जब से डेंगू और डेंगू जैसे अन्य वायरल बुखार की बीमारियां कुछ ज्यादा होनी शुरू हुई हैं, तब से आम लोगों के बीच प्लेटलेट का नाम कुछ ज्यादा ही जाना-पहचाना हो गया है. अब लगभग हर शख्स जानता है कि इन जैसी कई बीमारियों में यदि मरीज के खून में प्लेटलेट्स की मात्रा कम हो जाए तो उसके शरीर में कहीं से भी ब्लीडिंग होने की आशंका पैदा हो जाती है. डर लगता है कि अगर खून में प्लेटलेट्स बहुत ही कम हो गईं तो पेट, आंत, नाक या दिमाग के अंदर भी रक्तस्राव अर्थात ब्लीडिंग हो सकती है और यह ब्लीडिंग जानलेवा तक हो सकती है.

ऐसे में मरीज के साथ आये लोगों को आमतौर पर अचानक ही अस्पताल द्वारा यह कहा जाता है कि चूंकि आपके मरीज की प्लेटलेट्स बहुत कम हो गई हैं, उसे प्लेटलेट्स देने पड़ेंगे तो आप तुरंत ही ट्रांसफ्यूजन के लिए प्लेटलेट्स की व्यवस्था करें वरना मरीज की जान को जोखिम हो सकता है.

इन बातों के चलते धीरे-धीरे प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन को लेकर लोगों के बीच एक हौवा-सा बन गया है. इसे लेकर बड़े-बड़े भ्रम हैं. और ये भ्रम न केवल सामान्य जन के बीच हैं, बल्कि ज्यादातर डाक्टरों के बीच भी खूब देखे जा सकते हैं. मरीज को कब प्लेटलेट्स दी जानी चाहिए, कब नहीं और कब बहुत कम होने पर भी प्लेटलेट्स देना मरीज को नुकसान पहुंचा सकता है, ये बातें अक्सर डॉक्टरों को भी पता नहीं रहतीं. इसीलिये इस विषय में थोड़ी बुनियादी जानकारी आपको देता हूं ताकि इस हौवे से कम से कम आप तो निजात पा ही लें.

खून में प्लेटलेट्स के कम होने का मतलब यह है कि या तो शरीर में ये कम बन रही हैं या फिर ठीक मात्रा में बनने के बावजूद शायद किसी कारण से नष्ट होती जा रही हैं. सामान्यतौर पर तो ये डेंगू या ऐसे ही किसी इन्फेक्शन से नष्ट होती हैं, लेकिन कभी-कभी यह अपने आप में एक बुनियादी बीमारी भी हो सकती है. ऐसे में प्लेटलेट्स बनती तो पर्याप्त मात्रा में हैं, लेकिन बिना किसी अन्य कारण के, यूं ही हमारा शरीर इन्हें साथ-साथ लगातार नष्ट भी करता जाता है. इस बीमारी (इडियोपैथिक थोम्बोसाइटोपीनिया) में प्लेटलेट्स कम होने के बावजूद प्लेटलेट्स देना कोई इलाज नहीं होता.

हां, कैंसर की कीमोथेरेपी देते हुए भी कई बार दवाई के दुष्प्रभाव से प्लेटलेट्स कम होने लगती हैं. यह एक मुश्किल स्थिति है. अब कीमोथेरेपी देना भी जरूरी है, और कहीं इस कीमोथेरेपी से उत्पन्न प्लेटलेट्स की कमी के कारण शरीर में कहीं कोई खतरनाक ब्लीडिंग न हो जाए इसके लिए प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन देना भी उतना ही जरूरी हो जाता है.

डेंगू और इसी तरह की अन्य वायरल बीमारियों में तो प्लेटलेट्स खतरनाक हद तक कम हो ही सकती हैं. इस स्थिति में भी मरीज को प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन देने की आवश्यकता बन जाती है.

अब इस मामले में एक आत्म स्वीकृति भी.

मैं डॉक्टर के तौर पर आपको बता सकता हूं कि एक बार मरीज के शरीर में प्लेटलेट्स कम होनी शुरू हो जायें तो मरीज और मरीज के रिश्तेदारों की पूछताछ और चिंताओं के रहते कई बार डॉक्टर के अवचेतन मन पर भी इसका एक निरंतर दबाव बना रहता है कि न हो तो भी एकाध प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन देने में बुराई ही क्या है. यह अवैज्ञानिक तरीका है पर कई बार होशियार डॉक्टर भी ऐसे दबाव में आकर वहां भी प्लेटलेट्स दे डालते हैं जहां विज्ञान के अनुसार नहीं देना चाहिए थीं. खासकर तब, जब गूगल से प्राप्त अधूरे से ज्ञान में लिथड़ा मरीज का कोई रिश्तेदार आकर यह बोलता है कि हमारे मरीज के प्लेटलेट्स तो रोज-रोज कम होते जा रहे हैं, फिर आपने अभी तक इसे प्लेटलेट्स क्यों नहीं दीं?

