बीते साल मार्च की बात है. कर्नाटक कांग्रेस के दिग्गज नेता एसएम कृष्णा को बड़े जोर-शोर से भारतीय जनता पार्टी में शामिल किया गया था. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार में विदेश मंत्री जैसा पद संभाल चुके कृष्णा को पार्टी में लाने के लिए दो मक़सद बताए गए थे - एक, राज्य के लोगों के बीच यह धारणा मज़बूत करना कि कांग्रेस कमजोर पड़ रही है इसलिए उसके नेता भाजपा की तरफ़ रुख़ कर रहे हैं. दूसरा, दक्षिण कर्नाटक में बहुतायत में रहने वाले वोक्कालिगा समुदाय को ख़ास तौर पर यह संदेश-संकेत देना कि हवा भाजपा के पक्ष में है. इस क्षेत्र और समुदाय में भाजपा का जनाधार हमेशा से कमज़ोर रहा है और कृष्णा इसी क्षेत्र और समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं.

लेकिन भाजपा का यह दांव एक महीने बाद (अप्रैल-2017) ही उल्टा पड़ता दिखाई दिया. उस वक़्त दक्षिण कर्नाटक की दो सीटों- नंजनगुड और गुंडलूपेट में उपचुनाव हुए थे. भाजपा को उम्मीद थी कि कृष्णा का करिश्मा यहां उसके पक्ष में नतीज़े देगा. लेकिन इन दोनों सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी क्रमश: 21,000 और 10,000 वोटों से हार गए. और इसमें दिलचस्प बात यह रही कि नंजनगुड सीट तो कांग्रेस से भाजपा में गए राज्य के पूर्व मंत्री श्रीनिवास प्रसाद के इस्तीफ़े से खाली हुई थी. उन्हें ही भाजपा ने दोबारा मैदान में उतारा था, लेकिन वे अपनी नई पार्टी के लिए सीट नहीं निकाल पाए. प्रसाद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया द्वारा मंत्री पद से इस्तीफ़ा ले लिए जाने के बाद भाजपा में आए थे.

और अब महादायी के भंवर में भाजपा ही उलझी दिखती है

और अब ताज़ा मामला देखिए. यह मामला कर्नाटक के भीमगढ़ वन्यजीव अभयारण्य से निकलने वाली महादायी नदी से जुड़ा है. महादायी के पानी पर गोवा और कर्नाटक दोनों हक़ ज़ताते हैं. क्योंकि क़रीब 111 किलोमीटर बहाव वाली यह नदी निकलती भले कर्नाटक से है पर बहती ज़्यादातर गोवा में हैं. वहां इसे मांडवी कहते हैं और ‘गोवा की जीवनरेखा’ भी क्योंकि यह राज्य में पीने के पानी का सबसे बड़ा स्राेत है. इसीलिए 2002 में जब कर्नाटक ने इसका पानी अपने यहां बहने वाली मालाप्रभा नदी में मोड़ने की कोशिश की तो गोवा ने आपत्ति जता दी. लिहाज़ा गोवा की मांग पर केंद्र सरकार ने 2010 में महादायी जलविवाद प्राधिकरण बना दिया गया जहां इसी महीने मामले की अंतिम सुनवाई है.

चूंकि भाजपा गोवा में सरकार चला रही है और कर्नाटक में बनाना चाहती है इसलिए पार्टी ने महादायी के मसले को भुनाने की कोशिश की. बीते दिसंबर में कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष बीएस येद्दियुरप्पा को गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने एक पत्र लिख दिया. इसमें उन्होंने आश्वासन दिया कि वे महादायी के मसले पर नरम रुख़ अपनाने को तैयार हैं. पत्र का मक़सद सीधे तौर पर यह था कि येद्दियुरप्पा उसे जनता के बीच ले जा सकें. उसे बता सकें कि कर्नाटक में भाजपा के सत्ता में आने पर मसला जल्द हल हो जाएगा क्योंकि केंद्र के साथ गोवा में भी पार्टी सरकार चला रही है और गोवा से आश्वासन भी मिल चुका है. यानी भाजपा कर्नाटक को महादायी के पानी का लाभ दिला सकती है.

