‘अजब रिवाज बन गया है. मुस्लिम मोहल्लों में जबर्दस्ती जुलूस ले जाओ और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाओ. क्या भाई वे पाकिस्तानी हैं क्या?’

बरेली के डीएम आर विक्रम सिंह ने जनवरी के अंतिम सप्ताह में अपनी एक फेसबुक पोस्ट में यह सवाल उठाया था.

‘चन्दन पर गोली एक घर से चलाई गई थी. जो मकान वहां पर है वह मुस्लिम का है.’

कासगंज के डीएम आर पी सिंह ने यह बयान कासगंज दंगे के दो दिन बार मीडिया को दिया था.

‘हम सब राम भक्त इस कार्यक्रम के दौरान ये संकल्प लेते हैं, जल्द से जल्द भव्य राम मन्दिर का निर्माण हो. जय श्रीराम’.

सूबे की पुलिस में दूसरे नम्बर की वरिष्ठता वाले डी जी होमगार्ड सूर्य कुमार शुक्ला ने यह शपथ लखनऊ विश्वविद्यालय में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान ली थी.

‘तो ये थी कासगंज की तिरंगा रैली. यह कोई नई बात नहीं है. अंबेडकर जयन्ती पर सहारनपुर के सड़क दूधली में भी ऐसी ही रैली निकाली गई थी. उसमें से अंबेडकर गायब थे या कहिए कि भगवा रंग में विलीन हो गए थे. कासगंज में भी यही हुआ. तिरंगा गायब और भगवा शीर्ष पर. जो लड़का मारा गया उसे किसी दूसरे तीसरे समुदाय ने नहीं मारा. उसे केसरी, सफेद और हरे रंग की आड़ लेकर भगवा ने खुद मारा’.

सहारनपुर में डिप्टी डायरेक्टर सांख्यिकी के पद पर तैनात महिला अधिकारी रश्मि वरुण ने यह वक्तव्य अपनी फेसबुक पोस्ट पर डाला था.

लगभग 10 दिनों के अंतराल पर उत्तर प्रदेश के चार बड़े अधिकारियों के ये बयान कई तरह के सवाल पैदा करते हैं. यह वही उत्तर प्रदेश है जहां बीते एक साल के दौरान सांप्रदायिक हिंसा की करीब 61 घटनाएं हो चुकी हैं. इनमें 17 लोग मारे जा चुके हैं.

हालांकि अब इन बयानों पर अलग अलग तरह से सफाइयां आ रही हैं. बरेली के डीएम आर विक्रम सिंह ने विवाद शुरू होते ही अपनी पोस्ट हटा ली और विवाद के लिए माॅफी मांगते हुए कहा कि पोस्ट बरेली में कांवड़ यात्रा के दौरान आई कानून व्यवस्था की समस्या से जुड़ी थी. उनका कहना था, ‘उम्मीद थी कि इस पर अकादमिक बहस होगी पर दुर्भाग्यवश इसने अलग मोड़ ले लिया. हमारी मंशा कष्ट देने की नहीं थी. साम्प्रदायिक माहौल सुधारना प्रशासनिक और नैतिक जिम्मेदारी है. मुस्लिम हमारे भाई हैं................हमारा डी एन ए एक है.’

कासगंज के डीएम ने भी मुस्लिम द्वारा हत्या किए जाने वाले अपने बयान को संशोधित करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट जांच के कारण अब वे इस बारे में कुछ नहीं कहेंगे. डीजी होमगार्ड सूर्य कुमार शुक्ल ने भी वायरल हो चुके वीडियो से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए ऐसा संकल्प लेने का सवाल ही नहीं है. उनका कहना था, ‘वीडियो में वही अंश दिखाया जा रहा है जो हमने नहीं बोला था. जो बोला था वह नहीं दिखाया गया है.’ इसी तरह रश्मि वरुण ने भी कहा, ‘मेरा ऐसा कोई मकसद नहीं था कि किसी की भावनाएं आहत हों...........इसलिए जिस किसी की भी भावनाएं आहत हुई हैं उन सबसे मैं माफी मांगती हूं’.

पूर्व आईएएस अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह कहते हैं, ‘अभिव्यक्ति का अधिकार अलग अलग बात है और सर्विस कण्डक्ट रूल्स अलग बात. अधिकारी इस तरह से सेवा नियमावली का उल्लंघन कैसे कर सकते हैं. सरकार को इस पर संज्ञान लेना चाहिए.’

वैसे राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कासगंज डीएम के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए उन्हे चेतावनी दी तो बरेली के डीएम पर कड़ी कार्रवाई करने का दावा उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य भी कर चुके हैं. सूर्य कमार से भी गृह विभाग ने जवाब तलब किया है और ऐसा ही रश्मि वरुण के मामले में भी किया गया है.

लेकिन सरकारी बयानों के सिवा इन मामलों में अब तक कोई कार्रवाई हुई नहीं है. इसलिए 2018 की शुरूआत में ही एक एक कर सामने आए इन मामलों से एक सवाल उठ रहा है कि क्या उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारी अब सांप्रदायिक प्रतिबद्धताओं की ओर बढ़ने लगे हैं. यह भी कि राज्य सरकार की मंशा भी क्या ऐसी ही है?

