महाराष्ट्र में औरंगाबाद बहुत ऐतिहासिक शहर है. औरंगाबाद से लगा हुआ दौलताबाद का क़िला है और इससे कुछ ही दूरी पर खुल्दाबाद नाम का एक क़स्बा है. खुल्दाबाद को ‘रौज़ा’ भी कहा जाता था जिसका मतलब है स्वर्ग का बाग़. ऐसा कहलाने की वजह यह यह है कि कहा जाता है कि यहां सैकड़ों सूफ़ियों के मज़ार हैं. इनमें शेख़ मुंतजाबुद्दीन उर्फ़ जरजरी शाह और शेख़ बुरहानुद्दीन ग़रीब और शेख़ जैनुद्दीन प्रमुख हैं. मुग़ल शहंशाह औरंगज़ेब का सादा सा मज़ार भी शेख़ बुरहानुद्दीन की दरगाह के अहाते में ही है. यहां इतने सूफ़ियों के मज़ारों के बारे में दक्षिण भारत में एक कहानी प्रचलित है.

कहानी यह है कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य शेख़ मुंतजाबुद्दीन खुल्दाबाद में इस्लाम का प्रसार करने आए थे. जब उनकी मृत्यु हो गई तो हज़रत निज़ामुद्दीन ने अपने शिष्य और हज़रत जरजरी शाह के छोटे भाई बुरहानुद्दीन ग़रीब से कहा कि तुम्हारे भाई इस दुनिया में नहीं रहे , इसलिए तुम दक्षिण जाकर उनका काम संभालो. तब शेख़ बुरहानुद्दीन ग़रीब सात सौ सूफ़ियों के साथ यहां आए. ये मज़ार इन्हीं सूफ़ी संतों के हैं. यह कहानी दक्षिण भारत में आम तौर जानी जाती है और मैंने इसे कुछ हिंदू और मुस्लिम विद्वानों ,अध्येताओं की किताबों में भी देखा.

अब इस कहानी का दूसरा पक्ष. हम जानते हैं कि हज़रत निज़ामुद्दीन बहुत नामी संत थे जो तक़रीबन सारी जिंदगी दिल्ली में रहे , जहां उनकी दरगाह बड़ी मशहूर है. हज़रत निज़ामुद्दीन की खुद पढ़ने लिखने में बड़ी दिलचस्पी थी और उनके काफी शिष्य भी पढ़े-लिखे विद्वान थे , शायद इसीलिए उनके बारे में काफी समकालीन प्रामाणिक दस्तावेज़ मिलते हैं. इन दस्तावेज़ों में उनके प्रमुख शिष्यों और ख़लीफ़ाओं (वे शिष्य जिन्हे आध्यात्मिक उत्तराधिकारी का बाक़ायदा दर्जा दिया जाता है.) के बारे में व्यवस्थित जानकारी मिलती है. इनमें कहीं भी शेख़ मुंतजाबुद्दीन उर्फ़ जरजरी शाह नामक शिष्य का ज़िक्र नहीं है. शेख़ बुरहानुद्दीन ग़रीब उनके एक ख़लीफ़ा थे , उनके बारे में काफी जानकारी मिलती है लेकिन उसमें कहीं उनके किसी मुंतजाबुद्दीन नामक बडे भाई के अस्तित्व का या उनके हज़रत निज़ामुद्दीन का शिष्य होने का उल्लेख नहीं मिलता.

हजरत बुरहानुद्दीन ग़रीब को हज़रत निज़ामुद्दीन द्वारा दक्षिण भेजे जाने का भी कहीं कोई उल्लेख किसी जगह नहीं है. यह पता चलता है कि हज़रत निज़ामुद्दीन के इंतक़ाल के वक्त हज़रत बुरहानुद्दीन दिल्ली में ही थे बल्कि वे उसके कुछ साल बाद दक्षिण गए , तब उनकी उम्र अस्सी के क़रीब थी. उनके दक्षिण जाने का जो वक्त है , उससे यही लगता है कि जब मुहम्मद तुग़लक़ ने दौलताबाद को राजधानी बनाया और ज़बरदस्ती सारे दिल्लीवालों को वहां जाने के लिए मजबूर किया तभी शेख़ बुरहानुद्दीन ग़रीब और अन्य सैकड़ों सूफ़ी दौलताबाद गए. वे वहां अपनी इच्छा से नहीं गए थे, लेकिन बाद में जब तुग़लक़ ने अपना फ़ैसला बदला तो कई अन्य दिल्लीवालों की तरह शेख़ बुरहानुद्दीन और कई सारे सूफ़ी नहीं लौटे , वे वहीं बस गए.

