कासगंज में इन दिनों कुछ कश्मीर जैसे हालात हैं. ज़रा-ज़रा दूर पर पुलिस और प्रोविंशिअल आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी (पीएसी) के जवान खड़े हैं. कई ट्रकों में भरकर नीली वर्दी वाली रेपिड एक्शन फोर्स को लाकर खड़ा कर दिया गया है. गुरुवार को बड्डू नगर सहित ज़्यादातर संवेदनशील इलाकों में पीस कमेटी की बैठक हुई. पीस कमेटी की बैठक यानी लोगों और उनके नेताओं को बुलाकर उनके अंदर के गुस्से और शिकायतों को बाहर लाने का मौका देने की कवायद. यह प्रशासन का आइडिया था. बड्डू नगर के एक प्राइमरी स्कूल में चल रही शांति समिति की बैठक में स्थानीय व्यापार संघ के पदाधिकारी कोई फारूख साहब माइक लेकर बोल रहे हैं, ‘जो कुछ हुआ है, किसने किया है, वो सब प्रशासन को मालूम है. हमारे साथ अन्याय नहीं होगा.’

बैठक में एसडीएम भी मौजूद हैं. आस-पड़ोस के बुज़ुर्गों और युवाओं में से कुछ मुहल्ले से इकट्ठी की गई कुर्सियों पर बैठे हैं, कुछ स्कूल की चारदीवारी पर और कुछ खड़े हैं. इनमें से कुछ वीडियो बना रहे हैं. कासगंज की न्याय-अन्याय, आरोप-प्रत्यारोप की लड़ाई में वीडियो एक अहम हथियार है. बड्डू नगर वालों के पास अपने पक्ष की बात करते वीडियो हैं और तिरंगा यात्रा के पक्षधरों के पास अपने पक्ष के.

बड्डूनगर कासगंज का वह मुस्लिम बहुल इलाका है जहां से हिंसा की शुरुआत हुई. क्या हुआ इसके बारे में हर अखबार, हर चैनल, हर नागरिक के अपने-अपने वर्जन हैं. बड्डू नगर में घुसने से पहले कुछ घर हिंदुओं के हैं. बड्डू नगर का पता पूछने के बहाने जब वहां इकट्ठी भीड़ से बातचीत हुई तो ‘राष्ट्रभक्ति’ के जोश से भरा एक सवाल उठा कि ‘अब हमें तिरंगा यात्रा निकालने के लिए परमीशन लेनी पड़ेगी?’ काश कि कोई इन्हें बता पाता कि कुछ साल पहले तक घरों में तिरंगा फहराने के लिए भी परमीशन लेनी पड़ती थी. खैर पीस मीटिंग के बाद बड्डू नगर के लोगों से जब बात होती है तो उनका सवाल यह आता है कि ‘तिरंगा तो फहराया जाता है न? तिरंगा यात्रा क्या होती है? वो भी दर्जनों मोटरसाइकिलों का तिरंगे और भगवा झंडे लेकर एक खास इलाके में आने का क्या मतलब था?’

बड्डू नगर में हो रही शांति समिति की बैठक
बड्डू नगर में हो रही शांति समिति की बैठक

26 जनवरी 2018 के दिन सुबह नौ-साढ़े नौ बजे के आस-पास जब बड्डू नगर के तिराहे पर झंडारोहण का आयोजन किया जा रहा था. तभी करीब 50 मोटरसाइकिलों पर सौ-सवा सौ लोग हाथों में तिरंगा और भगवा झंडा लिए वहां से निकले. बड्डूनगर के निवासियों का कहना था कि पहले हमारा ध्वजारोहण होगा तब यह यात्रा आगे जाएगी, मोटरसाइकल पर सवार लोगों की मांग थी कि पहले वे आगे जाएंगे. उसके बाद नाराबाजी हुई और फिर हाथापाई.

बड्डूनगर निवासियों का आरोप है कि यात्रा में आए युवाओं ने कहा कि सिर्फ तिरंगा नहीं हमारा भगवा झंडा भी लहराया जाए, साथ ही नारे लगाए कि हिंदुस्तान में रहना होगा तो वंदे मातरम कहना होगा, सीताराम कहना होगा या राधे-राधे कहना होगा. उधर कासगंज हिंसा में मारे गये युवा चंदन गुप्ता के घर पर मिले लोगों का कहना है कि वे लोग पाकिस्तान ज़िंदाबाद का नारा लगा रहे थे जिसे उनके लड़कों ने बर्दाश्त नहीं किया और लड़ाई की शुरुआत हो गई.