उत्तर प्रदेश में पिछले 20-25 वर्षों से राज्य की प्रशासनिक मशीनरी की राजनीतिक और जातीय प्रतिबद्धताओं की चर्चा खूब होती रही. मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की सरकारों में सरकारी मशीनरी का यादवीकरण और सपाईकरण होना साफ दिखता था तो मायावती के राज में भी जातीयकरण और बसपा भक्ति की छाप साफ दिखाई देती थी. राजनाथ सरकार में भी जातीयकरण की संस्कृति का असर दिखता था. लेकिन ताजे बयानों से यह आशंका होती है कि क्या यह उत्तर प्रदेश की सरकारी मशीनरी यानी बड़े अधिकारियों के सांप्रदायीकरण के संकेत तो नहीं हैं. क्या उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी भी अब राजनेताओं की राह पर जाने की कोशिश कर रही है?

हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश में राजनेताओं के कारनामों, बयानों और चुनावी हथकंडों में यह बात साथ दिखती रही है कि उत्तर प्रदेश में राजनीतीबाजों के लिए सांप्रदायिकता का कार्ड खेलना सबसे आसान तरीका रहा है. हिन्दू-मुस्लिम जैसे शब्द उनके लिए धार्मिक अर्थों से कहीं अधिक वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल होते रहे. घृणा, नफरत, विवाद और दंगे खाद बनकर उनकी राजनीतिक फसलें लहलहाते रहने की वजहें भी बनते रहे. लेकिन अयोध्या विवाद के चरमपंथी दिनों में भी जिम्मेदार मीडिया और ब्यूरोक्रेसी सांप्रदायिक मसलों और विवादों में इस तरह के शब्दों और धार्मिक पहचान के सवालों पर मर्यादित रवैय्या अपनाती रही. दंगों के मामलों में हिन्दू मुस्लिम के बजाय ‘एक संप्रदाय’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल इसी वजह से किया जाता था कि पहचान जाहिर करने से स्थितियां और बिगड़ सकती थीं.

लेकिन अब जिला चलाने वाले अधिकारी और पुलिस के बड़े अधिकारी ऐसे मामलों में जिम्मेदारी को दरकिनार कर भाषाई मर्यादा की सीमा लांघने लगे हैं. दंगों को लेकर हिंदू, मुस्लिम जैसे परहेजी शब्दों का जिक्र अगर प्रशासन चलाने वाले अधिकारियों की जुबान पर चढ़ने लगे तो ऐसा लगता है कि अधिकारियों की प्रतिबद्धता अपने सर्विस रूल्स से ज्यादा अपनी धार्मिक पहचान की ओर झुकने लगी है और अगर वाकई ऐसा हुआ तो फिर प्रशासन से तटस्थता की उम्मीद कैसे की जा सकती है. इसलिए अगर यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासक के सांप्रदायिक होने के संकेत हैं तो यह बेहद खतरनाक संकेत हैं.

हालांकि चर्चाएं इस बात की भी हैं कि कुछ मामलों में अधिकारियों का ऐसा व्यवहार उनके अपने भावी दिनों की तैयारी की कोशिश है. राघवेंद्र विक्रम सिंह जल्द रिटायर होने वाले हैं. कहा जा रहा है कि भविष्य की राजनीतिक पारी के लिए उन्होने इस तरह की पोस्ट लिखी है. इसी तरह सूर्य कुमार उत्तर प्रदेश में डीजीपी बनने की रेस में काफी समय जुटे थे. बसपा तथा सपा सरकारों में भी वे उनके रंगों में रंगे दिखने की कोशिशों के लिए जाने जाते थे और शायद राम मंदिर के बहाने वे भी अगस्त में रिटायर होने के बाद अपने लिए कोई नया आसन बिछवाने की जुगत में इस तरह का संकल्प ले बैठे हों. पूर्व डीजी सुब्रत त्रिपाठी कहते हैं, ‘दरसल यह परलोक सुधारने का ही प्रयास है. राम का नाम परलोक सुधारने में तो काम आता ही है मगर यहां परलोक का अर्थ मृत्यु के बाद से नहीं बल्कि रिटायरमेंट के बाद के वक्त से है.’’

अधिकारियों की इस नई जुबान को लोकसभा चुनाव के एजेंडे से भी जोड़ कर देखा जा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार हसीब सिद्दीकी कहते हैं, ‘गुजरात चुनाव में मुस्लिम समुदाय ने किसी तरह की चुनावी प्रतिक्रिया नहीं दी थी. यह स्थिति बीजेपी के लिए सुविधाजनक नहीं है क्योंकि अगर प्रतिक्रिया नहीं होती तो बीजेपी के पक्ष में ध्रुवीकरण की सम्भावनाएं भी कम हो जाती हैं. इसलिए बीजेपी की कोशिश है कि जैसे भी हो उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज किया जाए. अधिकारियों की बोली भी इसीलिए बदल रही है.’’

उत्तर प्रदेश में भगवा, हिन्दू, मुस्लिम शब्दों का सांप्रदायिक इस्तेमाल करने के मामलों में उत्तर प्रदेश की आईएएस एसोसिएशन ने अब तक चुप्पी साध रखी है. यह चुप्पी आशंकाओं को बढ़ाती है. हालांकि दूसरी तरफ सूर्य कुमार के प्रसंग में आईपीएस एसोसिएशन की तीखी प्रतिक्रिया से उम्मीद की किरण भी दिखती है.