हज़रत निज़ामुद्दीन के समकालीन दस्तावेज़ों में उनके द्वारा एक भी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करने का उल्लेख नहीं है. बल्कि जहां एक जगह धर्म परिवर्तन का उल्लेख है ,उससे इसके प्रति उनकी उदासीनता ही प्रकट होती है. उनके शिष्य अमीर हसन सिजज़ी की किताब ‘फवायद उल फवाद’ में एक घटना का उल्लेख है कि हज़रत निज़ामुद्दीन का एक मुरीद अपने एक हिंदू दोस्त के साथ हज़रत निज़ामुद्दीन की खानकाह में आया. कुछ देर बैठकर वह हिंदू दोस्त चला गया, बाद में बातचीत के क्रम में हज़रत निज़ामुद्दीन ने पूछा, ‘तुम्हारा वह दोस्त हिंदू है न.’ उस मुरीद ने कहा, ‘हां, मैं उसे इसलिए आपके पास लाया था कि आप उसे ऐसा कुछ उपदेश दें ताकि वह मुसलमान बन जाए.’ हज़रत निज़ामुद्दीन ने कहा, ‘किसी के उपदेश देने से कोई मुसलमान नहीं बनता. हां, अगर वह किसी सच्चरित्र मुसलमान की संगत में रहे तो हो सकता है उसके आचरण से प्रभावित होकर वह मुसलमान बन जाए.’ इशारा साफ़ था, वे कहना चाह रहे थे कि बजाय दूसरों का धर्म बदलने के तुम अपने आचरण पर ध्यान दो

लेकिन दक्षिण भारत में जो कहानी आम है उसमें हज़रत निज़ामुद्दीन पहले शेख़ मुंतजाबुद्दीन को और फिर शेख़ बुरहानुद्दीन को सात सौ सूफ़ियों की फ़ौज के साथ धर्मपरिवर्तन के लिए दक्षिण भारत भेजते हैं. ज्यादा संभावना यही है कि यह कहानी कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों ने चलाई हो, जो यह सोच रहे होंगे कि इस तरह वे अपने धर्म और हज़रत निज़ामुद्दीन की कोई खिदमत कर रहे हों और बाद में हिंदुओं ने भी इसे मुस्लिम अत्याचार और धर्मांन्धता के प्रमाण के तौर पर स्वीकार कर लिया हो. मैंने दक्षिण से छपी कुछ किताबों में इसका प्रमाण भी पाया.

यह सच है कि मध्ययुग में धर्मपरिवर्तन बडे पैमाने पर हुए और धर्म के नाम पर अत्याचार भी हुए. लेकिन यह भी सच है कि कि बहुत ज्यादा कहानियां ऐसी प्रचलित हुईं जिनका वास्तविकता से कोई रिश्ता नहीं था या जिनकी मनमानी व्याख्या की गई थी. मुस्लिम धर्मांन्ध लोगों ने इस्लाम की ताक़त की कथित विजय की अतिरंजित कहानियां प्रचारित की और उन्हें हिंदू कट्टरपंथियों ने ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया. जैसे किसी सत्ता और धन के आकांक्षी मुस्लिम शासक को धर्म रक्षक साबित करने के लिए उसके चाटुकारों ने उसके द्वारा किए गए कथित धर्मपरिवर्तनों और मंदिर तोड़ने के अतिरंजित क़िस्से प्रचारित किए और बीसवीं सदी के कई हिंदुत्ववादियों लेखकों ने उन्हें उद्धृत करते हुए मुस्लिम अत्याचारों के प्रमाण की तरह पेश किया.

और याद रखने वाली ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि वह मध्ययुग था, उसके नैतिक, सामाजिक और धार्मिक मूल्य अलग थे. अब इक्कीसवीं सदी में वे हिसाब उन्हीं सिक्कों में चुकता करने की कोशिश कोई अक़्लमंदी नहीं है , जैसा कि इनदिनों हो रहा है. मज़े की बात यह है कि दोनों ही धर्मों के कट्टरपंथी यथार्थ की एक ही तस्वीर पेश करते हैं जिसमें वास्तविकता की जटिलताओं का काले सफ़ेद रंगों में सरलीकरण है. यह भी सच है कि कई बार हिंदू समाज के हिस्सों ने ही अपने कथित बलिदान की भव्यता को दिखाने के लिए ऐसी कहानियों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया. अभी चल रहा पद्मावती विवाद इसका उदाहरण है.

समझने की बात यह है कि मध्ययुग में ऐसा नहीं था कि एक तरफ़ देवता थे और दूसरी ओर राक्षस. दरअसल दोनों तरफ़ इन्सान थे, इन्सानी कमज़ोरियों और ख़ूबियों से भरे हुए. देवता और असुर तो इन्हें दोनों ओर के दुराग्रहों ने बनाया जो अक्सर एक जैसे थे. अगर हम मध्ययुग को गंभीरता से समझें तो हम पाएंगे कि उसमें वास्तविक रूप से आज की नफ़रत के लिए कोई आधार नहीं है , नफ़रत का आधार दोनों तरफ़ के कट्टरपंथियों का कुप्रचार और गलत व्याख्या है. यह अगर हम समझेंगे तभी आज की वास्तविक चुनौतियों का सामना कर पाएंगे, काल्पनिक युद्धों में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करेंगे.