लड़ाई शुरु होने के बाद, क्योंकि गली संकरी थी, लोग अपनी-अपनी मोटरसाइकिलें छोड़ कर वहां से भाग गए. करीब 37 मोटरसाइकिलें अब भी पुलिस के पास मौजूद हैं. लेकिन यहां से भागने के बाद तिरंगा यात्रा वाली भीड़ ने बाकी मुस्लिम बहुल इलाकों में नारेबाजी और पथराव किया, इसी-बीच फायरिंग हुई और 19 साल के चंदन गुप्ता की जान चली गई.

कोतवाली के पास आभूषणों की दुकान चलाने वाले प्रदीप कुमार बताते हैं, ‘पहली बात तो ऐसी यात्रा की कोई ज़रूरत नहीं थी. फिर जहां नॉर्मली पुलिस भी नहीं जाती ऐसी जगह इन लोगों को जाना ही नहीं चाहिए था. और फिर वहां जाकर फालतू नारे लगाए, उधर से भी पत्थर चले. वहां से ये लड़के जब भाग कर आए तो बरकी कटपीस सेंटर वालों से मारपीट की. जब वो लोग अपने घर की तरफ भाग गए तो ये लोग उनके पीछे गए. उनका घर हिंदू-मुसलमान इलाकों के बॉर्डर पर है. इनके पास हथियार थे, उनके पास भी थे. फायरिंग हुई. दो लोगों को गोली लगी. तिरंगा यात्रा शुरू होने और गोली लगने में दो घंटे का फर्क है.’

चंदन की मौत होने के बाद लगातार तीन दिन तक दुकानें जलाई गईं और मस्जिदों में तोड़-फोड़ की गई. तमाम पुलिस और पीएसी के मौजूद होने के बावजूद ऐसा हुआ. 28 तारीख से गिरफ्तारियां शुरू हुईं और लोगों को उनके घरों से उठाया जाने लगा. जो लोग घर और शहर में मौजूद नहीं थे उनके घरों पर नोटिस चस्पा कर दिए गए. गुरुवार एक तारीख को बड्डू नगर में हो रही पीस कमेटी की मीटिंग में एक मुद्दा इन गिरफ्तारियों का भी था. लोग शिकायत कर रहे थे कि उनके चौदह साल के बच्चे का नाम दंगाइयों में लिख लिया गया है या फिर उस लड़के का नाम भी लिस्ट में है जो पिछले छह महीने से शहर में है ही नहीं.

अलीगढ़ रेंज के आईजी संजीव गुप्ता बताते हैं कि ‘इस मामले में कुल 11 एफआइआर दर्ज की गई हैं, 42 लोगों को जेल भेज दिया गया है. 81 लोगों को सीआरपीसी 151 के तहत गिरफ्तार कर बेल पर छोड़ दिया गया है. इसके अलावा, बरामद की गई 33 मोटरसाइकिलों के नंबरों के आधार पर भी दंगाइयों की पहचान की जा रही है.’ वे यह भी बताते हैं कि मामले की जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम गठित कर दी गई है जो अपना काम कर रही है.

बड्डू नगर के निवासी शिकायत करते हैं कि बेल पर छोड़े गए लोगों में अधिकतर हिंदू हैं जिन्हें बहुसंख्यकों के दबाव के कारण छोड़ दिया गया है. कोतवाली बाज़ार में मौजूद हिंदू व्यापारी भी इस बात से इनकार नहीं करते. नाम न बताने की शर्त पर एक बुज़ुर्ग व्यापारी कहते हैं, ‘केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार है. यहां होगा तो वही जो पार्टी चाहेगी. ऐसे दंगों की उन्हें ज़रूरत है अपने वोट बनाने के लिए. गुजरात में क्या किया उन्होंने. चुनावों के वक्त विकास-फिकास पीछे छोड़ के हिंदू-मुसलमान और पाकिस्तान पर आ ही गए थे ना.’

पिछले एक हफ्ते से शहर में हुई गतिविधियों पर शहर का समझदार तबका दुखी नज़र आता है. कासगंज में इससे पहले ऐसी घटनाएं नहीं हुई थीं. लोग मीडिया कवरेज से भी दुखी है. उनका आरोप है कि वह ज़्यादातर चीजें गलत दिखा रहा है और उसकी कवरेज से हालात और खराब हुए हैं.

