राजस्थान और पश्चिम बंगाल में हुए उपचुनावों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है. राजस्थान में कांग्रेस ने मांडलगढ़ विधानसभा सीट के साथ-साथ अलवर और अजमेर की लोकसभा सीट पर भी जीत दर्ज की है. इन सीटों पर सत्ताधारी भाजपा का कब्जा था. दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने उलुबेरिया लोक सभा और नोआपाड़ा विधानसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशियों को मात दी है. नोआपाड़ा की सीट पर पहले कांग्रेस का कब्जा था. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस जीत के लिए सभी को बधाई दी है. उनके मुताबिक ये नतीजे बताते हैं कि राजस्थान की जनता ने भाजपा को खारिज कर दिया है. उधर, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने जनता के फैसले को सर-माथे पर बताया है.

अगले साल होने वाले आम चुनाव में अकेले 350 से अधिक सीटों पर कब्जा करने की बात करने वाली भाजपा के लिए उपचुनावों के नतीजों को करारा झटका माना जा रहा है. दूसरी ओर, इसे 2019 में विपक्ष के लिए उम्मीद पैदा करने वाले संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है. माना जा रहा है कि भाजपा के लिए राजस्थान में यह मात माथे पर बल लाने वाली साबित हुई है. पार्टी ने बीते आम चुनाव में राज्य स्थित लोकसभा की सभी 25 और विधानसभा चुनाव में दो-तिहाई से अधिक सीटों पर कब्जा किया था. इसे देखते हुए ही माना जा रहा है कि भाजपा के लिए राजस्थान में पाने को नहीं के बराबर लेकिन, खोने को काफी कुछ है.

उधर, पश्चिम बंगाल की हार भाजपा को राहत देने वाली है. टीएमसी के हाथों हार के बाद भी पार्टी को इस बात पर संतोष है कि वह वाम दलों और कांग्रेस को पछाड़कर राज्य में दूसरी बड़ी पार्टी का दर्जा करीब-करीब हासिल कर चुकी है.

लोकसभा की 543 सीटों में से 77 सीटों की हिस्सेदारी रखने वाले इन दोनों राज्यों के हालिया उपचुनावों के नतीजों को लेकर प्रमुख अखबारों ने देश की राजनीतिक नब्ज टटोलने की कोशिश की है. इनमें से अधिकांश का मानना है कि ये नतीजे भाजपा के लिए चुनावी संकट और विपक्ष की उम्मीद बढ़ाने वाले संकेत लेकर आए हैं. हालांकि, कुछ का यह भी कहना है कि इनके जरिए देश की राजनीतिक हवा का रुख नहीं भांपा जा सकता. इसके अलावा अखबारों ने पार्टियों की जीत-हार में क्षेत्रीय नेताओं की भूमिका अहम होने की ओर भी संकेत किया है.

अमर उजाला ने राजस्थान में जीत को कांग्रेस के लिए उत्साह और भाजपा के लिए चिंता बढ़ाने वाला बताया है. साथ ही, उसने कांग्रेस की जीत का श्रेय सचिन पायलट को दिया है जिन्होंने खुद चुनाव लड़ने की जगह पार्टी को मजबूत करने का काम किया. अखबार अपने संपादकीय में लिखता है कि कांग्रेस के लिए इस जीत का संदेश है कि अगर राज्यों में युवा नेताओं को आगे बढ़ने का मौका दिया जाए और उम्मीदवारों के साथ मुद्दों के चयन में सावधानी बरती जाए तो पस्त पड़ी कांग्रेस एक बार फिर उठ खड़ी हो सकती है. अमर उजाला ने इन नतीजों के हवाले से कहा है कि जिस हिंदी पट्टी वाले इलाके ने 2014 में भाजपा की शानदार जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी, वहां अब स्थिति बदल रही है.

वहीं, जनसत्ता ने इन नतीजों को भाजपा की सरकार से राजस्थान की जनता की नाखुशी बताया है. अखबार के मुताबिक मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की कार्यशैली से केवल जनता नहीं बल्कि पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी नाखुश हैं. संपादकीय में अखबार लिखता है कि राज्य में रोजगार और विकास से जुड़े अन्य मुद्दों पर वसुंधरा राजे सरकार कुछ खास नहीं कर पाई है. उसके मुताबिक राजस्थान में जीत से कांग्रेस को सत्ता वापसी की उम्मीद बंधी है. जनसत्ता के मुताबिक बीते तीन दशक में यह पहला मौका है जब उपचुनावों में सत्ताधारी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है. दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल की दोनों सीटों पर ममता बनर्जी की जीत को अखबार ने इसका सबूत बताया है कि राज्य में सत्ता और पार्टी पर ममता बनर्जी की गहरी पकड़ बनी हुई है. अपने संपादकीय के आखिर में अखबार कहता है कि लोगों को काम करने वाली सरकार चाहिए, वरना मतदाता सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने में देर नहीं लगाते.