ऐसे ज्ञानी समझने को तैयार ही नहीं होते, डॉक्टर को धमकी-सी देते हैं कि प्लेटलेट देने के बहुत स्पष्ट संकेत होने के बावजूद आप जो इसे प्लेटलेट्स नहीं दे रहे हैं, यह ठीक बात नहीं हैं. वो नहीं मानता कि यूं ही थोड़ी बहुत प्लेटलेट्स के कम होने से ही किसी को प्लेटलेट्स नहीं दे दी जातीं. देनी भी नहीं चाहिए. पर होते-होते, इस सब के चलते, मेडिकल प्रेक्टिस में अंधेर यह हुआ है कि मरीज की प्लेटलेट्स थोड़ी-सी भी कम हुई हों तो भी कई बार डॉक्टर स्वयं ही प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की कह देते हैं. यूं तकनीकी तौर इसकी कतई आवश्यकता नहीं थी पर ये डॉक्टर भी वही अवैज्ञानिक बात कहने लगते हैं कि साहब हम यहां प्रेक्टिस में बैठे हैं, कल के दिन मरीज को कहीं कोई ब्लीडिंग वगैरह हो ही गई तो फिर हमारी बात कोई नहीं सुनने वाला कि हमने वैज्ञानिक कारण से ही प्लेटलेट्स नहीं दी थीं.

वैसे चिकित्सा विज्ञान में प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन के इंडिकेशन एकदम साफ दर्ज हैं और इस तरह से हैं :

1. यदि प्लेटलेट काउंट 10,000 से नीचे आया हो तब, और 5000 के बाद तो पक्का ही, जरूर दें.

2. यदि प्लेटलेट काउंट पहले की तुलना में 50% से कम हो गया है तो सतर्कभर रहें. अब यदि काउंट और भी नीचे जाता है तो हमें प्लेटलेट्स देने पड़ सकती हैं. ऐसे में हमें लगातार स्थिति पर नजर रखनी होगी. अगर आगे फिर से और भी पचास पर्सेंट काउंट कम हो जाए या साथ में कहीं से भी ब्लीडिंग होने लगे तो प्लेटलेट्स जरूर देनी होंगी.

3.यदि प्लेटलेट काउंट एक लाख से कम हों परंतु मरीज की न्यूरो सर्जरी या आंखों की सर्जरी करनी पड़ रही है तो काउंट इतना कम न होने पर भी हमें प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन देना ही होगा.

4.किसी भी अन्य सर्जरी में भी यदि प्लेटलेट काउंट 50,000 से कम हैं तो भी प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की व्यवस्था करनी होगी.

5. प्लेटलेट्स अगर नॉर्मल से कम हैं , फिर वे चाहे बहुत कम न भी हों परंतु यदि मरीज को कहीं से भी कोई ब्लीडिंग हो रही है तब भी प्लेटलेट्स देनी होंगी.

(यहां फिर से याद दिलाना जरूरी है कि कई ऐसी जटिल बीमारियां है जहां प्लेटलेट काउंट बहुत कम आ जाये तो भी प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन देने से बचा जाता है क्योंकि ऐसी बीमारियां भी हैं जहां प्लेटलेट्स देने पर फायदे की जगह उल्टा नुकसान हो सकता है.)

तो फिर क्या?

हमारी सलाह यह है कि प्लेटलेट्स देने का निर्णय एक जटिल वैज्ञानिक निर्णय है. इसे आप न लेने बैठ जायें. डॉक्टर को ही तय करने दीजिए कि प्लेटलेट्स ट्रांसफ्यूजन देना है या नहीं. अपने अधकचरे ज्ञान से डॉक्टर पर फालतू का दबाव डालकर आप मरीज का नुकसान ही करेंगे.

अब मान लें कि डाक्टर ने कह दिया है कि मरीज को प्लेटलेट्स देनी पड़ेंगी, तो फिर?