उनके इस आरोप की बानगी थोड़ी देर बाद मुझे भी देखने को मिल जाती है जब मैं चंदन गुप्ता के घर पहुंचती हूं. रेलवे स्टेशन के करीब बने इस घर के बाहर पुलिस खड़ी है. इनमें तीन महिला कॉन्स्टेबल भी हैं. घर में घुसते ही बैठक में सामने चंदन की तस्वीर लगी थी, तस्वीर के पीछे तिरंगा झंडा था. बाईं तरफ उसके पिता सुशील गुप्ता बैठे हैं जो कि एक प्राइवेट अस्पताल में कंपाउंडर हैं. उनके आस-पास और सामने भी कुछ लोग बैठे हैं. दरवाज़े के पास कुर्सी पर एक बुज़ुर्ग बैठे हैं. सर पर भगवा टोपी पहने.

चंदन गुप्ता की मां
चंदन गुप्ता की मां

पिता का दुखी चेहरा देखकर मेरी उनसे सवाल करने की हिम्मत नहीं होती. मैं घर के भीतर उसकी मां से मिलने चली जाती हूं. उनके सर पर बैंडेज लगी है. बेटे के दुख में सर पटक-पटक कर रोती रही हैं. तीन बच्चों में सबसे छोटा था चंदन. ‘बहुत प्यार करता था मुझसे. पिछले दिनों से कुछ ज़्यादा ही घर से बाहर रहने लगा था. मैं चिल्लाती थी, पर मुझे कुछ बताता ही नहीं था, कहता था कि मैं कुछ बड़ा करुंगा. अब देखो, कितने लोग आ रहे हैं उससे मिलने, बस वही नहीं आ रहा,’ मां एकालाप करते-करते रो पड़ती है.

थोड़ी देर बाद होश संभालकर फिर बोलने लगती हैं, ‘हर वर्ष जाता था रैली लेकर, इस बार ज़्यादा ही उत्साह दिखा गए.’ फिर कुछ देर चुप होकर कहती हैं, ‘अब कोई पाकिस्तान ज़िंदाबाद का नारा लगाएगा तो हम ही बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे’ और फिर रोने लगती हैं. कुछ देर बाद जब मैं बाहर निकलने के लिए उठती हूं तो उन्हें कहते सुनती हूं, ‘कोई मुसलमानों की दुकानों से सामान मत खरीदना.’

बाहर चंदन के पिता बताते हैं कि तिरंगा यात्रा निकालने से कुछ दिन पहले तक चंदन की अपने दोस्तों से चैट पर लगातार बात हो रही थी कि कैसे यह सब किया जाएगा. वे बताते हैं कि इन लोगों की बातचीत दूसरे पक्ष से भी हो रही थी. उन्होंने कहा था कि यहां से निकाल कर दिखाओ, हम निकलने नहीं देंगे, और इन्होंने कहा कि हम निकाल कर दिखाएंगे.

शायद इसी लिए उन्होंने तिराहे पर तिरंगारोहण का आयोजन किया. और इस खास कार्यक्रम के लिए तिराहे का नाम गप्पू का तिराहा से बदल कर ‘वीर अब्दुल हमीद तिराहा’ भी कर दिया.

चंदन के घर पर घुसते ही जो भगवा टोपी पहने बुजुर्ग मिले थे वे ओम प्रकाश आर्य हैं. बात करने पर पता चलता है कि वे शिवसेना के कार्यकारी प्रदेश प्रमुख हैं. ओम प्रकाश आर्य स्वयं को लोकतंत्र रक्षक सेनानी भी बताते हैं. वे अपना कार्ड और फोटोकॉपी किए हुए दो पन्ने मुझे थमा देते हैं. इनमें मांग की गई है कि चंदन को शहीद का दर्जा और उसके परिवार को 50 लाख रुपए और उसके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाये. दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ के मुताबिक अब तक 20 लाख रुपए स्थानीय सरकार से, एक लाख रुपए बार काउंसिल से और एक लाख रुपए स्थानीय सांसद राजवीर सिंह की ओर से चंदन के परिवार को दिए जा चुके हैं.

इस बीच मैं देखती हूं कि देश के एक जाने-माने न्यूज चैनल का पत्रकार चंदन के पिता सुशील गुप्ता से धीमी आवाज़ में कुछ बात कर रहा है. थोड़ी देर बाद वह अपना कैमरा उन पर फोकस करते हुए कहता है कि देख लीजिए हम लोगों ने आपका सबसे ज़्यादा साथ दिया है. एक पत्रकार से ऐसा कुछ सुनना काफी अजीब लगता है मुझे. खैर वह कैमरा ऑन कर सवाल पूछता है कि ‘सुना है आज आपको देख लेने की धमकी दी गई है.’ लगभग सहमे हुए चंदन के पिता धीमी आवाज़ में बताना शुरू करते हैं कि गुरुवार की सुबह उनके घर के सामने बाइक पर दो लड़के आए और उन्होंने धमकी दी कि वे उन लोगों से पंगा न लें, वरना उन्हें देख लिया जाएगा. कि अभी तो एक ही चंदन मरा है, बाकियों को भी छोड़ा नहीं जाएगा.

