं की स्थिति बेहतर करने की वकालत की , लेकिन धार्मिक नेता अमूमन औरतों के अधिकारों को धर्म के लिए ख़तरा समझते हैं. यहां यह याद रखना ज़रूरी है कि हर व्यक्ति अपने समय और समाज के संदर्भ में ही प्रगतिशील हो सकता है इसलिए इक्कीसवीं सदी के मानदंडों पर उन्हें नहीं देखना चाहिए, हो सकता है कि पच्चीसवीं सदी के लोगों को हमारे बहुत से तौर-तरीके दक़ियानूसी लगें. मसलन सातवीं सदी के अरब समाज में ग़ुलामी एक सर्वमान्य प्रथा थी, हज़रत मोहम्मद से उसका विरोध करने की उम्मीद नहीं की जा सकती, लेकिन उन्होंने ग़ुलामों के साथ परिजनों के जैसा व्यवहार करने को अनिवार्य बताया और ग़ुलामों को आज़ाद करने को बहुत बडा पुण्य बताया.उन्होंने कहा कि जो एक ग़ुलाम को आज़ाद करता है वह जैसे सारी मानवता को आज़ाद करता है. ऐसी बातों असर भी देखने को मिला.

प्रवर्तकों के अलावा भी जिन धार्मिक लोगों के नाम सम्मान के साथ याद किए जाते हैं, वे सभी वचन और क्रम से इसी उदार मानवीयता के पक्षपाती रहे हैं. चाहे वे सेंट फ़्रांसिस ऑफ़ असिसी और माइस्टर इकहार्ट जैसे ईसाई संत हों या मोइनुद्दीन औलिया और हज़रत निज़ामुद्दीन जैसे मुस्लिम संत हों या फिर कबीर, तुलसी तुकाराम, एकनाथ जैसे भक्त हों. इन सभी को तत्कालीन धार्मिक मठाधीशों का विरोध सहना पड़ा. लेकिन उन मठाधीशों के नाम इतिहास में खो गए हैं जबकि ये संत आज भी जनमानस में मौजूद हैं.

अगर हम इन सब नामों पर ग़ौर करें तो हम पाएंगे कि ये सब ऐसे लोग हैं जिन्हें अंग्रेज़ी में ‘मिस्टिक’ या रहस्यवादी कहते हैं या जो धर्म के उस गहरे, निर्मल मानवतावादी मर्म से जुड़े थे जिसे अध्यात्म कहते हैं. धर्म के सत्तातंत्र और सांस्थानिक रूढ़ियों के ख़िलाफ़ उन्होंने विद्रोह किया था, जिन्हें बनाए रखने के लिए मठाधीश सक्रिय रहते हैं.

इसका सरल निष्कर्ष यह है कि धर्म की सार्थक परंपरा दरअसल विद्रोह की परंपरा है. धर्म की वास्तविक परंपरा का असली वाहक वही है जो अपने युग के सर्वाधिक प्रगतिशील मानवीय मूल्यों के साथ हो जैसा कि धर्मों के प्रवर्तकों और संतों ने किया.