लेकिन यहां भी कहानी उलट गई. कांग्रेस ने तुरंत सवाल उठा दिया कि येद्दियुरप्पा को किस नाते पत्र लिखा गया. वे तो अभी विपक्ष में हैं. दूसरी तरफ़ महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने भी मामला उलझाने की कोशिश की. चूंकि अरब सागर में गिरने से पहले महादायी थोड़ा रास्ता महाराष्ट्र में भी तय करती है. इसीलिए शिवसेना ने गोवा के मुख्यमंत्री पर्रिकर के पत्र पर यह कहते हुए सवाल उठाया कि वे ‘महाराष्ट्र की राय लिए बिना कर्नाटक से नरम रुख़ अपनाने का वादा कैसे कर सकते हैं.’ यही नहीं, मामला उलझ जाने के बाद भाजपा की परेशानी बढ़ने का सबब यह भी है कि अब कर्नाटक के कुछ संगठन पार्टी के बड़े नेताओं के प्रदेश दौरे के ऐन वक़्त पर राज्यव्यापी बंद का आयोजन कर रहे हैं.

अभी चार फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बेंगलुरु में रैली थी. उस समय भी ऐसा ही बंद आयोजित किया गया था. वह तो कर्नाटक हाई कोर्ट ने रैली के ठीक एक दिन पहले इस बंद को अवैध घोषित कर दिया इसलिए भाजपा को थोड़ी राहत मिल गई. प्रधानमंत्री की रैली ठीक-ठाक ढंग से हो गई. लेकिन इससे पहले 26 जनवरी को जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मैसुरु में ऐसी ही रैली को संबोधित करने गए थे तो उन्हें यह राहत नहीं मिल पाई थी. और इसीलिए महादायी के मसले पर कन्नड़ संगठनाें के बंद के बीच हुई अमित शाह की मैसुरु रैली में भीड़ भी अपेक्षा से कम ही जुटी.

यह कोई एक-दो उदाहरण की बात नहीं है

जिनका ऊपर ज़िक्र हुआ वे तो सिर्फ़ चुनिंदा उदाहरण हैं. इनके अलावा और भी कई मामले हैं जिनसे यही साबित होता है कि भाजपा के दांव कर्नाटक में उल्टे पड़ रहे हैं. राज्य के एक कद्दावर मंत्री डीके शिवकुमार को ही लें. वे धनी-मानी दोनों हैं. यानी धन तो इनके पास है ही लोगों के बीच उनका मान भी बहुत है. इसीलिए वे जिस पार्टी में भी रहें उसके लिए हर लिहाज़ से फ़ायदे वाले साबित होते हैं. पिछले साल गुजरात में जब राज्य सभा चुनाव के वक़्त भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस के रणनीतिकार अहमद पटेल की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी तो बेंगलुरु में गुजराती कांग्रेसी विधायकों की आवभगत इन्होंने ही की थी. बीते अगस्त में इनके कई ठिकानों पर आयकर विभाग ने दबिश भी दी थी.

छापामारी में गड़बड़-घोटाला क्या निकला, यह तो अब तक किसी को पता नहीं लेकिन एक ख़बर जरूर छनकर निकली. इसके मुताबिक़ आयकर अफ़सरों ने शिवकुमार को सलाह दी थी कि छापामारी से बचना है तो भाजपा में चले जाएं. यानी यह ख़बर अगर दो-पांच फ़ीसदी भी सच मानें तो भी यह कहा जा सकता है कि आयकर कार्रवाई से दबाव बनाकर शिवकुमार को अपने पाले में लाने की भाजपा की कोशिश भी इस ख़ुलासे के बाद बेअसर साबित हो गई.

ऐसे ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनकी सरकार पर जब भी भाजपा ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए मामला उल्टा पड़ा गया. क्योंकि कर्नाटक में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी येद्दियुरप्पा ख़ुद भ्रष्टाचार के मामले में जेल जा चुके हैं. कर्नाटक की मौज़ूदा सरकार ने उनके ख़िलाफ जांच का एक मामला एसीबी को भी सौंप रखा है.

पार्टी के दो कद्दावर नेताओं- येद्दियुरप्पा और कभी उनके डिप्टी (उपमुख्यमंत्री) रहे केएस ईश्वरप्पा के बीच अनबन खत्म करने की भाजपा नेताओं की कोशिशें भी अब तक ज़्यादा सफ़ल होती नहीं दिखतीं. यह बात पिछले साल दो-तीन मौकों पर साफ़ नजर आई. वे अब भी कभी-कभार पार्टी के लिए अपने बयानों से ही परेशानी खड़ी कर देते हैं.