जब पत्रकार साहब उनकी सुरक्षा का सवाल उठाते हैं तो चंदन के पिता कहते हैं कि वे चाहते हैं कि उन्हें दो शस्त्रों के लिए लाइसेंस दिया जायें. लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए एक के बजाय दो गन लाइसेंसों की मांग करने वाले सुशील गुप्ता यह भी बताते हैं कि इस धमकी के लिए उन्होंने कहीं कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई है. इस बाइट के बाद सुशील गुप्ता को उस कागज़ को हाथ में लेकर पोज़ देने के लिए कहा जाता है जिस पर लिखा है कि चंदन को न्याय मिले. फिर पत्रकार साहब कमरे में मौजूद एक-दो लोगों से चंदन की तस्वीर पर फूल चढ़ाने के लिए कहते हैं ताकि वे फुटेज ले सकें. मैं इस तरह की पत्रकारिता को हैरान होकर देखती रहती हूं. चंदन के पिता को मिली ‘धमकी’ की खबर कुछ ही समय बाद देश के ज्यादातर मीडिया की सुर्खियां बन जाती है.

चंदन गुप्ता के परिवार को धमकियां मिलने की खबर देश के ज्यादातर मीडिया ने छापी है
चंदन गुप्ता के परिवार को धमकियां मिलने की खबर देश के ज्यादातर मीडिया ने छापी है

बाहर खड़े पुलिस वालों से इस धमकी की बाबत पूछने पर वे साफ कहते हैं, ‘ये सब बकवास है. हम यहां खड़े होकर आने-जाने वालों की तस्वीर खींच रहे हैं. यहां ऐसी कोई घटना नहीं हुई है.’ शिवसेना के अलावा चंदन के घर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और विश्व हिंदू परिषद के लोग भी मौजूद हैं. वे गर्व के साथ बताते हैं कि चंदन अमर हो चुका है. और उन्होंने चंदन के सम्मान और मुसलमानों के विरोध में मथुरा व अन्य शहरों में तिरंगा यात्राएं निकाली हैं. इसी बीच चंदन के पिता के करीब बैठे एक शख्स चंदन के बारे में हमें बताते हुए कहते हैं कि वह कहता था कि उसके खून का एक-एक कतरा तिरंगे के काम आएगा. 19 साल के एक लड़के की मौत पर होने वाली राजनीति अब किसी भी स्तर पर जाने के लिए तत्पर दिखती है.

मुझे कोतवाली पर ‘हिंदू’ व्यापारियों के साथ हुई बातचीत याद आती है - ‘चंदन अच्छा लड़का था. लेकिन कुछ समय से ब्लड डोनेशन और भंडारे आदि कराने लगा था, इलाके में एक नेता के तौर पर छवि बनाने की कोशिश कर रहा था. उसकी मौत हत्या नहीं, दुर्घटना है, वो भी उसके साथियों के शुरू किए खेल की वजह से. लेकिन अगर यही बात हम सामने से बोल दें, तो माहौल ऐसा है कि भीड़ हमारे ही खिलाफ हो जाएगी. ये नेता हमारे बच्चों को बरबाद कर रहे हैं. हमें बांटने में लगे हैं.’

बांटने की बात पर वे स्थानीय सांसद राजवीर सिंह के उस भड़काऊ बयान का ज़िक्र करते हैं जो उन्होंने चंदन की मौत के बाद दिया. राजवीर सिंह ने कहा कि ‘उन लोगों’ ने ‘हमारे लड़के’ को मारा है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. वे हमें यह भी बताते हैं कि कासगंज में आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद का अच्छा-खासा दबदबा है. विहिप के प्रदेश अध्यक्ष प्रमोद जाजू कासगंज से ही हैं. ठीक से देखा जाए तो कासंगज के हालात को संवेदनशीलता के साथ देखने और सुलझाने की ज़रूरत है. पर मीडिया और नेताओं का रुख इस जगह के भविष्य के बारे में कुछ और ही इशारा करता दिख रहा है.