एक बार प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की बात आ गई तो अगली बात डॉक्टर आपको यह बताता है कि यह ट्रांस्फ्यूजन दो तरह से दिया जा सकता है. पहला तरीका - सिंगल डोनर प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन, जहां एक ही व्यक्ति से सारी प्लेटलेट्स मिल जाती हैं. दूसरा तरीका - रैंडम प्लेटलेट डोनर, जहां कई डोनर्स जिनके ब्लड ग्रुप भी अलग-अलग हो सकते हैं, उनमें से थोड़ी-थोड़ी प्लेटलेट मिल जाती हैं, जिनको हम एक के बाद एक दे देते हैं.

कीमत का अंतर तो होता ही है, इसके अलावा दोनों में क्या अंतर है?

सिंगल डोनर प्लेटलेट्स लगाना महंगा पड़ता है. इसमें एक महंगी मशीन द्वारा, एक ही आदमी से, ‘एफेरेसिस तकनीक’ द्वारा लगभग 300 मिलीलीटर प्लेटलेट्स निकालकर बाकी का खून डोनर में वापस कर दिया जाता है. इसकी कीमत लगभग 10,000 रुपये पड़ती है. उधर रैंडम प्लेटलेट्स डोनर का अर्थ यह है कि अलग-अलग ग्रुप के बहुत सारे लोग हैं जो ब्लड बैंक में अपना ‘होल ब्लड’ दान देकर गए हैं. उसी पूरे रक्त से फिर प्लेटलेट्स निकाले जाते हैं. ये कम होते हैं. मानिये कि एक यूनिट से लगभग 50-60 मिलीलीटर के बराबर ही प्लेटलेट्स मिल पाती हैं. तब हमें ऐसी छह से आठ यूनिट एक साथ देनी पड़ती हैं. अलबत्ता ये सस्ती पड़ती हैं. पूरी प्लेटलेट्स लगभग 2000 रुपए में पड़ जाती हैं. उधर सिंगल डोनर का ब्लड ग्रुप मरीज से मिलना आवश्यक है, परंतु रेंडम डोनर्स में हमें यह ग्रुपिंग भी नहीं देखनी पड़ती.

अगर एक आदर्श स्थिति की बात करें तो सिंगल डोनर लेना ही ज्यादा मुफीद है क्योंकि रैंडम डोनर वाला प्लेटलेट अलग-अलग ब्लड ग्रुप के लोगों का होता है जिससे शरीर में धीरे-धीरे उन ब्लड ग्रुप्स के खिलाफ एंटीबॉडीज बन जाती हैं, जो फिर भविष्य में प्लेटलेट्स देने पर उन्हें नष्ट भी कर सकती हैं. ऐसे में प्लेटलेट देने पर भी प्लेटलेट काउंट नहीं बढ़ता. सिंगल डोनर ही अंततः ज्यादा सुरक्षित है.

आप भी किसी को कभी-भी प्लेटलेट्स दान दे सकते हैं. यदि आप किसी को अपने प्लेटलेट डोनेट करेंगे, तो आपका ब्लड ग्रुप वही होना चाहिए जो मरीज का है. इसे देने से किसी तरह की कोई कमजोरी आपको नहीं आयेगी. न ही आपमें किसी तरह की कोई शारीरिक कमी पैदा होगी. यह देना इतना सुरक्षित है कि आप हर सप्ताह दो बार तक प्लेटलेट्स डोनेट कर सकते है, क्योंकि सात दिनों में ही नई प्लेटलेट्स फिर से वापस बन जाती हैं. परंतु प्लेटलेट्स का जीवन भी कुल सात दिनों का ही होता है इसीलिए ब्लड बैंक में प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन के लिए रखी हुई यूनिट्स सात दिनों से ज्यादा नहीं रखी जा सकतीं. इसके बाद वे फिर खराब हो जाती हैं. इनकी तुलना में ब्लड के दूसरे कंपोनेंट्स लंबे समय तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं इसीलिए प्लेटलेट्स डोनेट करने के तुरंत बाद ही प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन देना होता है.

तो अगली बार कभी-भी आप के साथ प्लेटलेट्स देने या लेने की बात कहीं चले तो मेरी ये बातें जरूर याद रखें.

हां आखिरी बात.

क्या पपीते के रस से प्लेटलेट्स काउंट बढ़ जाता है? वैज्ञानिक तौर पर तो यह कतई सिद्ध नहीं हुआ है, पर आप कभी पूछो तो पपीते का रस देने से कोई डॉक्टर आपको मना भी नहीं करता क्योंकि दिल बहलाने को आखिर यह ख्याल ऐसा बुरा भी नहीं है!