इसी तरह भाजपा ने कर्नाटक में जब हिंदुत्व कार्ड खेलने की कोशिश की तो वह भी कांग्रेस के कन्नड़ अस्मिता वाले पलटवार के आगे कमजोर पड़ती नजर आई. और अब तो बताया यह भी जाता है कि गुजरात की तरह कर्नाटक के प्रचार अभियान में भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मंदिर-मंदिर माथा टेकते हुए दिखाई देने वाले हैं.

भाजपा की परेशानी कांग्रेस से ज़्यादा सिद्धारमैया बढ़ा रहे हैं

इस आकलन के बाद यह सवाल स्वाभाविक है कि भाजपा की कोई नीति-रणनीति आख़िर कर्नाटक में चल क्यों नहीं पा रही है. इसके ज़वाब में राजनीति के जानकार मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को एक बड़ा कारण मानते हैं, जो भाजपा के हर दांव को घुमाकर उसमें उसी को उलझा देने की नीति पर चलते हुए दिखाई दे रहे हैं. काफ़ी-कुछ प्रधानमंत्री मोदी की तरह.

उदाहरण अभी हाल का ही है. कुछ दिन पहले जब प्रधानमंत्री मोदी ने बेंगलुरु में एक रैली को संबोधित किया तो भ्रष्टाचार का मसला उठाया. साथ ही राज्य में लोकायुक्त का पद खाली होने पर सवाल भी. लेकिन अगले ही दिन सिद्धारमैया ने यह बाजी पलट दी. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर उल्टा सवाल दागा कि जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्हें नौ साल लोकायुक्त के पद पर किसी की नियुक्ति करने का ख़्याल क्यों नहीं आया. इसके साथ ही उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों पर प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को सबूत पेश करने की चुनौती भी दे दी. सिद्धामैया भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी निशाने पर ले रहे हैं. वे जब-जहां मौका देखते हैं लोगों को यह याद दिलाने से नहीं चूकते कि शाह हत्या के एक मामले में जेल जा चुके हैं.

जानकार बताते हैं कि राज्य में राजनीतिक रूप से शक्तिशाली लिंगायत समुदाय अलग धर्म के रूप में मान्यता पाने के लिए जो आंदोलन चला रहा है उसे भी सिद्धारमैया ने एक रणनीति के तहत ही समर्थन दिया है. वे इस मांग के बाबत समुदाय के आवेदनों को राज्य अल्पसंख्यक आयोग के पास भेज चुके हैं. ख़ुद को 100 फीसदी हिंदू बताना, कन्नड़ पहचान का मसला उठाना, राज्य का अलग झंडा हो सकता है या नहीं, यह परखने के लिए समिति बनाना, बेंगलुरु की नम्मा मेट्रो से राष्ट्रभाषा हिंदी साइन बाेर्ड हटवा देना भी उनकी रणनीति का हिस्सा है. बताया जाता है कि यह रणनीति उन्होंने भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे की काट के तौर पर अपनाई है. इसी रणनीति के तहत उन्होंने टीपू सुल्तान की जयंती पर अक्टूबर में हुए समारोह के मसले पर भी भाजपा को उलझाने की कोशिश की थी और कुछ हद तक सफल भी रहे थे.

कहा तो यहां तक जा रहा है कि महादायी नदी के मुद्दे पर पूरे राज्य में जो बंद आयोजित किए जा रहे हैं उसके पीछे भी सिद्धारमैया की योजना काम कर रही है. यानी अगर कुछेक वाक्यों में कहें तो कर्नाटक की अब तक की राजनीतिक तस्वीर से दो चीजें एकदम साफ़ झलकती हैं. पहली- पिछले साल तक जैसा लग रहा था उसके उलट कर्नाटक की चुनावी लड़ाई भाजपा के लिए अब आसान नहीं होने वाली. और दूसरी बात- राज्य में चुनाव आते-आते अगर संघर्ष मोदी बनाम सिद्धारमैया भी हो जाए तो काेई बड़े अचरज की बात नहीं मानी जाएगी.