अंग्रेजी के प्रमुख अखबार द इंडियन एक्सप्रेस ने राजस्थान के नतीजों को भाजपा, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और कांग्रेस को संदेश देने वाला बताया है. अखबार के मुताबिक वसुंधरा राजे राज्य के किसानों की नाराजगी दूर करने में विफल रहीं. साथ ही वे नौकरशाहों के भ्रष्टाचार में संलिप्त होने से संबंधित विवादित अध्यादेश लाने, गौरक्षा के नाम पर हिंसा और पद्मावत फिल्म के खिलाफ अशांति फैलाने वाले समूहों पर लगाम नहीं लगाने को लेकर सवालों के घेरे में रहीं. अपने संपादकीय में उसने लिखा है कि दूसरी ओर, गुजरात में किसी तरह सत्ता बनाए रखने वाली भाजपा के लिए इस साल राज्य विधानसभा चुनाव और अगले लोक सभा चुनाव चेतावनी भरा संकेत हैं. अखबार के मुताबिक उपचुनावों में विजयी कांग्रेस के लिए भी यह संदेश है कि मजबूत क्षेत्रीय नेताओं के सहारे ही पार्टी फिर से भारतीय राजनीति में अपनी खोई हुई जगह हासिल कर सकती है.

उधर, द हिंदू का इस बारे में अलग विचार है. अखबार का मानना है कि उपचुनावों के नतीजे राजनीतिक हवा के रुख का साफ संकेत नहीं हो सकते, फिर भले ही ये उपचुनाव आम चुनावों के करीब ही क्यों न हुए हों. वह आगे लिखता है कि इन चुनावों में स्थानीय कारक, उम्मीदवारों का चयन और मतदाताओं में असंतोष नतीजों को प्रभावित करने वाले अहम तत्व होते हैं. हालांकि, अखबार के मुताबिक इसके बाद भी राजस्थान उपचुनाव के नतीजे भाजपा को झटका देने वाले हैं. द हिंदू की मानें तो उपचुनाव के नतीजों से इस बात के संकेत मिलते दिखते हैं कि वसुंधरा राजे के अभिमानी बर्ताव से एक बड़ा तबका नाराज है और इसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ सकती है.

हिंदी के प्रमुख अखबार दैनिक भास्कर ने इन नतीजों को विपक्ष में एकता का बीज रोपने वाला बताया है. अखबार का मानना है कि ये नतीजे कांग्रेस के लिए खाद-पानी का काम करेंगे और साथ ही कांग्रेस और सीपीएम के रिश्तों के लिए नया माहौल तैयार करेंगे. विपक्षी एकता को लेकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नतीजे के दिन ही एक विपक्षी दलों की एक बैठक में राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर आपसी एकता पर जोर दिया था. पश्चिम बंगाल के नतीजों को अखबार ने विडंबना बताया है जिनमें दूसरे स्थान पर रहने के बाद भी भाजपा अधिक खुश है क्योंकि उसने सीपीएम और कांग्रेस, दोनों को पछाड़ दिया है. अखबार के मुताबिक इन नतीजों ने सीपीएम को संदेश दिया है कि वह केंद्रीय समिति के कांग्रेस के साथ गठबंधन न करने संबंधी फैसले पर फिर से विचार करे. उधर, राजस्थान के बारे में अखबार लिखता है कि इस हार के बाद भाजपा यदि नेतृत्व में बदलाव करती है तो उसे वसुंधरा राजे की बगावत का खतरा है. उसके मुताबिक इन उपचुनावों के नतीजे बताते हैं कि भाजपा अपने किले में कमजोर हो रही है तो दूसरे किलों में सेंध लगा रही है.

दूसरी ओर, द टाइम्स ऑफ इंडिया का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले आखिरी मौके पर राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन भी भाजपा के लिए काम नहीं करने वाला है. हिंदी पट्टी, जहां भाजपा की मजबूत पकड़ रही है, वहां अब पार्टी का चुनावी प्रदर्शन सवालों के घेरे में है. बीते महीने मध्य प्रदेश स्थानीय चुनाव में कांग्रेस भाजपा के किलों में अपनी पकड़ मजबूत करती दिखी है. इससे पहले गुजरात में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी. अखबार के मुताबिक इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले वसुंधरा राजे को खासकर राज्य के गांवों में लोगों के भारी असंतोष का सामना करना पड़ रहा है. दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस तरह की किसी समस्या से दो-चार नहीं हैं. वे लगातार धीरे-धीरे मजबूत होती हुई दिख रही हैं. साथ ही, भाजपा भी राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभर रही है.